गे संबंधों को जायज ठहराने के बाद दिल्ली हाईकोर्ट के बाहर का नजारा देखने लायक था. घोषित गे एक दूसरे से गले मिल रहे थे. पत्रकार उनको कवर कर रहे थे और ऐसे बहुत सारे वकील कैमरे में अपना चेहरा पहुंचाने के लिए आस पास मंडरा रहे थे. लेकिन यह सब बहुत देर नहीं चला. नाज फाउण्डेशन से जुड़े लोग थोड़ी ही देर में वहां से चले गये. सेलिब्रेशन किसी फाईवस्टार होटल की ओर बढ़ गया. पीछे रह गये कुछ पत्रकार और वकील. पत्रकारों में ढेर सारी लड़कियां थीं और लड़के तो थे ही.
पत्रकारों की आपस में बातचीत मजेदार थी. जिस एक फैसले पर पत्रकारों को बिफरकर विरोध करना चाहिए था वे मजे ले रहे थे. शाम को उनमें से कई पत्रकारों टीवी पर खबर पढ़ते हुए देखा तो पता चला कि अच्छा यह उस चैनल का पत्रकार है. महुआ टीवी चैनल के पत्रकार ने पीटीसी करने के लिए “आज दिल्ली हाईकोर्ट ने” इसी शब्द को कम से कम 80 बार रिकार्ड किया और फिर टेक हुआ. कोई हाईकोर्ट के दरवाजे से आगे बढ़ते हुए पीटीसी रिकार्ड कर रहा था एनडीटीवी की एक महिला पत्रकार ने जिस अंदाज में पीटीसी किया उससे लगा कि फैसला उसके लिए भी हुआ है. इसलिए उसने मटकते हुए मस्त अंदाज में पीटीसी किया. टीवी में वह कैसा दिखा, मालूम नहीं लेकिन सामने तो बहुत गजब लग रहा था.
पत्रकारों को यह भी नहीं मालूम था कि हाईकोर्ट ने किस धारा के तहत गे संबंधों को जायज ठहराया था. ज्यादातार पत्रकार संविधान की धारा 14 ए का उल्लेख कर रहे थे. जबकि दिल्ली हाईकोर्ट ने संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत गे संबंधों को मान्यता दी है. लेकिन पत्रकारों को न इससे मतलब है कि किस धारा या अनुच्छेद के तहत फैसला दिया गया न ही उनको इससे मतलब है कि इस फैसले का सामाजिक असर क्या होगा. उन्हें मतलब था तो सिर्फ इससे कि इस “शानदार” घटना पर एक चमकदार बाइट कैसे बन सकती है.
लेकिन एक आश्चर्यजनक बात दिखी कि वकीलों में बहुत सारे ऐसे लोग थे जो इस फैसले का विरोध कर रहे थे. एक वकील ने तो उन जजों पर गे होने का संदेह व्यक्त कर दिया जिन्होंने यह फैसला दिया है. अच्छा लगा कि वकील कम से कम अदालत के दरवाजे के बाहर तो सच्चे मन से बात करते हैं.
फैसले के बाद एक सवाल तो मन मे आया वह यह कि इस देश में कितने गे हैं? अपुष्ट आंकड़ा है कि देश की 1/6 आबादी गे या लेसिबियन हैं. अब सवाल यह है कि क्या यही रेशियो पत्रकारों में भी है? इस पूरे घटनाक्रम में देश की मीडिया ने रोल निभाया है उससे तो यही लगता है कि पत्रकारों में यह रेशियो इससे भी कही अधिक है. और हां, देर शाम आदि गोदरेज ने इस घटना का समर्थन करके साबित कर दिया कि देश के कारपोरेट घरानों में गे और लेसिबियन भरे पड़े हैं. अब क्या कहें? सवाल उठायें भी तो किस किस पर?
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संगठनों में भी अनुपात निकालना जरूरी है ।
जो समर्थन करे वही समलिंगी..! क्या बात है!
एक वकील ने तो उन जजों पर गे होने का संदेह व्यक्त कर दिया जिन्होंने यह फैसला दिया है.अजी हमे भी तो यही……है
Theek se Thukayee Kar Diye.
अफलातून जी से सहमति है।
पर आपकी बात पूरी तरह से तटस्थ नहीं है।
-Zakir Ali ‘Rajnish’
{ Secretary-TSALIIM & SBAI }
संगठन वाले तो इस मामले में दोगले हैं ही. कोई भी कैडर आधारित संस्था हो सब जगह इस तरह की दुर्घटनाएं चर्चा का विषय होती हैं. आश्चर्य उनमें से कोई भी इसके विरोध में नहीं बोल रहा है.
अभी इस मुद्दे पर व्यापक बहस की आवश्यकता थी…..हैरान तो इसलिए हूँ की लोग इसके समर्थन में दूसरे यौनिक अपराधो को गिना रहे है .जैसे वे इस निर्णय से कम हो जायेगे ….शायद सुप्रीम कोर्ट में कोई ओर अपील हो ओर फिर एक व्यापक बहस…….मीडिया .में त्वरित प्रसारण की होड़ में लोग कई बार न सब्जेक्ट को पहले से पढ़ते है .न तथ्यों की जांच ..कई बार तो कुछ पत्रकार इतने फिजूल सवाल पूछ लेते है ..की लगता है अब पत्रकारों के भारती के भी कोई माप दंड नहीं है .
अविश्वसनीय. कितनी संकरी सोच है आप की|