ब्लाग बनाना अब बहुत आसान काम है. वेबसाईट बनाना भी कोई मुश्किल काम नहीं है. हिन्दी में काम करना और लिखना भी बहुत आसान है. सब आसान है तो फिर मुश्किल क्या है? कोई शक नहीं कि अभी इंटरनेट का विस्तार अपनी शुरूआती अवस्था में है. कुल छह करोड़ उपभोक्ताओं की जमात में कितनी जमा हमारी हिन्दी के पास हैं कहना मुश्किल है. फिर भी ज्यादा तो नहीं है. लेकिन इधर एक साल में छलांग बहुत ऊंची लग गयी है. यह छलांग दो तरह से लगी है.
लेखकों ने ब्लाग बनाने की परिपाटी शुरू कर दी है. हर लेखक का एक ब्लाग तो होना ही चाहिए. इसका फायदा यह है कि हिन्दी की सामग्री इंटरनेट पर बढ़ रही है और सामग्री पर घरानों का वर्चस्व टूट रहा है. अब आपको लिखने के लिए सिर्फ प्रतिभा और एक अदद ब्लाग चाहिए. पढ़ने वाले कहीं न कहीं से आ ही जाते हैं. कह सकते हैं कि लेखकों के लिए मुक्ति का रास्ता मिल गया है. थोड़े दिनों पहले तक मैं भी यही सोचता था. लेकिन अब बार बार मन में सवाल आता है कि यह मुक्ति का रास्ता क्या मौत से होकर गुजरता है?
सवाल यह है कि गूगल और लेखकों के बीच जो छोटे खिलाड़ी बच जाते हैं वे क्या करेंगे? सबके लिए गूगल होना संभव नहीं है. तो क्या हम उम्मीद करें कि इंटरनेट की दुनिया के मंझोले खिलाड़ी भी किसी दिन अपना ब्लाग लिखते नजर आयेंगे? शायद हां, शायद ना.
हां इसलिए क्योंकि भविष्य में मीडिया का स्वरूप पूरी तरह से बदल जाएगा. भविष्य में मीडिया के बिचौलिये गायब हो जाएंगे. मसलन, लालकृष्ण आडवाणी ने अपनी वेबसाईट बनाकर संकेत दे दिया कि वे मीडिया उद्योग में सीधे हस्तक्षेप कर रहे हैं. आज आडवाणी की वेबसाईट जिस प्रसिद्धि पर है वह चाहे तो विज्ञापनों से बेहतर कमाई कर सकती है. लेकिन क्या आडवाणी ने साईट बनाकर गलती की है? मुझे लगता है उन्होंने बहुत बड़ी गलती की है. क्योंकि जो काम एक पूरा समूह उनके लिए करता वह उन्होंने सीधे करना शुरू कर दिया तो समूह ने उनकी गतिविधियों से अपनी नजर फेर ली. अब वे भी एक पक्ष होकर रह गये हैं.
सीधे संवाद का यह नया जरिया इंटरनेट मुक्ति का अहसास कराता है. वह पहुंच को सीधे आपके हाथ में सौंप देता है. आप जिनके बीच जाना चाहते हैं वह आपके सामने आ जाता है. फिर दुनिया में कुछ बड़े मीडिया हाउस होंगे जिनका विस्तार और प्रभाव वैश्विक होगा. उन्हीं के प्रभाव और पहुंच में व्यक्तिगत लेखक ब्लाग या वेबसाईट बनाकर अपनी कला और समझ को लोगों के सामने रखेंगे. इसकी शुरूआत हो गयी है.
अगर ऐसा होता है तो यह किसके लिए फायदेमंद और किसके लिए नुकसानदेह होगा? हिन्दी में ही अगले दस साल में एक करोड़ वेबसाईट बनने की पूरी संभावना है. कोई आठ-दस करोड़ ब्लाग भी बन जाएंगे. तो? उसके बाद मीडिया का जो नया स्वरूप उभरेगा क्या उसमें नये तरह के बिचौलियों का जन्म नहीं होगा? क्या भविष्य में ग्रुप और समूह प्रासंगिक नहीं रहेंगे? क्या एक बड़े सर्च इंजन और निजी ब्लाग वेबसाईट के बीच किसी दूसरे के लिए कोई जगह नहीं होगी? संभावना का सूत्र यहीं छिपा हुआ है. पता नहीं क्या होगा यह तो अभी से नहीं कहा जा सकता. लेकिन व्यक्तिगत स्तर पर अगर इंटरनेट मुक्ति का मार्ग है तो यह मौत के बाद ही मिलेगी. जो सफल होना चाहते हैं उन्हें समूह के स्तर पर सोचना होगा. अन्यथा जिस काम को आप अपने लिए आधार बना सकते थे वह मुफ्त में बह जाएगा. फिलहाल तो इंटरनेट उत्साही (जैसे मैं खुद) लोगों के लिए मुक्ति का रास्ता दिखाता नजर आता है लेकिन ऐसा लगता है धन किसी न किसी दिन यहां भी भारी पड़ जाएगा और उत्साह दुम दबाकर निकल लेगा. फिर, वही दुनिया होगी और बिचौलिए एक बार पूंजी के सहारे अपना वर्चस्व कामय कर लेंगे.
तो क्या जो क्षणिक मुक्ति का उत्सव मना रहे हैं वह उनका मौत महोत्सव है? या फिर नये मीडिया घरानों का उभार हो रहा है? सोच रहा हूं, किसी नतीजे पर नहीं पहुंचा हूं. कहीं पहुंचा तो आपसे बाटूंगा जरूर.
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