अभिव्यक्ति की चरम अवस्था क्या होती है? वह कितनी स्थूल या फिर कितनी सूक्ष्म होती है? आपको जानकर आश्चर्य होगा कि अभिव्यक्ति का चरम मौन होता है. अभिव्यक्ति का हर प्रकार चरम पर पहुंचकर मौन धारण कर लेता है. ध्वनि का सिद्धांत भी यही कहता है. जब हमारी ग्रहण क्षमता से ऊंचा शोर होता है तो हमें सुनाई नहीं देता. यह प्रकृति की व्यवस्था है.
फिर चरम की अभिव्यक्ति तक हम जाते भी नहीं है. क्रोध और गुस्से का चरम है मौत. विनाश. हमें किसी दिन इतना गुस्सा आये कि हमारे दिमाग की नसें सुन्न हो जाएं, हृदय की धड़कने इतनी तेज हो जाएं कि रक्त वाहिनियों से खून फटकर बाहर निकल जाए. इतना गुस्सा आये तो शायद हम कह सकते हैं कि हम गुस्से के चरम तक पहुंचे हैं. क्या हमने कभी ऐसा गुस्सा किया है कि हमें मौत आ जाए? अगर ऐसा गुस्सा नहीं किया है तो हमने क्रोध की चरम अभिव्यक्ति को नहीं जाना है. बाकी जो है वह बीच की बात है. सेफ्टी वाल्व. थोड़ा सा गुस्सा कर लिया और मन का विकार बाहर निकल गया. और सामान्य हो गये.
इसलिए हमें यह समझना चाहिए कि हम किस प्रकार से अपने आप को अभिव्यक्त कर रहे हैं. अभिव्यक्ति के दो प्रकार हैं. स्थूल और सूक्ष्म. स्थूल अभिव्यक्ति के लिए इंद्रिय सहयोग की जरूरत होती है. बोलने के लिए वाणी चाहिए. संकेत के लिए शरीर चाहिए. लेकिन इस स्थूल अभिव्यक्ति का आखिरी केन्द्र मानव का चेतन शरीर होता है. अगर स्थूल या भौतिक शरीर का चेतन शरीर से संपर्क कट जाए तो स्थूल अभिव्यक्ति बंद हो जाती है. इसलिए स्थूल का सूक्ष्म से संपर्क ही हमें अभिव्यक्ति और अनुभव देता है. लेकिन बिना स्थूल के अगर अभिव्यक्ति और अनुभव दोनों हो जाए तो?
भारत के दृष्टिकोण से देखें तो यह सिद्धि है. साधना मार्ग से इस अवस्था तक पहुंचा जा सकता है आप इस सिद्धि को प्राप्त कर सकते हैं कि बिना स्थूल की मदद से अभिव्यक्ति और अनुभव दोनों को धारण कर सकते हैं. लेकिन अभी यह केवल सिद्धि है. ऐसी क्षमता पाने के बाद कोई सिद्ध तो हो सकता है लेकिन समाधि नहीं मिलती. समाधि वह अवस्था है जब सूक्ष्म की अभिव्यक्ति भी शून्य हो जाती है. जब विचार आते ही नहीं. संकट यह है कि जब तक विचार आयेंगे हमें अभिव्यक्ति का कोई न कोई माध्यम तलाशना होगा या विकसित करना होगा. यूरोपीय नजरिये से देखें तो यह यात्रा वैज्ञानिक उपकरणों के सहारे भी की जा सकती है.
जब से दुनिया में परंपरागत समाज को पिछड़ा बताने का षण्यंत्र रचा गया है तबसे स्थूल के प्रमाण को ही सही मानने का चलन शुरू हुआ है. यह एक षण्यंत्र है लेकिन इसके परे जाकर अपनी बात समझाना भी मुश्किल है. अब अभिव्यक्ति का कोई भी तरीका हो किसी न किसी दिन उसे चरम पर तो पहुंचना ही होता है. स्थूल विज्ञान भी धीरे-धीरे अपने चरम की ओर बढ़ रहा है. यह जितना आगे जाएगा उतना सूक्ष्म होता जाएगा. अगर केवल कम्युनिकेशन के वैज्ञानिक माध्यमों को देखें तो यह लगातार स्थूल से सूक्ष्म की ओर बढ़ रहा है. अगले दस बीस सालों में हम वहां होंगे जहां विचार करने मात्र से संदेश दे सकेंगे. हमारे सोचने और आप तक संदेश पहुंचने के बीच में जो डिवाईस हम इस्तेमाल करेंगे वह इतनी सूक्ष्म हो जाएगी कि हमारे शरीर के किसी हिस्से में फिट हो जाएगी और हमारे दिमाग के साथ तालमेल करते हुए अपना काम करेगी.
अभी तो सूचना प्रौद्योगिकी के बैलगाड़ी युग में जी रहे हैं. इस बैलगाड़ी युग में हम संचार के लिए जिन उपकरणों का सहारा ले रहे हैं वे जटिल और जुगाड़ युक्त हैं. वे बहुत स्पष्ट और शत-प्रतिशत निश्चित परिणाम देनेवाले नहीं हैं. यह विकास क्रम आनेवाले १००-२०० वर्षों में हमें वहां लाकर खड़ा करेगा जहां भारत दो-तीन हजार साल पहले था. आज भी आध्यात्म मार्ग से उस अवस्था में पहुंचा जा सकता है लेकिन हर आदमी से आध्यात्मिक और आतंरकि शक्ति के सहारे जीवन जीने की कल्पना नहीं की जा सकती. स्थूल मार्ग ही श्रेष्ठ होता है. आम जन को उपकरण तो चाहिए. विज्ञान की प्रगति हमें उसे ओर ले जा रही है. लेकिन फिलहाल इस विज्ञान और हमारे बीच में माया का बड़ा वर्ग हिस्सेदार है इसलिए विज्ञान भी अशुद्ध हो गया है. न जाने कितनी अवैज्ञानिक बातों को विज्ञान बताक हमारे सामने परोस दिया जाता है. अगर विज्ञान शुद्ध हो तो वह आध्यात्म का आनंद देता है. विज्ञान अपने चरम पर आध्यात्म है और आध्यात्म को बिना विज्ञान के हासिल नहीं किया जा सकता.
इसलिए अभिव्यक्ति का चरम तो वह होगा जब हम संप्रेषण के लिए वाह्य उपकरणों पर अपनी निर्भरता पूरी तरह से खत्म कर देंगे. हो सकता है उस दिन हमें समझ में आये कि पीढ़ियों तक हमने अपने ज्ञान का कैसा अनादर किया है. संप्रेषण के स्थूल माध्यमों की चमक में लोग इतने चकाचौंध हो गये हैं कि फिलहाल तो इस बारे में लोग सोच भी नहीं रहे हैं.
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……………. (चरम अवस्था)
गहनार्थ!
इस लेख के लेखक का कहीं नाम नहीं दिख रहा। किसी दूसरे ब्लॉग का लिंक भी नहीं है।