और क्या कहें? मतदान जरा शिष्ट शब्द है. थोड़ा विशिष्ट लगता है लेकिन वोटदान में क्या बुराई है? थोड़ा असहज लगता है लेकिन दोनों का अर्थ तो एक ही है. आपको कुछ देकर आना है. और देने का नियम यह है कि आप दान करने के बाद कुछ भी अपेक्षा मत करिए. दान करने के बाद अगर आप अपेक्षा करते हैं तो आपका दान खण्डित हो जाता है. मुश्किल तब शुरू होती है जब हमें सिखाया जाता है कि आप अपने जन-प्रतिनिधि से अपेक्षा करिए क्योंकि आपने वोटदान किया है. अब एक ओर अपनी शास्वत समझ कि दान करने के बाद कुछ अपेक्षा नहीं करनी चाहिए और दूसरी ओर यह शिक्षा कि अपने जनप्रतिनिधि से अपने कामों के लिए अपेक्षा रखिए, विरोधाभाषी बात है. फिर दान के साथ एक और समझ काम करती है कि आप दान गुप्त रखिए. इसलिए किसी को बताने की जरूरत नहीं है. आज भी भारत में ऐसे करोड़ों मतदाता हैं जो किसी कीमत पर यह नहीं बताते कि उन्होंने अपना मत किसे दान किया है. यह मेरा पक्का अनुभव है इसलिए जब टीवी चैनलों पर एक्जिट पोल देखता हूं तो समझना मुश्किल लगता है कि यह सच कैसे हो सकता है? पार्टियों के खुले समर्थकों को छोड़ दें तो शायद ही कोई होगा जो ईमानदारी से यह बताता हो कि उसने किसे मतदान किया है?
लेकिन इस बार दिल्ली में मैंने पहली बार मतदान किया है. आठ साल से यहां हूं और इस साल में यहां के नागरिकों में शामिल हो गया हूं. एक तरह से सरकारी मान्यता के साथ दिल्ली का निवासी हो गया हूं. मेरे इलाके जंगपुरा (निर्वाचन क्षेत्र-४१) से विधायक पद के लिए दो प्रमुख उम्मीदवार मैदान में हैं. नये परिसीमन के बाद यह इलाका पंजाबी समुदाय के प्रभुत्व में आ गया है इसलिए कांग्रेस और भाजपा दोनों ने ही सिख उम्मीदवार मैदान में उतारे हैं.
मेरे सामने मुश्किल यह थी मैं क्यों मतदान करने जाऊं? भाजपा के उम्मीदवार अकाली दल के सिरसा को देखकर लगता नहीं कि उसे सेवा का स भी पता होगा. करोड़ों-अरबों का व्यापार है और वोक्सवैगन की मंहगी एसयूवी में उसने अपना सारा चुनाव प्रचार किया. यही हाल कांग्रेस के प्रत्याशी का है लेकिन गनीमत है कि वह व्यापारी नहीं बल्कि राजनीतिज्ञ है. लेकिन उसने भी अपना चुनाव प्रचार ठेंठ गुण्डई वाले अंदाज में किया. घर-घर भले ही न गया हो लेकिन गली-गली यात्राएं तो उन्होंने की ही. इसलिए इन दोनों में ही अपनी कोई रूचि नहीं थी. किसी पार्टी में कोई आस्था नहीं है. सब एक जैसे लगते हैं. इस ढांचे से कोई सार्थक नतीजा निकल सकता है यह भी उम्मीद नहीं है.
लोकतंत्र का यह स्वरूप हमारे स्वभाव का नहीं है. अभी भी हमें यह एक काम लगता है और सरकार को वोट देने के लिए लोगों के बीच अभियान चलाना पड़ता है कि यह आपका अधिकार है और आपको इसका उपयोग करना चाहिए. साफ है लोगों के लिए वोटदान उत्साह, भागीदारी और जिम्मेदारी का विषय नहीं है बल्कि एक प्रकार का सरकारी काम नजर आता है जिसे कर देना चाहिए नहीं तो हो सकता है किसी प्रकार का कानून का उल्लंघन हो जाए. पिछले साठ सालों में इससे अधिक समझ नहीं विकसित हो पायी है. इस ढांचे को स्वीकार करने में शायद साठ साल और लगेंगे.
असल में इस निरूत्साह का एक कारण और है कि हमारे आस-पास का माहौल हमें जैसी शिक्षा देता है यह लोकतांत्रिक ढांचा बिल्कुल उसके उलट है. भारतीय समाज परिवार मूलक है जो अपनी जरूरतों के लिए किसी राज पर नहीं बल्कि समाज पर निर्भर रहता है. यह लोकतंत्र हमें पग-पग पर सिखाता है कि आपको अपनी हर जरूरत के लिए सरकार पर निर्भर रहना चाहिए. जबकि हमारे स्वभाव में यह बात है ही नहीं. हम लोग बिना सरकार के जीने के अभ्यस्त हैं. लेकिन सरकार है कि हमारी जिम्मेदारी लेने से बाज नहीं आ रही. फिर सरकार ने अपने और हमारे बीच अब बाजार को लाकर खड़ा कर दिया है. बात और बिगड़ गयी है.
खैर, मैंने तय किया कि मैं किसी पार्टी को वोट नहीं दूंगा. लेकिन वोट दूंगा. फिर मेरे वोट देने का आधार क्या होगा? मैंने तय किया मैं उसे अपना वोट दूंगा जो सबसे कमजोर प्रत्याशी होगा. इससे मैं मतदान का भागीदार हो जाऊंगा लेकिन मैं किसी पार्टी विशेष का हिस्सा नहीं होऊंगा. मैं मतदान केन्द्र पर गया और…………….
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