मुंबई में आतंकी हमले के बाद कारपोरेट मीडिया अपने आकाओं (कंपनियों और उसके चट्टुओं) के लिए मीडिया से अधिक आंदोलनकारी की भूमिका में आ गया है. इलेक्ट्रानिक मीडिया एक दो फाईवस्टार होटलों में हुए हमलों को जिस तरह से जंग पर उतारू है वह निश्चित रूप से परेशान करनेवाला है. इलेक्ट्रानिक मीडिया जो भूमिका निभा रहा है वह मीडिया से ज्यादा वफादार कुत्ते की भूमिका है जो अपने मालिक के लिए भौंकता है. अगर यह वफादार कुत्ता देश के आम नागरिकों के दुख-दर्द के प्रति इतना वफादार होता तो बात इतनी अखरती नहीं. 
इलेक्ट्रानिक मीडिया के कुछ अंग्रेजी चैनल इस समय भिन्नाए हुए हैं और वे एक आतंकी वारदात को रिपोर्ट करने, उसकी जानकारी देने से आगे के ाम को अंजाम दे रहे हैं. ऐसे चैनलों की भाषा और खबरनवीसी देखेंगे तो समझ आ जाएगा िक वे खबर देने से आगे का काम कर रहे हैं. क्यों? क्योंकि इस बार हमला उन अमीरी और अय्याशी के उन सुरक्षित गढ़ों पर हुआ है जो इस देश के चंद अमीरों की झूठी शान का दिखाने का अड्डा है. निश्चित रूप से इस घटना की निंदा होनी चाहिए और आगे से ऐसी घटनाएं न हों ऐसी व्यवस्था होनी चाहिए. लेकिन सुरक्षित केवल ताज और ओबेराय ही क्यों हों? या फिर किसी शहर का एकाध हिस्सा बाकी हिस्सों से अधिक सुरक्षित क्यों हो? सुरक्षा तो पूरे देश की होती है. एकसमान होती है.
फिर ये पूंजीपति और उनके पिट्ठू इलेक्ट्रानिक चैनल सिर्फ एक खित्ते पर हुए हमलों को देश पर हमला बता रहे हैं? यह देश पर हमला होता अगर वह खित्ता देश के बाकी लोगों के दुख दर्द के साथ जुड़ा होता. इलेक्ट्रानिक चैनलों की हिम्मत देखिए. वे राजनीतिक लोगों के चरित्र पर सवाल उठा रहे हैं. एक ऐसा माहौल बनाने में लगे हैं कि इस देश का राजनीति वर्ग बिल्कुल नाकारा है. राजनीतिज्ञों को सड़कों पर खड़ा करके गोली मार देना चाहिए. लेकिन इलेक्ट्रानिक चैनलों के ये पट्टाधारी रिपोर्टर आज अगर इस तरह से अभियान चला रहे हैं तो इसके लिए भी राजनीतिक वर्ग ही दोषी है. राजनीतिक लोग आम आदमी के वोटों से चुनकर वहां पहुंचते हैं लेकिन वहां पहुंचने के बाद वे हमेशा खास आदमियों के लिए काम करते हैं जिनका न राजनीतिक प्रणाली में कोई विश्वास है और न ही इस देश के लोकतंत्र में. लेकिन आश्चर्यजनक रूप से इसी गिटपिटाया जमात के लिए राजनीतिक और प्रशासनिक वर्ग हमेशा काम करता है.
इलेक्ट्रानिक मीडिया द्वारा राजनीतिक बलि लेने का सिलसिला जारी है. शिवराज पाटिल, आरआर पाटिल के बाद अब निशाने पर भाजपा के मुख्तार अब्बास नकवी हैं. नकवी ने कहा कि लिपस्टिक लगाकर और पाउडर पोतकर जो लोग आतंक के खिलाफ नारा लगा रहे हैं उनके वश में कुछ है कि वे इसे रोक पायेंगे. क्या गलत कहा नकवी ने? एक झिंगूर देखकर घर के बाहर भाग जानेवाले लोग असल में हर प्रकार के आतंक के जन्मदाता होते हैं. आज अगर देश में नक्सलवाद की समस्या है तो उसके मूल में कौन लोग हैं? आज अगर देश में आतंकवाद की समस्या है तो उसके मूल में कौन है? कौन सा वह लालची वर्ग है जो अपनी लालच को पूरा करने के लिए समाज में विषमता पैदा कर रहा है? आप सबको भ्रम है कि वह राजनीतिक लोग हैं. साहब, अब समाजवाद का जमाना नहीं है जहां राजनीतिक व्यक्ति ही सर्वोपरि होता था. यह पूंजीवाद का युग है. और इस पूंजीवादी युग में पूंजीपति राजनीतिक लोगों को सिर्फ प्रयोग करता है. आज उस पर आतंकी हमला हुआ तो उसने अपने पालतू कुत्तों को राजनीतिक लोगों को काटने के लिए ही छोड़ दिया है.
नतीजा आप सबके सामने आ रहा है. मुंबई के होटलों पर हुए आतंकी हमले हमें यह भी बताते हैं कि इस देश में पूंजीपति कितना ताकतवर हो चुका है. असल में सरकार नाम की मशीनरी उसकी बंधुआ मजदूर होकर रह गयी है और मीडिया का बड़ा वर्ग उसका पट्टेदार सेवक.आम आदमी न कल कहीं था और न आज कहीं है, और ऐसे ही रहा तो आनेवाले वक्त में कल कहीं होगा भी नहीं.
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bahut hi achchha lekh. media ki bhumika behad kharab…
गजब का लेख प्रतीत होता है