जो लोग जानते होंगे वे जानते होंगे कि राम मंदिर आंदोलन के दौरान विश्व हिन्दू परिषद ने राम मंदिर के ईंटों को प्रदर्शित करके करोड़ों रूपये इकट्ठा किये थे. वे पैसे कहां हैं कोई नहीं जानता. कोई पूछता भी नहीं है कि वे पैसे कहां हैं. एक बार लोगों ने सवाल उठाया था तो विहिप ने उस समय कहा था कि पैसा विभिन्न ट्रस्टों के माध्यम से (या फिर एक ही ट्रस्ट के पास) बैंक में जमा है. लेकिन यहां मैं राममंदिर में मिले चंदे का हिसाब नहीं करने जा रहा.
मैं तो एक ऐसी खबर की ओर आपका ध्यान आकर्षित करना चाहता हूं जो उन दिनों की याद दिला रही है जब राम मंदिर आंदोलन का दौर चल रहा था. जो लोग वहां ६ दिसंबर को मौजूद थे वे बताते हैं कि ऐसा पागलपन था कि लोग ईंट, माटी, गारा-चूना-पाथर जिसको जो मिला उठाकर ले भागा था. शायद ऐसा प्रतीक रूप में अपने साथ रखने के लिए किया होगा. अब यही हाल रामसेतु के पत्थरों का हो रहा है.
विहिप और विभिन्न हिन्दू संगठनों के आंदोलन के बाद इस ऐतिहासिक धरोहर के पत्थरों पर शामत आ गयी है. यहां आनेवाले सैलानी पौराणिक पुल के अवशेष से जो पत्थर निकालकर लाये जाते हैं उनको मंहगी कीमत पर खरीद लेते हैं. अब इसमें थोड़ी धोखाधड़ी भी होगी ही. जैसा कि आमतौर पर अपने देश में होता है किसी भी लकड़ी की माला को तुलसी की माला बताकर टिका देने में हम पहले से ही माहिर हैं. इसलिए यहां के स्थानीय दुकानदार मूंगा चट्टानो को भी रामसेतु का हिस्सा बताकर बेच ले रहे हैं. मूंगा चट्टानों की खासियत होती है कि वे नैसर्गिक रूप से तैरती हैं. इसलिए सहज ही यह विश्वास दिलाया जा सकता है कि ये रामसेतु के पत्थर हैं, और देखो कैसे पानी में तैर रहे हैं.
और इस रामसेतु के एक टुकड़े की कीमत? ५०० से १००० रूपया. सीता तीर्थम, राम तीर्थम, लक्ष्मण तीर्थम सब जगह ये रामसेतु के अवशेष बिक रहे हैं. क्या कहा? सरकार कहां है? अरे भाई अगर इस तरीके से ही लोग रामसेतु तोड़कर बेंच लेगें तो सरकार का काम भी हो जाएगा.
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रामसेतु फिर घर घर में होगा?