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नाजायज लाईव कवरेज बंद होना चाहिए

Posted by संजय तिवारी on Nov 28th, 2008 and filed under कारपोरेट मीडिया. You can follow any responses to this entry through the RSS 2.0. You can leave a response or trackback to this entry

मिनट दर मिनट गोलियों की आवाज से केवल मुंबई के होटल ही नहीं बल्कि पूरा देश (शायद दुिनया भी) सुन रही है. यह बात सही है कि पूरा देश इस समय वहां अटका हुआ है जहां देश के जवान आतंकियों से लोहा ले रहे हैं. लेकिन इलेक्ट्रानिक मीडिया जिस तरह से घटनाओं की लाईव रिपोर्टिंग कर रही है क्या वह जायज है? कल शाम को गृहमंत्रालय की बैठक में सबसे बड़ी चिंता यही थी कि मीडिया ने जिस तरह से रिपोर्टिंग की उससे आतंकियों को मदद मिली है. हो सकता है सरकार जल्द ही मीिडया को ऐसे मुटभेड़ों के दौरान घटनास्थल से दूर रखने के प्रावधान करेगी.

कुछ भी हो, है तो यह गलत. आतंकवादियों से लोहा लेते एनएसजी के कमाण्डों कोई प्रहसन नहीं कर रहे हैं जिसे मनोरंजन के तौर पर इस्तेमाल किया जाए. बात तब और शर्मनाक हो जाती है जब हिन्दी के दो-दो कौड़ी के रिपोर्टर कहते हैं कि “हम सच्ची पत्रकारिता कर रहे हैं और आप तक पल-पल की जानकारी लेकर आ रहे हैं.- इंडिया न्यूज, २८ नवंबर शाम ६.३० बजे.” 

मेरा मानना है कि ऐसे नाजुक मौकों पर इलेक्ट्रानिक मीडिया को दूर-दूर तक फटकने नहीं देना चाहिए. क्योंकि कुछ भी हो जाए टीवी का पत्रकार अपनी बाईट की लालच नहीं छोड़ पाता भले ही इसके लिए कोई भी नुकसान हो जाए. क्योंकि उसका सारा धंधा बाईट कवरेज पर ही टिका हुआ है. ऐसी बहुत सी सूचनाएं और जानकारियां लीक हो जाती हैं जो किसी भी कीमत पर लीक नहीं होनी चाहिए. मसलन कल जी न्यूज से बात करते हए एक बंधक संजय दत्ता ने बताया ताज में सुरक्षाबलों ने उसे कैसे बचाया. उसने सिलसिलेवार सारी बातें बताई.जी न्यूज के संवाददाता ने तफ्शीस से उससे सारी बातें पूछी. यहां तक कि उसे किस रास्ते बाहर लाया गया, सुरक्षाबल आने-जाने के लिए कौन से रास्ते का इस्तेमाल कर रहे हैं और कमरों लिफ्ट का इस्तेमाल कर रहे हैं या नहीं. (रात के कोई १२ बजे की बातचीत है) तब तक जी न्यूज का संवाददाता और एंकर मान चुका था कि शायद ताज मुक्त हो चुका है. लेकिन आज पूरा दिन ताज में लड़ाई चल रही है और अभी भी पता नहीं कितने आतंकवादी बचे हुए हैं.

क्या ऐसी सूचनाओं का इस्तेमाल आतंकियों ने नहीं किया होगा?

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6 Responses for “नाजायज लाईव कवरेज बंद होना चाहिए”

  1. tabir hussain says:

    aapne bikjul sahi kaha hai tv wako ko kya hai apne chanle ko aage badana

  2. Sarvesh says:

    Its pathetic. There is no nationalism among these TV reporters and their owners. They are helping by reporting live videos to terrorists. When will they realize that their greed to become famous. That lady Barakha dutt wants to get award to show that she always report from ground zero. Shame on her. A journalist like her should show way to other journalists rather than getting cheap publicity by reporting from there.
    Chaurasia was showing different different poses by lying, bending, jumping etc. etc. Shame on him. We don’t want to see live. We want to know the news. Don’t give publicity to terrorists.
    Major setback came when journalists(TV) mobbed to comandos and army folks when they came out of Nariman house. This is too much. Government should throw them out from one kilometer of the range.

