हिन्दी ब्लागरी की शुरूआत कोई पुरानी घटना नहीं है. यह ताजा तरीन बात है. मैं आज कुछ आधुनिक तकनीकों पर काम करता हूं. विस्फोट वेबसाईट मैनेज करता हूं और कुछ ऐसी तकनीकों पर थोड़ी बहुत पकड़ बन गयी है जिसके बारे में आज से साल डेढ़ साल पहले तक सोच भी नहीं सकता था. यह सब ब्लागरी की देन है. ब्लागरों का सहयोग है. लेकिन पिछले डेढ़ साल में ब्लागिंग की पृष्ठभूमि में मैं देख रहा हूं कि एक और व्यक्ति ने यह प्रयोग किया है. यशवंत सिंह. भड़ास ब्लाग के माडरेटर. अब हिन्दी के अच्छे खासे चलनेवाले मीडिया पोर्टल भड़ास 4 मीडिया के संपादक.
उन्होंने जुमला पर काम किया और मैंने वीवो पर. मुझे याद है यशवंत सिंह कहने लगे कि गुरू मेरा पोर्टल बना दो. हम लोग मिलकर बहुत काम कर सकते हैं. मैंने मना कर दिया. मैंने कहा कि मैं रास्ता तो बता सकता हूं लेकिन आपके लिए पोर्टल डिजाईनिंग का काम नहीं कर सकता. मैं चाहता हूं आप खुद जूझिए. लड़िए. हो सकता है आप जीत जाएं और यह भी हो सकता है कि आप हार जाएं. लेकिन जो भी हो करना आपको ही होगा.

भड़ास के माडरेटर यशवंत सिंह
मैं यशवंत सिंह से इसलिए भी प्रभावित हूं कि उन्होंने वह किया. कोई तकनीकि पृष्ठभूमि नहीं है. और वेबसाईट बनाने के पहले वे जिस तरह से बात करते थे उससे साफ था कि वे भी उसी रोग के शिकार हैं जिसका शिकार पूरा हिन्दी समाज है. वह रोग क्या है? हिन्दीवाले हमेशा दूसरे को अपने से कमतर समझते हैं. कई बार कुछ न जानते हुए भी अपने आप को बड़ा ज्ञानी मान बैठते हैं. नयी तकनीकि तो छोड़िये नये विचारों तक से वास्ता नहीं रखते. खड़े-खड़े सड़ जाएंगे लेकिन एक कदम आगे नहीं चलेंगे. यह हिन्दी का समाज है.
लेकिन यशवंत ने भड़ास4मीडिया का जो प्रयोग किया उसमें वे भयानक रूप से सफल हैं. आज हिन्दी मीडिया जगत में उनके पोर्टल का डंका बजता है. सारा खेल कुल जमा आठ महीनों का है. एक बार बालेन्दु दाधीच ने लिखा था कि एक वेबसाईट संचालक या ब्लागर को सफल होने के लिए क्या क्या करना चाहिए. बालेन्दु ने जो कसौटियां बताई थीं यशवंत उन सब पर खरे उतर रहे हैं. वे कन्टेट का काम कर रहे हैं. मार्केटिंग कर रहे हैं और धन भी जुटा रहे हैं. ऊपरी तौर पर यह लग सकता है कि यह किसी व्यक्ति विशेष की सफलता है लेकिन वास्तव में यह हिन्दी भाषा की सफलता है. आज उनके पोर्टल के कारण बहुत सारे अंग्रेजी के भी पत्रकार हिन्दी में खबरे पढ़ते हैं.
क्या यह काम अकेले यशवंत ही कर सकते हैं? दूसरा कोई क्यों नहीं कर सकता? कम से कम ब्लागरों से यह उम्मीद की जानी चाहिए कि वे आगे आकर पोर्टल और वेबसाईट में हाथ आजमाएं. जो पत्रकार ब्लागर हैं उनसे तो मेरी खास उम्मीद है कि वे ऐसा करें क्योंकि इस मंदी के दौर में वे एक स्वतंत्र और अच्छे पोर्टल की नींव डाल सकते हैं.
लेकिन यह सब कैसे होगा? हिन्दी का समाज मुफ्तखोरी से बाज आये तो आगे कुछ करने की सोचे. हिन्दी समाज में अधिकांश लोग मुफ्तखोरी के रोग से ग्रस्त हैं. ब्लाग में कुछ भी लिखा जा सकता है. क्योंकि यहां कुछ खर्च नहीं करना होता. केवल समय लगाना है. और हिन्दीवालों के पास समय के अलावा कुछ है ही नहीं. दिन-रात समय ही समय है. तो ऐसे लोगों से हिन्दी क्या उम्मीद करेगी? वे जिस ओर सक्रिय हैं उसका कोई लाभ किसी को नहीं मिलनेवाला. खुद उनको भी नहीं और एक दिन ऐसा आयेगा जब वे खुद ही निराश होकर बैठ जाएंगे. मेरा मानना है कि यशवंत ने अपने विषय पर पकड़ बनाकर एक अच्छा उदाहरण प्रस्तुत किया है कि वेब का कैसा उपयोग किया जा सकता है. इसके लिए किसी खास तकनीकि दक्षता और ढेर सारे पैसे की जरूरत नहीं होगी. अगर कुछ चाहिए तो सिर्फ थोड़ा सा जूझने का माद्दा और काम करने की मानसिकता.
