नैनों कार परियोजना को एक राज्य से निकालकर दूसरे राज्य में ले जाने पर गुजराती जिस तरह से प्रतिक्रिया दे रहे हैं क्या उससे नहीं लगता कि वे हुर्रियत कांफ्रेस के गुजराती संस्करण है? िजस गुजराती अस्मिता और पहचान को मोदी भुना रहे हैं क्या वह पहचना कश्मीरी अलगाववादियों से कुछ अलग है? बिल्कुल अलग नहीं है. वे हिन्दू अलगाववादी हैं. वे भी भारत से अपनी वैसी ही दूरी रखना चाहते हैं जैसे कश्मीरी अलगाववादी. गुजराती ऐसे व्यवहार कर रहे हैं जैसे परियोजना पश्चिम बंगाल से नहीं बल्कि पाकिस्तान से छीनकर लाये हों. क्यों भाई यह पश्चिम बंगाल भारत में नही है क्या जो आप लोग एक कार कंपनी के फैक्टरी लगाने पर इस तरह से प्रतिक्रिया कर रहे हो.
अगर कश्मीरी अपनी कश्मीरियत की अलग पहचान चाहता है तो वह राष्ट्रद्रोह हो जाता है और यही काम गुजरात और महाराष्ट्र के हिन्दू चरमपंथी चाहते हैं तो यह राष्ट्रवाद कैसे हो जाता है? क्या गुजराती अस्मिता इस देश की एकता और अखण्डता से बड़ी है? अगर ऐसा नहीं है तो गुजराती लोग बोलते समय इस तरह की भाषा क्यों प्रयोग करते हैं जो उन्हें शेष देश से अलग होने का भान कराता है. नरेन्द्र मोदी ने क्या कहा इसे छोड़ दीजिए. वहां के दूसरे लोग कौन सी भाषा बोल रहे हैं? आईआईएम-ए के पूर्व निदेशक बकुल ढोलकिया कहते हैं – नैनो का गुजरात पहुंचना राज्य में महज एक बड़ी परियोजना का पहुंचना नहीं है. इसका दूरगामी प्रभाव दिखेगा.’ कोई बकुल ढोलकिया से पूछे कि दूरगामी प्रभाव से उनका आशय क्या है? जायडस केडिला के पंकज पटेल का बयान सुनिये. वे कह रहे हैं कि आज का दिन गुजरात के इतिहास में सुनहरे अक्षरों में दर्ज होगा. जरूर होगा.
हिन्दू राष्ट्रवाद की बेईमानी का आलम देखिए. कश्मीर में हुर्रियत यह नारा देता है कि गैर-कश्मीरी यहां से चले जाएं तो यह राष्ट्रद्रोह हो जाता है लेकिन यहीं बगल में महाराष्ट्र में राज ठाकरे बाकायदा अभियान चलाते हैं तो वह केवल वोटबैंक की पालिटिक्स मान ली जाती है. क्या राज ठाकरे और नरेन्द्र मोदी जैसे लोगों का उभार नये तरह हिन्दू क्षेत्रियता को बढ़ावा नहीं दे रहा है जो शेष-देश से अपने आप को श्रेष्ठ समझता है. किसी परियोजना का कहीं भी लग जाना बड़ी बात नहीं है. अगर देश के आंतरिक हालात ठीक हैं तो कोई कहीं भी जाकर काम कर सकता है. और अपने लिए रोजी-रोटी कमा सकता है. कल प्रेस कांफ्रेस में नरेन्द्र मोदी ने कहा कि उनकी पूरी कोशिश थी कि कुछ भी हो जाए लेकिन नैनो परियोजना देश के बाहर नहीं जानी चाहिए. क्या मोदी यह बताने की कोशिश करेंगे कि वे देश के प्रधानमंत्री हैं या फिर प्रदेश के मुख्यमंत्री? या फिर कहीं ऐसा तो नहीं है कि उनकी जबान फिसल गयी और प्रदेश की जगह देश शब्द बोल गये?
