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मेरे पास इंटरनेट है, और आपके पास क्या है?

Posted by संजय तिवारी on Apr 28th, 2009 and filed under बियाबान में शोर. You can follow any responses to this entry through the RSS 2.0. You can leave a response or trackback to this entry

सोमवार की शाम को दूरदर्शन पर विभिन्न राजनीतिक दलों के प्रतिनिधियों द्वारा अपनी-अपनी पार्टी के लिए वोट मांगते देखा. यह एक पुरानी परंपरा है जो दूरदर्शन में संभवतः अस्सी के दशक से चली आ रही है. आमचुनाव के वक्त दूरदर्शन सभी राष्ट्रीय दलों को एक निश्चित समय सीमा देता है. इस बार भी ऐसा ही हुआ होगा. सीपीएम, कांग्रेस, भाजपा, बसपा, राजद सभी दलों के प्रतिनिधि आये और अपने दल के लिए वोट मांगा. मैंने इन्हीं दलों को देखा और दल आये होंगे तो मालूम नहीं क्योंकि राष्ट्रीय दल तो और भी हैं.

भाजपा की ओर से उसके नेता लालकृष्ण आडवाणी आये थे. कोई सात-आठ मिनट बोले होंगे. उनके बोलने में साफ दिख रहा था कि वे सब्जबाग दिखाने को ही राजनीति मानते हैं. उन्होंने भरपूर सब्जबाग दिखाए. मसलन गरीब परिवारों को ३५ किलो चावल देंगे, लाड़ली लक्ष्मी योजना चलवायेंगे आदि. और हां, एक बात उन्होंने और कही कि भारत के हर गांव को इंटरनेट देंगे वह भी ब्राडबैण्ड स्पीड वाला. उन्होंने माना कि इंटरनेट मानवीय इतिहास की सबसे बड़ी खोज है.

गांव-गांव इंटरनेट होगा यह सुनना किसे अच्छा नहीं लगेगा. जो लोग इंटरनेट की ताकत को पहचानते हैं वे जरूर इस बात की हिमायत करेंगे कि भारत के हर नागरिक को इंटरनेट मुहैया होना चाहिए. इंदिरा गांधी के गरीबी हटाओ की याद अब शायद ही किसी को हो. पंद्रहवीं लोकसभा का चुनाव चल रहा है लेकिन एक बार भी गरीबी कहीं मुद्दा बनती दिखाई नहीं देती. गरीबी शायद इतनी गरीब हो गयी है कि उसे मुद्दा बनाना अब फैशन की बात नहीं रहा. इसलिए आडवाणी गरीबी हटाओ की बजाय अमीरी लाओ को मुद्दा बना रहे हैं. इस अमीरी की चादर में इंटरनेट का धागा भी लिपटा होगा.

भारत में इंटरनेट का अब तक का जो विस्तार है वह कोई 1100 प्रतिशत सालाना है. इसमें और तेजी आने की पूरी संभावना है. इसलिए नहीं कि इससे आम आदमी को अमीरी ढकेल दी जाएगी बल्कि इसलिए क्योंकि कंपनियों का दबाव बढ़ रहा है. इंटरनेट के आंकड़ों का रुझान देखें तो इंटरनेट का सबसे तेज विस्तार छोटे शहरों और कस्बों में हो रहा है. इस विस्तार का एक बड़ा कारण कुंठित यौन पिपासा है. क्योंकि भारत में सबसे अधिक पोर्न साइट्स खंगाली जाती हैं और आगे भी कई सालों तक यही चलता रहेगा. लेकिन पिछले दस सालों का इंटरनेट ट्रेन्ड उठाकर देंखे तो पायेंगे कि जहां कहीं भी पहले इंटरनेट पहुंचा है गैरजरूरी चीजों के जरिए ही पहुंचा है. लेकिन बाद में इस माध्यम का लोगों ने अपनी सुविधा के लिए इस्तेमाल करना शुरू कर दिया.

इस बारे में अधिक शुद्धतावादी होने की भी जरूरत नहीं है कि इंटरनेट के कारण भारतीय कस्बों और गांवों में  यौन उच्छृंखलता बढ़ेगी. वह पहले से ही इतनी बढ़ी हुई है कि उसके और बढ़ने की संभावना नहीं है. हां, इतना अवश्य होगा कि बहुत सारे मन के विकार इंटरनेट की इस मायावी दुनिया के सहारे निकल जाएंगे. फिर वही लोग इंटरनेट का बेहतर इस्तेमाल करेंगे जो इसको मुफ्त की यौन सामग्री पाने का माध्यम भर मानते हैं. 

लेकिन, आडवाणी जी जिस इंटरनेट क्रांति की बात कर रहे हैं वह दाना-पानी नहीं देता. भारत में अभी इंटरनेट की लालच देने की बजाय हकीकत में दाना-पानी के मुद्दे पर बड़ी गंभीरता से बात करनी चाहिए. इंटरनेट कंपनियों के हाथ का खिलौना है और सरकार रोकना भी चाहे तो इसे रोक नहीं सकती. कंपपनिया पूरे बलबूते इसे लोगों के पास लेकर जाएंगी क्योंकि उन्हें व्यापार करना है. लेकिन कंपनियां लोगों के बीच व्यापार करने जाएंगी. वे समृद्धि पाने जाएंगी समृद्धि देने नहीं. आडवाणी जी अगर दाना पानी सबके लिए सुलभ कर दें तो इंटरनेट तक लोग अपनी पहुंच अपने आप बना लेंगे. 

पर अपने देश में अब ऐसा नहीं होगा. गरीबी अब शायद कभी चुनावी मुद्दा नहीं बनेगी. क्योंकि भारत ने एक बड़ा यू टर्न ले लिया है. अब भारत के लोकतांत्रिक दल सेकुलर भारत की बात करते हैं, समृद्ध भारत की बात करते हैं लेकिन सबके लिए समान रूप से दाना पानी उपलब्ध कराने की बात नहीं करते. यह सब सपना बेचने जैसा है. वैसे भी भारत में कंपनियों का प्रभुत्व इतना बढ़ चुका है कि आम आदमी भी अब सपने में ही जीना चाहता है. सपना देखना अब उसकी आदत में आ चुका है. आडवाणी जी भी सपना दिखा रहे हैं. हकीकत में वे भी न इस देश को समझते हैं और न ही यहां के मुद्दों को. अगर वे दावा करते हैं कि नहीं, वे इस देश को समझते हैं तो वे शायद एक बात जरूर कहते कि आम आदमी के जीवन से सरकार की भूमिका कम करेंगे और इस देश को उसके उसी पुराने ढर्रे पर वापस ले जाएंगे जिसमें सभी के विकास की पूरी संभावना मौजूद रहती थी. अब जो कुछ है वह ऊपर से गाजर फेंककर शिकार फंसानेवाली नीतियां है. केन्द्र में कोई भी आ जाए नीचे अभाव और गरीबी बढ़ती जाएगी. यह किसी व्यक्ति का नहीं बल्कि इस व्यवस्था का दोष है जिसे शायद ही कोई राजनेता स्वीकार करना चाहे. 

आडवाणी जी जिस अधकचरने इंटरनेट क्रांति की बात कर रहे हैं वह दीवार फिल्म की तर्ज पर हमेशा अमिताभ बच्चन और शशि कपूर के संवाद को जीवंत रखेगा जिसमें शशि कपूर अमिताभ को ताना मारता है कि मेरे पास मां है, भले ही अमिताभ के पास सबकुछ हो.

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