भारतीय मानस पर लंबे आक्रमण का जो सबसे बुरा प्रभाव हुआ है वह यह कि हमारी शिक्षा हमारे संस्कार से अलग हो गयी है. शिक्षा अपने आप में कोई संस्कार नहीं बची है. शिक्षा भी उद्यम है जैसे जीवन के दूसरे सारे उद्यम. फैक्टरी में काम करने के लिए एक फैक्टरी ब्वाय चाहिए. आफिस में काम करने के िलए एक आफिस व्याय चाहिए. पदवी छोटी बड़ी हो सकती है, तनख्वाह कम ज्यादा हो सकती है लेकिन हालत सबकी आफिस ब्वाय वाली ही है. आप सबको एक ही तराजू पर तौल सकते हैं क्योंकि सब एक ही शिक्षा व्यवस्था से निकल कर बाहर आये हैं.
यह बड़ी भयानक एकरूपता है. यह एकरूपता आज हमारे लिए संकट का सबसे बड़ा स्रोत है. यह कहीं बाहर से नहीं आया है. यह हमारी शिक्षा व्यवस्था की देन है. अंग्रेज आये तो उन्होंने कहा कि तुम लोग तो जाहिल हो. पढ़ना-लिखना आता नहीं. चलो तुम्हें स्कूल ले चलते हैं. उन्होंने स्कूल बनाये. तकनीकि संस्थान बनाये. और लोगों को कहा कि अब पढ़ो इसमें. जैसे पशुओं को नांद में लगा देते है कि लो खाओ. जैसे पशुओं के गले में पगहा डालकर उसे नांद से बांध देते हैं तो उसके विकल्प के सारे रास्ते बंद हो जाते हैं वैसे ही आदमी की शिक्षा के साथ भी हुआ है. उसके सामने विकल्प ही नहीं है. वह उसे शिक्षा नहीं मान सकता जिसे वह अपने अंदर अनुभव कर रहा है. वह उसे शिक्षा मान रहा है जो उसे बाहर से बताया जा रहा है.
अंग्रेजों के जाने के बाद भारत सरकार ने उसी कार्यक्रम को दोगुने उत्साह से लागू किया. भूमंडलीकरण की शुरूआत हुई तो वैश्विक ताकतें भी उसमें भागीदार हो गयीं. शिक्षा उद्योग और व्यवसाय दोनों हो गयी. विकल्प तो पहले ही नहीं था. अब जो कुछ स्वरूप बन गया उसे हम लोग भी गलती से शिक्षा कहते हैं. केवल कहते ही नहीं है बल्कि उसे स्थापित करते हैं. कोई शहरी आदमी आदिवासी इलाकों में जाता है तो वहां शिक्षा देना शुरू करता है. वह यह मानता ही नहीं कि केवल अक्षर ज्ञान शिक्षा नहीं होती और केवल स्कूल की बिल्डिंग ही पाठशाला नहीं होती. जीवन का व्यवहार सबसे बड़ी शिक्षा है और प्रकृति सबसे बड़ी पाठशाला. इसलिए शहर से लोग जब गांवों में जाते हैं तो अपना कूड़ा ज्ञान साफ करने की बजाय वे वही कूड़ा ज्ञान सत्य सनातन जीवन जीनेवाले लोगों पर लादने लगते हैं.
आजकल इधर फिर स्कूलों के सामने भीड़ लग रही है. तीन-तीन साल के बच्चों को भार की लादे लोग स्कूलों में फार्म लेने के लिए लाईन लगाये खड़े हैं. बच्चों को कहीं अच्छे स्कूल में डाल देना चाहते हैं. तीन-चार साल की उम्र में शिक्षा का बोझ? इस पागलपन को क्या कहें? मैंने यह सवाल बहुत सारे लोगों से किया. सबके पास कोई जवाब नहीं है. लेकिन क्योंकि दूसरा भी यही कर रहा है इसलिए वे भी यही करेंगे. जमाने में पीछे नहीं रहना है. जमाने के साथ चलने की होड़ में अपना ही साथ छोड़ रहे हैं. जो उम्र बच्चों में संस्कार देने की होती है वह उनकी स्कूल में बीतती है. मास्टर साहब और स्कूल स्टाफ के दिखावटी पूर्ण व्यवहार के बीच. वह बच्चा क्या सीखेगा? वह अंदर से कितना मजबूत होगा? उसमें संस्कार का कौन सा बीज अंकुरित होगा? वह जीवन में कितना दुख झेलेगा इसका अंदाज है क्या आपको? लेकिन यह सब बातें सोचे कौन? सबको शिक्षा चाहिए, ऐसी शिक्षा जो रोजगार दे सके.
हम कितने मक्कार लोग हैं कि शिक्षा को रोजी-रोटी से जोड़कर बैठ गये बस. रोजी-रोटी का माध्यम शिक्षा नहीं रही है इस देश में कभी. शिक्षा सीधे संस्कार से जुड़ती थी और आपको निखरने का पूरा मौका मिलता था. एक उम्र के बाद आप स्वतंत्र होते थे कि अपने लिए रोजगार का चुनाव कर सकें. फिर जातीय समूहों के बीच रोजगार गारंटी योजना अपने आप ही निहित है इसके लिए किसी नरेगा वगैरह की जरूरत नहीं थी. आज तो हमारी शिक्षा प्रणाली गुलाम पैदा करने की प्रणाली हो गयी है. शिक्षित गुलाम. जब पूरी पढ़ाई कर लेते हैं तब समझ में आता है कि समय तो बर्बाद गया. शिक्षा तो मिली ही नहीं. जो मिला वह तो जानकारियां है. और जो जानकारी होती है वह कई बार काम की होती है और कई बार नहीं होती है.
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अंग्रेजों ने भारत में क्लर्क पैदा करने के उदेश्य से जो शिक्षा पद्धति शुरू की हम अभी तक उसे ही ढो रहे है |
अब व्यावसायिक शिक्षा का ज़माना आ गया है । व्यवहारिक शिक्षा के साथ इस देश ने हज़ारों सालों तक तरक्की करते हुए सोने की चिडिया का दर्ज़ा हासिल किया । जीवन की पाठशाला से व्यवहारिक शिक्षा से मिले अनुभव से समाज को काफ़ी कुछ मिला । यही वजह है कि प्राचीन भारत के वास्तुशिल्प ,जल संरचना ,खगोल शास्त्र संबंधी खोजें आज भी बेमिसाल हैं । बाज़ारवाद और बढते उपभोक्तावाद ने सामाजिक और पारिवारिक ढांचे में तब्दीली ला दी है ,जिसमें संस्कारों की शिक्षा के लिए कोई जगह नहीं है ।
asal me aaj education ke kuch bhi fayda nahi raha na to ye sansakar ko panpa payee na hi rozgar me hi maddgar sabit huyee aaj ek majdoor apne bache ko school nahi behjna chata kyoki wo ye janta hai ki kal ko ye agar pad likh gya to naukri to milni nahi hai magar ye majdoori se bhi jayga
aur sbse badi baat to yeh hai ki hum sab hi vayvastha ko sirf badalna chate hai apne apne kamro me bethkar lekin ek sath milkar sath chale to jaroor iska koi acha vikalp nikal sakte hai islye sabhi se mera yeh anurodh hai sabhi ek sath milkar apni awaj ko buland kare mera cell no. 9268348475 hai, virendersinghind@gmail.com.