
ईसाईयों ने भी आरक्षण पर अपना दावा ठोंक दिया है.जल्द ही चेन्नई में देशभर के ईसाई इकट्ठा होंगे और सरकार पर दबाव बनाने की कोशिश शुरू करेंगे कि उन्हें भी आरक्षण के दायरे में लाया जाए. इसकी तैयारी लंबे समय से चल रही थी. अक्टूबर 2004 में सर्वोच्च न्यायालय ने केन्द्र सरकार को आदेश दिया था कि वह एक ऐसे आयोग का गठन करे जिससे यह पता चले कि देश में अल्पसंख्यकों की वास्तविक स्थिति कैसी है. इसी के बाद सरकार ने रंगनाथ मिश्रा आयोग का गठन किया था. इस आयोग ने अपनी सिफारिश प्रधानमंत्री को सौंप दी है. आयोग ने सिफारिश कर दी है संविधान में बदलाव कर देना चाहिए जो कि अभी जाति और पिछड़ेपन के नाम पर ही आरक्षण देता है. इस बदलाव के बाद ईसाई भी आरक्षण के दायरे में आ जाएंगे.
21 मई को प्रधानमंत्री को सौंपी अपनी रिपोर्ट में आयोग ने बड़ी चालाकी से सिफारिश कर दी है कि ईसाईयों को भी अनुसूचित जाति के तहत आरक्षण का लाभ मिलना चाहिए. जुलाई में सरकार यह रिपोर्ट सुप्रीम कोर्ट को सौंप देगी उसके बाद सुप्रीम कोर्ट को निर्णय करना होगा कि ईसाईयों को दलितों के कोटे से आरक्षण मिलना चाहिये या नहीं.
असल में ईसाई मिशनरियां लंबे समय से इस प्रयास में थीं कि हिन्दू से धर्म परिवर्तन करनेवाले ईसाईयों को भी आरक्षण का लाभ मिलना चाहिए. ऐसा इसलिए भी जरूरी था क्योकि आरक्षण की सुविधा के कारण देश में धर्म परिवर्तन में वह तेजी नहीं आ रही है जिसका प्रयास वेटिकन लगातार कर रहा है. सन 2001 में पोप ने अपनी भारत यात्रा के दौरान ही यह ऐलान कर दिया था कि ईसाईयत के लिहाज से इक्कीसवीं सदी एशिया के लिए है. मतलब साफ है कि वेटिकन और उसके सहायकों का पूरा जोर इस बात पर होगा कि एशिया और खासकर भारत में.

सब जानते हैं कि पिछड़े वर्ग की गरीबी का लाभ उठाकर ईसाई मिशनरियां धर्म परिवर्तन कर रही हैं. वे भारतीय जाति व्यवस्था को पानी पी पीकर गाली देते हैं. फिर ऐसे में अचानक इस तरह भारतीय जाति व्ववस्था के तहत आरक्षण की मांग करके वे क्या साबित करना चाहते हैं. फ्रैंकलिन थामस वे व्यक्ति हैं जिनकी याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने आयोग बनाने का आदेश दिया था. थॉमस बताते हैं कि देश में 2.34 करोड़ ईसाईयों में 1.80 करोड़ दलित हैं. अगर उनके बराबर के ही अन्य भाईयों को आरक्षण का लाभ मिला हुआ है तो दलित ईसाईयों को इसका लाभ क्यों नहीं मिलना चाहिए. इस तर्क के पीछे बड़ी चालाकी से यह बात छुपा ली जाती है कि ईसाईयों में तो जाति व्यवस्था होती नहीं तो फिर ये दलित ईसाई कहां से पैदा हो गये. हिन्दूओं के पिछड़ेपन का ही लाभ उठाकर तो बड़े पैमाने पर धर्म परिवर्तन किया जाता है. अगर धर्म परिवर्तन करने के बाद भी वे दलित और पिछड़े ही रह जाते हैं तो ईसाईयत और हिन्दू धर्म में फर्क क्या है?
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“इस तर्क के पीछे बड़ी चालाकी से यह बात छुपा ली जाती है कि ईसाईयों में तो जाति व्यवस्था होती नहीं तो फिर ये दलित ईसाई कहां से पैदा हो गये. हिन्दूओं के पिछड़ेपन का ही लाभ उठाकर तो बड़े पैमाने पर धर्म परिवर्तन किया जाता है. अगर धर्म परिवर्तन करने के बाद भी वे दलित और पिछड़े ही रह जाते हैं तो ईसाईयत और हिन्दू धर्म में फर्क क्या है?”
एकदम सही कहा, अगर खुद को अब भी दलित ही मानते हैं तो धर्म परिवर्तन किया क्यों। दरअसल यह सब धर्मांतरण का मार्ग प्रशस्त करने की साजिश है, जिसके जरिए विघटनकारी लोग अपनी पैठ बनाना चाहते हैं। इनसे सावधान रहने की जरुरत है, इनके कुत्सित इरादे बहुत खतरनाक हैं।
सत्य वचन. बधाई इस विचारपरक लेखन के लिये.
मैं किसी भी प्रकार के आरक्षण जो धर्म या जाति पर आधारित है, के विरुद्ध हूँ। यह केवल समाज को विघटित ही करेगा और अन्तत: हमें सामाजिक पुन्रुत्थान के लिये कोई और ही तरीका अख़्तियार करना पड़ेगा।
धर्म हमारा व्यक्तिगत मामला है, राज्य का इससे कोई सरोकार नहीं होना चाहिये.
आरक्षण क्यों दिया जाता है? ताकि जो पीछे रह गये हैं, आगे निकल गये लोगों के साथ आ जायें. ये पीछे रह गये मुसलमान भी हो सकते हैं, ईसाई भी या बामन भी.
थॉमस बताते हैं कि देश में 2.34 करोड़ ईसाईयों में 1.80 करोड़ दलित हैं.
कम से कम अब तो दलित से ईसाई बने लोग समझें कि उनकी हैसियत अभी तक वही है जहाँ वह छोड कर आये थे.
सारा का सारा खेल संजय इस बात से है कि आरक्षण की लाठी अगर मुसलमानो और ईसाईयों को नही मिलती है तो कौन दलित अपना धर्म परिवर्तन करायेगा . यह चीख पुकार सिर्फ़ अपनी गिनती को बढाने के लिये ही है जो आज काफ़ी हद तक मध्यम पडती दिख रही है.
आरक्षण बहुत बड़ा लालच है, हर कोई इसके लिए पिछड़ने को तैयार है.
ईसाई अब तक पिछड़ेपन का लाभ उठा कर धर्म परिवर्तन करवाते रहें है, अब जब पिछड़ापन ही लाभकारी हो रहा है तो कौन ईसाई बनेगा, इसलिए ईसाई आरक्षण की माँग उठा रहे हैं.
यह निहायत ही दूष्टता है.
आपने यह रिपोर्ट पढ़ी इसके लिए धन्यवाद.
सटीक लिखा है।
bahut achhe sajay ji . mazaa aa gaya