70 साल पहले किसी अनाम व्यक्ति की डायरी का एक पन्ना.
देश में आजादी की लड़ाई चल रही है. आजादी की लड़ाई में शामिल हुए गांधी को 25-30 साल हो गये हैं. और परिस्थितियां देखकर यही लगता है कि अब आजादी ज्यादा दूर नहीं है. कितना समय लगेगा कहा नहीं जा सकता लेकिन गांधी की स्वीकार्यता को देखते हुए यही लगता है कि वे हमें आजादी दिलाने में सफल रहेंगे. नेताजी अपने सिरे से सक्रिय हैं. हालांकि वे आजकल जर्मनी में हैं लेकिन सुना है वे जर्मनी के हिटलर को अपने साथ मिलाने में लगे हुए हैं. जैसे अंग्रेजों से हम लोग गुस्सा हैं उसी तरह हिटलर भी अंग्रेजों से खार खाये बैठा है. निश्चित ही नेताजी उसको अपने साथ मिलाने में कामयाब हो जाएंगे.
एक समस्या जो हम सबको परेशान करती है वह है गांधी जी का तकनीकि विरोधी रवैया. वे रेलगाड़ी पसंद नहीं करते, मिल फैक्ट्रियों को पसंद नहीं करते. कहते हैं ये सब आधुनिकता के औजार नहीं है, गुलामी के हथियार हैं. सौभाग्य से संचार सेवाओं के बारे में उनका दृष्टिकोण थोड़ा उदार है. वे डाक-तार, टेलीफोन और इंटरनेट ब्रॉडबैण्ड के मुखर विरोधी नहीं है. आजादी के आंदोलन में अपनी बात लोगों तक पहुंचाने में वे इन सेवाओं का बखूबी उपयोग भी करते है. आश्रमवासियों के आग्रह पर उन्होंने आश्रम में एक टेलीफोन और ब्राडबैण्ड कनेक्शन की मंजूरी दे दी है. कम्यूटर निर्माता कंपनी आईबीएम के मुखिया को जब यह पता चला कि गांधी जी अपने आश्रम में ब्रॉडबैण्ड लेने के लिए तैयार हो गये हैं तो उन्होंने एक दर्जन पीसी ऑफर किया है. सुना है गांधी जी ने आईबीएम के ऑफर को ठुकरा दिया है क्योंकि आईबीएम इसी बहाने गांधीजी को आईबीएम के ब्राण्ड एम्बेसडर के रूप में प्रयोग करना चाहता है. बहरहाल गांधी जी ने दो पीसी की अनुमति दे दी है और ये दोनों पीसी लोकली एसेम्बल किये जाएंगे. गांधी जी का मानान है कि इससे स्थानीय रोजगार को बढ़ावा मिलेगा और उनके ऊपर किसी ब्रांड का ठप्पा भी नहीं लगेगा.
1931 में गांधी जी जब लंदन गये थे. 20 अक्टूबर को उन्होने गोलमेज सम्मेलन में भारत के भविष्य पर भाषण दिया था. इस भाषण में उन्होने कहा था – हमारे यहां सर्वसाधारण के बीच गरीबी बहुत है और यह लगातार बढ़ती चली जा रही है. भारत के औसत लोगों की आय 2 पैसे प्रतिदिन है. इसमें चंद करोड़पतियों की आय भी शामिल है, अन्यथा आप आसानी से समझ सकते हैं कि लाखों लोग ऐसे हैं जो यह दो पैसा भी प्रतिदिन नहीं कमाते हैं. नतीजा यह है कि लगभग एक चौथाई आबादी आधा पेट खाती है और आधा तन ढक कर गुजारा करती है. 10 प्रतिशत आबादी ऐसी है जो नमक और सूखी रोटी के अलावा कोई स्वाद नहीं जानती. वे नहीं जानते कि दूध क्या होता है, ब्रेड क्या होता है, यहां तक कि उन्हें मट्ठा भी देखने को नहीं मिलता, उन्हें नहीं मालूम कि मक्खन क्या होता है, वे नहीं जानते कि तेल क्या होता है, उन्हें कभी हरी सब्जियां नहीं मिलती. भारत में विशाल समुदाय आज इसी दलितावस्था में जी रहा है.”
इस भाषण को दिये छः साल बीत गये हैं. परिस्थितियां अब भी जस की तस हैं. लेकिन आश्रम का नियमित स्वयंसेवक होने के नाते मुझे आश्रम और गांधी जी के व्यवहार में कई बदलाव दिखाई दे रहा है. इंटरनेट यह मानकर लिया गया था कि इससे अपनी बात ज्यादा लोगों तक पहुंचाई जा सकेगी लेकिन परिणाम कुछ ठीक नहीं दिख रहे हैं. हर स्वयंसेवक प्रत्यक्ष मिलने की बजाय ई-मेल से अपनी बात पहुंचाने में यकीन करने लगा है. स्वयं गांधी जी भी इससे अछूते नहीं हैं. आप समझ सकते हैं कि छः साल पहले जिस आम आदमी की चर्चा कर रहे थे, या फिर आधे तन कपड़े में लिपटी एक युवती के लिए वस्त्र त्याग कर दिया था, यह कहते हुए कि जब तक दे
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मुद्दे सही उठाया है आपने लेकिन मेरी राय में बापू की जगह किसी और प्रतीक जरिए आपको ये बातें रखनी चाहिए थी.
रोचक पोस्ट के लिए साधुवाद ।
पोस्ट रोचक है। सत्येन्द्र प्रसाद श्रीवास्तव जी की बात पर गौर करें।
भाई आगे से ध्यान रखूंगा.
काफ़ी विचारोतेजक लिखा है . सुंदर रचना . शुभकामनाएँ