  3. mehek says:

    sahi kaha

  4. vidhu says:

    ye naajuk maamlaa thaa aur ismain GOPNIYTAA aur ehtiyaat bartnaa jaruri thaa

  5. यह शोक का दिन नहीं,
    यह आक्रोश का दिन भी नहीं है।
    यह युद्ध का आरंभ है,
    भारत और भारत-वासियों के विरुद्ध
    हमला हुआ है।
    समूचा भारत और भारत-वासी
    हमलावरों के विरुद्ध
    युद्ध पर हैं।
    तब तक युद्ध पर हैं,
    जब तक आतंकवाद के विरुद्ध
    हासिल नहीं कर ली जाती
    अंतिम विजय ।
    जब युद्ध होता है
    तब ड्यूटी पर होता है
    पूरा देश ।
    ड्यूटी में होता है
    न कोई शोक और
    न ही कोई हर्ष।
    बस होता है अहसास
    अपने कर्तव्य का।
    यह कोई भावनात्मक बात नहीं है,
    वास्तविकता है।
    देश का एक भूतपूर्व प्रधानमंत्री,
    एक कवि, एक चित्रकार,
    एक संवेदनशील व्यक्तित्व
    विश्वनाथ प्रताप सिंह चला गया
    लेकिन कहीं कोई शोक नही,
    हम नहीं मना सकते शोक
    कोई भी शोक
    हम युद्ध पर हैं,
    हम ड्यूटी पर हैं।
    युद्ध में कोई हिन्दू नहीं है,
    कोई मुसलमान नहीं है,
    कोई मराठी, राजस्थानी,
    बिहारी, तमिल या तेलुगू नहीं है।
    हमारे अंदर बसे इन सभी
    सज्जनों/दुर्जनों को
    कत्ल कर दिया गया है।
    हमें वक्त नहीं है
    शोक का।
    हम सिर्फ भारतीय हैं, और
    युद्ध के मोर्चे पर हैं
    तब तक हैं जब तक
    विजय प्राप्त नहीं कर लेते
    आतंकवाद पर।
    एक बार जीत लें, युद्ध
    विजय प्राप्त कर लें
    शत्रु पर।
    फिर देखेंगे
    कौन बचा है? और
    खेत रहा है कौन ?
    कौन कौन इस बीच
    कभी न आने के लिए चला गया
    जीवन यात्रा छोड़ कर।
    हम तभी याद करेंगे
    हमारे शहीदों को,
    हम तभी याद करेंगे
    अपने बिछुड़ों को।
    तभी मना लेंगे हम शोक,
    एक साथ
    विजय की खुशी के साथ।
    याद रहे एक भी आंसू
    छलके नहीं आँख से, तब तक
    जब तक जारी है युद्ध।
    आंसू जो गिरा एक भी, तो
    शत्रु समझेगा, कमजोर हैं हम।
    इसे कविता न समझें
    यह कविता नहीं,
    बयान है युद्ध की घोषणा का
    युद्ध में कविता नहीं होती।
    चिपकाया जाए इसे
    हर चौराहा, नुक्कड़ पर
    मोहल्ला और हर खंबे पर
    हर ब्लाग पर
    हर एक ब्लाग पर।
    - कविता वाचक्नवी
    साभार इस कविता को इस निवेदन के साथ कि मान्धाता सिंह के इन विचारों को आप भी अधिक से अधिक लोगों तक पहुंचकर ब्लॉग की एकता को देश की एकता बना दे.

  6. अशोक पाण्‍डेय says:

    आपकी बातों से पूर्ण सहमति है।

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