मेरे मन में यह सवाल बार-बार आता है कि पत्रकार बातूनी क्यों होते हैं? क्या पत्रकारों को इतनी बात करनी चाहिए जितनी आजकल के तथाकथित पत्रकार करते है?
जबसे विस्फोट.कॉम शुरू किया है, इसी एक बात ने मुझे सबसे ज्यादा परेशान किया है. मेरे संपर्क में जितने भी लोग आते हैं वे विस्फोट की सामग्री की तारीफ करते हैं. वे मानते हैं कि लेखन तो ऐसा ही तथ्यपरक होना चाहिए. सवाल तो ऐसे ही उठाये जाने चाहिए. वेब अच्छा माध्यम है, इसका ऐसा ही उपयोग किया जाना चाहिए. उसके बाद जैसे ही मैं कहता हूं कि आप भी कुछ लिखिए तो दो तरह की प्रतिक्रिया आती है.
या तो वे वादा करते हैं और एक बार जान छूट गयी तो दोबारा संपर्क नहीं करते. ऐसा क्यों होता है इसे कोई भी आसानी से समझ सकता है. लेकिन एक और बात भी होती है. लोग फोन करके सलाह देते हैं कि तुम्हें ऐसे करना चाहिए. मैं कहता हूं कि भाई कैसे पत्रकार हो जो स्टोरी आईडिया बांट रहे हो. अरे, तुम्हारे मन में कोई स्टोरी आईडिया आया है तो उसे तुम्हें खुद लिखना चाहिए या फिर चर्चा करके इतिश्री कर लेना चाहते हो.
आमतौर पर लोग लिखते नहीं. चौराहेबाजी करते हैं. हो सकता है यह इस देश के स्वभाव के अनुकूल हो लेकिन इस युग में कुछ लोगों को तो यह स्वभाव छोड़ना पड़ेगा. आप देश में किसी भी पत्रकार संगठन, समूह या ऐसे किसी स्थान पर चले जाईये जहां पत्रकारों का जमावड़ा होता हो वहां लोग आपको बात करते हुए मिल जाएंगे. बहुत बात करते हैं. लंबी चौड़ी बातें करते हैं. अपने यहां आईएनएस बिल्डिंग तो बचकचरा का अड्डा ही है. मेरे मन में बार-बार यह सवाल आता है कि जो बात करते हैं वो काम कैसे कर सकते है?
क्योंकि बात करनेवाला काम नहीं कर सकता. यह प्रकृति के नियम के विरूद्ध हो जाएगा. हम अपने आस पास जो घटनाएं देखते हैं उस पर प्रतिक्रिया करते हैं. यह बहुत स्वाभाविक है. चाय की दुकान पर बैठा व्यक्ति भी प्रतिक्रिया करता है और खोखली पार्टिंयों में मंहगी गाड़ियों में आनेवाला भी बात करता है. ये लोग तो पत्रकार नहीं हो सकते. क्योंकि उनके मन में जो प्रतिक्रिया हुई वह उन्होंने बात करके बाहर निकाल दी. अब पत्रकार तो वह है जो रिपोर्ट करता हो. खालिस रियेक्शन से भी बात नहीं बनेगी. उसे तो घटना को समझने की कोशिश करनी होगी और जो भी केन्द्रीय भाव उसे समझ में आता है उसे पकड़कर रिपोर्ट करना होगा.
मेरा मानना है कि बातूनी पत्रकार किसी काम के नहीं होते. वे सिर्फ बात कर सकते हैं पत्रकारिता नहीं कर सकते. लेकिन कोई सुने भी तो तब जब बात करने से फुर्सत मिले.
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ज्यादा जानकारी नही है पत्रकारों के बारे में।इस का जवाब कोई पत्रकार ही दे सकता है।वैसे हम तो पत्रकार को बहुत गंभीर प्राणी मानते रहे हैं।
पत्रकारों के बीच एक ये भी रवैया देखता हूं कि वो लिखने को कोई जरुरी चीज नहीं मानते। लिखने से कुछ नहीं होता,यह मानसिकता लोगों के बीच जमता जा रहा है। इसे आप लिखे गए शब्दों का असर कम हो जाने की बात कहिए या फिर भरोसा के कम हो जाने की बात कहिए लेकिन वास्तविक स्थिति वाकई चिंताजनक है। मैं अपनी कहूं,पहले बहुत बोलता था, हर मसले पर, हम मुद्दे पर लेकिन इसी बात को कोई लिखने कह दे तो न जाने उसके आगे कितने कागजों के टुकडे फैला दूं। करियर के तौर पर हमेशा उसी क्षेत्र में जाना चाहा, जहां बहुत बोलना पड़ता है।
लेकिन दिनभर बकते रहने के बाद भीतर से एक कमी, चिड़चिड़ापन और अधूरापन महसूस करता हूं।
अब, अब तो लिखे बिना रहा नहीं जाता।…
bandhu,
hum patrkar log esliye batuni hote hai ki jyada baat kerke hi hum kisi se jyada bulwa sakte hai… or es trah jyada jankari juta sakte hai….