क्या साल 2009 में हम उम्मीद करें कि कुछ ऐसे ब्लागर अपने पोर्टल की जंग लड़ेंगे और सफल होंगे जो कि आज केवल मुफ्त में ब्लाग लिख रहे हैं. मैं जानता हूं कि आपके मन में बहुत सारे सवाल आयेंगे और तर्क भी. लेकिन अपना पोर्टल बनाने के बाद ही आप समझ पायेंगे कि ऐसी सलाह का क्या मतलब था. तब शायद आप अपना ही ज्यादा बेहतर मूल्यांकन कर पायेंगे. मुक्त और मुफ्त का फर्क भी समझ में आ जाएगा.
मुझे नहीं लगता कि आप ऐसा स्वर्णिम अवसर अपने हाथ से जाने देंगे. क्योंकि आज से चार साल बाद शायद इतना मौका नहीं होगा क्योंकि तब बहुत सारे पैसेवाले लोग इस “धंधे” में काबिज हो चुके होंगे. और हम आप एक दूसरे की टांग ही खींचते रह जाएंगे.
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sanjay bhayi
sundar likha hai. apni photo dekhkar dil बाग-बाग ho gaya hai.
waise, ye sahi hai ki aaj hindi waalon ko agar web par kuchh apna kaam karna hai to uskie liye sahi mauka hai. bas, kuchh din joojhne-sikhne aur rone ke liye taiyaar rahna chahiye, eske baad phal meetha aayega.
yashwant
09999330099
bahut sahi likha sanjay tiwari ne aur bahut acha jawab diya yashwant ne. allankaar ki bhasha main dono mahanubhawon ki tulna hindi ki filmi duniya ke directors se karoon to sanjay tiwari ko parkash jha jaisa gambhir patarkaar hai aur yashwant subhash ghai ki tarah thora thora sadhan juta kar ban raha showman subhash ghai. Rahi baat hindi portel ki to isme bhawishya bahut ujjawal hai. yadi media ke diffrent segment se jurhe log mil kar koshish karen to kaamyabi ke chances jyada hai, naya saal mubarak ho, SHABA KHAIR
Arjun Sharma
Jounior student of journalism
संजय जी ने सुगर कोटिंग के साथ भड़ास4मीडिया पर जो विस्फोट.कॉम किया अच्छा लगा. उस से भी मधुर लगा यशवंत जी का उन तथ्यों को सहजता से स्वीकार करना और उजागर करना कि उनकी हिन्दी समाज और हिन्दी ब्लागर्स के लिए भविष्य की योजनायें क्या हैं.
संजय जी का सुझाव अच्छा है कि और पत्रकार भाई जो ब्लागर हैं वे भी पोर्टल उद्यमी बन सकते हैं, लेकिन सवाल यह है कि हर इंडस्ट्री में बाद में जो सुधार होता है उसमे कई सुधार की आंधी में बह जाते हैं.उदाहरण के तौर पर डॉट.कॉम उद्योग को ही लें, कई बन गए तो कई गुमनामी के अंधेरे में खो गए.
इसका दूसरा पहलु यह भी कि जब तक प्रयोग न होंगे तब तक परिपक्वता भी नही आएगी. तो क्यों न संजय भाई और यशवंत भाई अलग अलग प्रयोग करते हुए भी नवागंतुकों का मार्ग दर्शन करें? सहजीविता के पश्चात् योग्यतम की उत्तरजीविता का सिद्धांत लागू होना ही नव-उद्यमियों के लिए श्रेयस्कर होगा.
भड़ास निकलेगी तो विस्फोट होना लाजिमी है, और विस्फोट सदैव नव- सृजन के लिए राह बनाता है. नए साल पर यही उम्मीद कर सकता हूँ कि ब्लागिंग की दुनिया और परिपक्व होगी और फलेगी फूलेगी. सभी विस्फोटक भड़ासियों को नव वर्ष की हार्दिक शुभकामनायें…
जय भड़ास
सादर
अनुराग
सरस्वती संग लक्ष्मी का, करवाते गठजोङ.
संस्कृति-विरूद्ध काम की, बालेन्दु की होङ.
बालेन्दु की होङ, रंग ला सकती गाढा.
समय-चक्र उल्टा-पुल्टा है,और भी गाढा.
कह साधक हैव्यंग बङा हम ब्लागरों संग.
करवाते गटःअजोङ, लक्ष्मी का सरस्वाती संग.
हिन्दी का पहला पोर्टल, देखा पहली बार.
पता नहीं क्या-क्या भरा,आऊँ फ़िर एक बार.
आऊँ फ़िर एक-बार, कलम की धार तेज कर.
जल-थल-नभ में ऊँचा गूँजे हिन्दी का स्वर.
कह साधक कवि, बनवाता हूँ बेव-पोर्टल.
देखा पहली बार, हिन्दी का पहला पोर्टल.