खबर देने का व्यावसायिक कार्य अब विधिवत उद्योग की शक्ल अख्तियार कर चुका है. पिछले साल प्राइस वाटरहाउस कूपर्स की रिपोर्ट में कहा गया था कि मीडिया उद्योग 2012 तक एक लाख करोड़ की इंडस्ट्री हो जाएगा. इस उद्योग में फिल्म से लेकर समाचार परोसने तक सबकुछ शामिल होगा. अब यह कहना मुश्किल है कि इस उद्योग में पत्रकारिता और आम आदमी की आवाज कहां होगी. अगर पत्रकारिता करने और आम आदमी की आवाज उठाने से बिजनेस जनरेट होता है तो निश्चित रूप से आम आदमी और पत्रकारिता दोनों के संबंध भी इस उद्योग से जुड़े रहेंगे. अगर ऐसा नहीं है तो तय है कारपोरेट मीडिया इन दो शब्दों को सबसे पहले तिलांजलि देगा.
अगले कुछ सालों में मीडिया का स्वरूप पूरी तरह से बदलना तय है. देश के महानगर और छोटे नगरों में पत्रकारिता ऐसी करवट लेगी जैसी हम आज कल्पना भी नहीं कर सकते. दलाल पत्रकार और भ्रष्टाचार आदि की बातें व्यावसायिक कार्य मानकर सर्व स्वीकार्य कर लिये जाएंगे. ठीक वैसे ही जैसे भारत में शादी करानेवाले अगर दो पैसा ले लें तो उनकी बड़ी सामाजिक बदनामी होती है लेकिन शादी.कॉम बाकायदा फीस लेकर ही जोड़ों को मिलवाये तो बिजनेस हो जाता है. इसी तरह आज का पत्रकारीय भ्रष्टाचार कल का व्यावसायिक कार्य समझा जाएगा लेकिन दिक्कत यह होगी कि ऐसे लोग ही नहीं बचेंगे जो यह समझ सकें कि पुराने दौर में इस काम को भ्रष्टाचार कहा जाता था.
इसलिए अगर सूचना देने और मनोरंजन करने का काम एक लाख करोड़ का व्यापार होगा तो निश्चित तौर पर वह भी बाजार का एक ऐसा हथियार होगा जिसका वैचारिक और व्यावसायिक आधार पश्चिम से आयी विचारधारा में निहित होगा. शादी.कॉम अपने भारत की अवधारणा नहीं है. लेकिन दिक्कत यह है कि अब हमें लगता ही नहीं है कि इसका विरोध करना चाहिए. ठीक वैसे ही भविष्य की व्यावसायिक पत्रकारिता का भी हम शायद विरोध नहीं करेंगे. फिर क्या होगा? अब एक लाख करोड़ के उद्योग के समानांतर उद्योग तो खड़ा नहीं किया जा सकता ताकि उन्हें वह चुनौती दी जा सके. जो किया जा सकता है वह यह कि उनके काम काज पर लगातार वाचडॉग की तरह नजर रखें. मीडिया का नाम लेकर जो लेकर इस माध्यम का व्यावसायिक इस्तेमाल कर रहे हैं उन पर सवाल उठाना कोई अनैतिक काम नहीं होगा. यह काम इंटरनेट के जरिए होगा तो ज्यादा प्रभावी होगा.
शायद लोगों को नहीं मालूम है कि इस बार आमचुनाव में मीडिया घरानों द्वारा पैसा लिए जाने का मुद्दा उठा तो सिर्फ नयी मीडिया के कारण. हिन्दी में मीडिया वेबसाईटों और ब्लागरों ने देश के बड़े मीडिया घरानों को झुकने के लिए मजबूर कर दिया और अब देश के चुनाव आयुक्त की मान रहे हैं कि आमचुनाव के दौरान मीडिया ने पैसे लेकर खबरें छापी. यह पहली बड़ी घटना है जब नये मीडिया माध्यम की उपयोगिता इस व्यापक स्तर पर साबित हुई है. आनेवाले दिनों में मीडिया साईट, ब्लाग और फोरम तीनों ही प्रकार मीडिया पर नजर रखने का काम करेंगे. इसे नियति ही कहेंगे कि एक ओर जब मुख्यधारा का मीडिया व्यापारी होने चला तो जनता के हाथ में एक ऐसा हथियार आ गया कि वह सीधे तौर पर उसके काम काज की समीक्षा कर सकता है और अगर वे बहकने लगे तो कम से कम उनको बता सकता है कि उनके कदम डगमगा रहे है.
मीडियाविस्फोट.कॉम भी इसी समझ से सामने आया है. अभी पक्के तौर पर नहीं कह सकते कि हम क्या करेंगे और क्या नहीं करेंगे. क्योंकि यह तो समय बताएगा कि हम कितना और क्या कर पाते हैं लेकिन इतना जरूर है कि मीडिया जनपक्षीय बना रहे इसके लिए हम जरूर हस्तक्षेप करने की कोशिश करेंगे.
Possibly Related Posts:
- पत्रकार बातूनी क्यों होते हैं?
- नाजायज लाईव कवरेज बंद होना चाहिए
- गूगल गणराज्य का मालिकाना हक
- हिन्दी ब्लाग बनें वैकल्पिक मीडिया
- मीडिया ने भी भाषाघात किया है