यह हुर्रियत कांफ्रेस का राष्ट्रवादी संस्करण है जो गुजरात, महाराष्ट्र में पल-बढ़ रहा है. अगर कश्मीरियत की पहचान बचाना राष्ट्रद्रोह है तो गुजराती अस्मिता और मराठी मानुस कहां से राष्ट्रवादी हो गये? क्यों भाई गुजरात वालों क्या पश्चिम बंगाल पाकिस्तान में है क्या जो इस तरह से व्यहार कर रहे हो?
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abhi abhi sanjay bengani ji ke blog per mai janma se agujarati tippani deker aayi hun. usey padhiye aur jaan jaiye ki gujarat mein agujarati ke sath kaisa vyavahar hota hai.vahan kashmir se bhagaye pandit bhi sukh chain se rah rahe hain.mai bharat ke bahut se rajyon mein rahi hun. keval hindi bhashi rajya aur gujarat hi aise hain jahan aik baar bhi mujhe bahar ka hone ka aihsas nahi karaya gaya.
jis aik ghatna ke karan gujarat ki hurriyaat se barabari ker rahe hain, vaisi ghatnaen jub kashmir mein huyin aur hoti rahti hain tub hamare aansoo na jaane kyon sookh jaate hain? aik baar kisi pandit ka blood test kariye, ander se khoon hi niklega, paani nahi.
desh mein jo ho raha hai aur jo pahle bhi ho chuka veh atyand sharmnaak hai. jo bhi ker rahe hain,ve chaahe kisi bhi dharm, ya pradesh, ya samudaay ke hon nindaneey hain. parantu bhai sabka galat galat hi hota hai. chaahe veh gujarat ka galat ho ya kisi anya ka.aisa nahihai ki kashmir ya dilli ka galat justify kiya ja sakta hai aur gujarat ka nahi. marne wale chahe pandit hon ya sikh ya musalmaan, har haal mein peedit hi kahlayenge aur kisi ki mrityu kisi anya se adhik ya kum dukhdaayi nahi hoti.
vaise ab gujarat kuchh bhi ker le, vahan kitne bhi anya dharmon v pranton ke log rah len, kashmir se bura hi kahlayega. kyonki aisa karne mein jo anand aata hai veh kashmir mein aik bhi anya dharmavalambi ya anya prant wale ko na rahne dene per bhi vahan jo ho raha hai uski ninda mein nahi aata. aur uski ninda karne se hamein mahanta ka tamga bhi nahi milta.
ghughutibasuti
सही समय पर सही बात कहने के लिए आभार। बीजेपी, संघ, शिवसेना, राजठाकरे सभी हुर्रियत के दूसरे संस्करण हैं।
अनाम बहन,
यहां मैं धर्म की बात नहीं कर रहा हूं. यह क्षेत्रियता के उभार का संकेत है. जब क्षेत्रवाद हावी होता है तो धर्म भी पीछे छूट जाता है.
आपकी सोच को प्रणाम करता हूँ.
नेनो को छीना नहीं है, उसे मूर्खों द्वारा लात पड़ी तब स्थान दिया है. समझदार होना देशद्रोह है तो वही सही. नेनो महाराष्ट्र जाती तब क्या कहते?
आपकी पोस्ट को हजम करना मुश्किल है, ऐसी विचित्र बातो की आशा नहीं थी.
सबसे पहली टिप्पणी अनाम न हो कर घुघुतीजी की है.
नेनो कार परियोजना राजनैतिक पार्टी की आपसी लड़ाई के कारण पलायन कर गुजरात मैं गई है . चाहते तो सभी पार्टी इस पर मिल बैठकर समाधान निकाल सकती थी .
परियोजना का वंहा जाना वंहा ढांचागत विकास और विश्वाश का परिणाम है . और टाटा का राज्य और राज्य के लोगों पर विशवास किया जाना जीत का जश्न जैसा ही तो है .