इसे आप हिन्दी का दुर्भाग्य भी कह सकते हैं कि स्पैम का दूसरा प्रकार विकसित हो रहा है. यह दूसरा प्रकार वैसा नहीं है जिसके लिए तकनीकि दक्षता की जरूरत पड़ती हो. यह विशुद्ध हिन्दी शैली का और भारतीय स्पैम है. और मजे की बात तो यह है कि ऐसे स्पैमर हमारे आपके बीच के हैं. कुछ ब्लाग वगैरह भी लिखते ही होंगे. हो सकता है तकनीकि के मास्टर भले न हों लेकिन इतना तो जानते हैं कि बुराई का अधिकतम विस्तार कैसे किया जा सकता है.
मैं विस्फोट साईट का संचालन करता हूं. धीरे-धीरे यह समसामयिक मुद्दों पर केन्द्रित साईट के रूप में अपनी जगह बना रहा है. जाहिर है हिन्दी में बड़ी साईटों और ब्लाग के बीच यह एक ऐसी जगह है जो शुद्धरूप से अपनी मेहनत और ईमानदारी से ही विकसित की जा सकती है. कुछ पाठकगण तो किसी को भी मिल ही जाते हैं. लेकिन यहां सिर्फ पाठक ही नहीं आते. यहां यह दूसरे वाले स्पैमर भी आते हैं जो वैचारिक स्पैम छोड़ जाते हैं.
विस्फोट जिस सीएमएस पर विकसित हुआ है उसमें कमेन्ट के साथ ईमेल अनिवार्य नहीं है. यह तकनीकि लोचा है. मैंने उनसे पूछा भाई कुछ ऐसा बना दो कि दोनों तरह के स्पैम रूक जाएं. उन्होंने कहा कि १५० डालर चाहिए. बस अपनी हिम्मत जवाब दे गयी. मैंने कहा इतना पैसा तो मुश्किल है, तो उन्होंने कहा कि फिर इसी संस्करण से काम चलाईये. व्यक्तिगत रूप से मैं विचारों के मुक्त प्रवाह का पक्षधर हूं. लेकिन शर्त यह है कि वे विचार होने चाहिए, वैचारिक स्पैम नहीं. इसलिए माडरेशन इत्यादि की झंझट से मुक्त हूं. पहलेवाले स्पैम से तो इमेज कैप्चा लगाकर बच जाते हैं इस दूसरेवाले से कैसे बचें, समझ नहीं आ रहा.
यह दुखद है लेकिन इसे आप मजे के तौर पर सुनिये. अंबरीश कुमार ने लेख लिखा कि भाई आजमगढ़ में आतंकवादी के नाम पर जिन लोगों को परेशान किया जा रहा है उसमें से अधिकांश के खिलाफ कोई सबूत नहीं है. अब अपने ही लिखे पर कोई यह टिप्पणी कैसे करेगा कि “लेखक उन लोगों में हैं जिन्हें आतंकवादियों से पैसा मिलता है.” हद हो गयी. यह वैचारिक स्पैम हटाना पड़ा. एक ने तो विस्फोट के नाम से ही कमेन्ट कर दिया कि गुरू माल काट रहे हो इसलिए सेकुलर होने का स्वांग धर रहे हो. तो एक ने आरएसएस के नाम से कमेन्ट किया कि मैं हाफपैण्ट में अब सेकुलर हो गया हूं.
पूरा इंतजाम. भरपूर हमला कि आप जहां कहीं से भी काम कर रहे हों अपने आप को गाली देने लगे कि छोड़ यार, हिन्दी के उद्धार का ठेका मैंने ही ले रखा है क्या? मजे से अंग्रेजी में काम करो, कुछ गपशप टाईप में लिखो-पढ़ो, लोग भी आयेंगे और पैसा भी लायेंगे. ऐसी हिन्दी के पीछे आंख फोड़ने का क्या फायदा जो आखिरकार आपको तनावग्रस्त ही करे. ऐसे विचार बहुतों के मन में आते होंगे. न आयें तो आश्चर्य क्योंकि ये हिन्दी के महान वैचारिक स्पैमर हर जगह घूमकर अपना कूड़ेदान साफ कर रहे हैं.
अब हमारे पास १५० डालर हो तो मैं वैध ईमेल अनिवार्य करवाऊं. न हो तो वैचारिक स्पैम से पीछा कैसे छुड़ाऊ? चलिए पीछा छुड़ाने की बात नहीं करता, लेकिन क्या ऐसे छद्मनामधारी स्पैम कमेन्टेटर थोड़ा सा विचार करेंगे कि इससे आखिरकार किसका फायदा होता है? क्या उन्हें कुछ फायदा मिलता है? अगर हां, तो क्या और अगर नहीं तो वे ऐसा क्यों करते हैं?
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‘व्यक्तिगत रूप से मैं विचारों के मुक्त प्रवाह का पक्षधर हूं.’नं२ किस्म के निपटने वाले विचारों से मुक्त प्रवाह के पक्षधर हैं ।
आपने जो उदाहरण दिए हैं उन्हें बिना हटाए आपका काम ज्यादा बनता,मुझे लगता है । पाठक अनाम निपटने वालों को पढ़ कर नाक बन्द कर लेते हैं । दरअसल इन नं२ वालों के अपने चिट्ठों पर निपटान दर्शन लम्बे समय चल नहीं सकता , चूँकि वहाँ निपटान से अलग किसी अन्य दर्शन का होना नामुमकिन है ।
इतनी तरजीह क्यों देते हैं इस कचरे को? आपके घर में प्रतिदिन सफाई कार्य होता ही होगा. इसी तरह चिट्ठे पर से भी इस प्रकार की गंद को साफ़ करने की आदत डाल लीजिये न.