अभी तो पप्पू की परीक्षा भी नहीं है. फिर भी पप्पू वोट नहीं डालेगा. पप्पू को दो दिन की छुट्टी मिल रही है. वह छुट्टी मनाने जाएगा. ऐसा कभी होता है क्या? दो दिन की छुट्टी एकसाथ. फिर समय क्यों खराब करेगा? वह घर से निकलेगा लेकिन वोट डालने नहीं बल्कि आउटिंग करने. २९ को सटर्डे है और ३० को सन्डे. २९ को दिल्ली में कोई लोकतंत्र वगैरह के लिए वोट कास्टिंग होगा. वही लाईन लगाकर सबके साथ अंदर जाओ. फिर वहां कोई मशीन है उस पर बटन दबाकर बाहर आ जाओ. डिस्गस्टिंग यू नो?
कोई कश्मीर में वोट डालने को अच्छा साईन मान रहा है ये लोग. पप्पू को सब टाईम खराब करनेवाला काम लग रहा है. दो दिन का टाईम है, गर्ल है तो ब्यायफ्रेण्ड और ब्याय है तो गर्लफ्रेण्ड को साथ लेगा. हो सकता है अब ब्वाय ब्वाय के साथ और गर्ल गर्ल के साथ भी हो जाए. वो देखा है न दोस्ताना. वैसा ही कुछ. यू नो. ह्वाई आल हैव टू से? अण्डरस्टैण्ड यार…..वैसा ही. दो दिन के लिए घर से निकल जाने का. इधर दिल्ली में बहुत शोर रहेगा. न्यूज चैनलवाला सब डेमोक्रेसी की बात करेगा. मम्मी डेडी भी बिजी रहेगा. वोट देने में नहीं. सबको ये बताने में कि उन्होंने वोट दिया. ऐसा ही पूरा दिन निकल जाएगा.
सब दुकानें बंद रहेंगी इसलिए इंतजाम पहले से करके रखना. अभी टाईम है. दोस्तों के साथ मिलकर रायल स्टैग या फिर तेरी जो भी पसंद हो उसका क्रेट गाड़ी में रखना और फुल स्पीड में दिल्ली से बाहर चले जाना. वैसे मेरा फार्महाउस है, उधर भी आ सकता है. दो दिन मस्ती करेंगे. दो दिन बाद जब इधर न्वाईज कम हो जाएगा तो आ जाएंगे. ये स्साला डेमोक्रेसी का भी कमाल है. घड़ी-घड़ी आता रहता है. अब मेरे को क्या करना है इससे. तुम लोग इतने साल से राज कर रहा है लेकिन पार्किंग को जगह नहीं मिलती. सड़क पर जगह नहीं है, हाउ टू ड्राईव आन रोड? नो मैनर? ह्वेयर इज डेमोक्रेसी? क्यों वोट डालने का? तुमको डालना है तो डालो. मैं तो इस बकवास को सुननेवाला नहीं.
(यह वर्तमान शिक्षा-दीक्षा में तैयार पप्पू बहुत कम बचा है दिल्ली में. जो बचा है वह भी अमेरिका भागने की तैयारी में है. उसे लगता है कि वह सिर्फ इसलिए पैदा हुआ है कि उसे अमेरिका जाने का वीजा मिल सके. इसलिए जब तक इस देश को झेल रहा है तब तक वह ‘महान लोकतंत्र’ को इसी नजरिये से देखकर घुट-घुट कर जीता है. दिल्ली जैसे महानगर में सबसे कम वोटिंग दिल्ली के मंहगी कालोनियों में होता है और सरकार सबसे ज्यादा काम उन्हें मंहगे लोगों के लिए करती है. यही लोकतंत्र है.)
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पीछले चुनावों में गुजरात में लम्बी लम्बी कारों में आए लोग लम्बी कतारों में खड़े थे. अच्छा लगा था देख कर. पप्पू कम हो रहें है, देश में.
लेकिन दिल्ली में अभी ऐसा नहीं है. पप्पू अभी भी वोट नहीं देता.