दिल्ली दरबार “पप्पू कान्ट वोट साला”

भारतनामा “शिक्षा चाहिए संस्कार नहीं”

Levitra online Tramadol online Cialis online Viagra online Cialis online Buy cialis Order cialis Cheap cialis Cheap cialis online Cialis without prescription Cialis by visa Cialis by Amex Cialis be MasterCard Buy cheap cialis online Buy cheap cialis Cheap cialis onlne Buy cheap cialis without prescription Cialis 20mg Order cheap cialis online Order cheap cialis by Visa Order 10mg cialis Buy 10mg cialis Buy 100mg cialis online Order 20mg cialis 100mg cialis online Buy generic cialis online Cialis buy online Order cheap cialis Cialis online Buy cialis Cheap cialis Order cialis Buy cialis online Order cialis online Buy cheap cialis online Order cheap cialis online Cialis Buy 10mg cialis Buy cialis by Amex Order cialis online Order cialis without prescription Cialis cialis
buy cialis online
cheapest cialis
buy cialis
buying generic cialis
cialis prescription
discount cialis
order cialis
which is better cialis or viagra
buy cialis doctor online
cialis propafenone
tadalafil cialis from india
g postmessage cialis smiley online
cialis forum
mexican rx cialis low price
g postmessage cialis subject post
g postmessage cialis smiley reply
g postmessage cialis smiley remember
g postmessage cialis smiley post
generic cialis softtab
g postmessage cialis smiley forum
cheapest cialis professional
g postmessage cialis guest reply
generic cialis cheap
g postmessage cialis guest remember
cialis professional
cialis faq
g postmessage cialis subject reply
cialis sample
g postmessage cialis subject forum
india viagra cialis vicodin
cialis to buy new zealand
women and cialis
cialis commercial
prices cialis
sublingual cialis
cialis cost
side effects of cialis
cialis drug
transdermal cialis
quick forum readtopic cialis none search
subaction showcomments cialis optional blog
subaction showcomments cialis optional newest
q buy cialis online
cialis for less
cialis tadalafil
low cost cialis
lowest prices for cialis
Buy cheap cialis online Buy cheap cialis Cheap cialis onlne Buy cheap cialis without prescription Cialis 20mg Order cheap cialis online Order cheap cialis by Visa Order 10mg cialis Buy 100mg cialis online Order 20mg cialis 100mg cialis online Buy generic cialis online Cialis buy online Order cheap cialis Cialis online Buy cialis Cheap cialis Order cialis Buy cialis online Order cialis online Buy cheap cialis online Order cheap cialis online Cialis Buy 10mg cialis Buy cialis by Amex Order cialis online Order cialis without prescription Cialis cialis

माया की माया

Posted by संजय तिवारी on Jun 28th, 2007 and filed under बात करामात. You can follow any responses to this entry through the RSS 2.0. You can leave a response or trackback to this entry

इस देश में नेता और व्यवसायी दोनों के पास जो पैसा है वह सागर में तैरते उस हिमखण्ड की तरह है जो सतह से ऊपर सिर्फ 10 प्रतिशत दिखाई देता है. कई बार यह 10 प्रतिशत भी इतना अधिक होता है कि बहस शुरू हो जाती है. हम भूल ही जाते हैं कि 90 प्रतिशत अभी भी पानी के नीचे है.

मायावती की जिस संपत्ति घोषणा को टाईम्स आफ इंडिया ने आधार बनाया है उसमें वे कहती हैं कि उनके पास दिल्ली में एक गरीबखाना है जिसकी कीमत 18.02 करोड़ रूपये है. वैसे आपको बता दूं कि दिल्ली में जिस सरदार पटेल रोड पर घर होने की बात मायावती कबूल कर रही हैं वहां बड़ी कोशिश के बाद अनिल अंबानी और लक्ष्मी निवास मित्तल को भी जगह नहीं मिली. इन दोनों ने बाद में औंरगजेब रोड पर घर खरीदा. हां, किंगफिशर के मालिक विजय माल्या इसी रोड पर रहते हैं. इसके अलावा मायावती के पास लखनऊ में एक आवास है जिसकी कीमत 97.42 लाख रूपया है. कुछ धंधे पानी की भी चिंता की है इसलिए ओखला में एक फैक्ट्री है 15 करोड़ की और कनाट प्लेस में एक दुकान ले रखी है 3.32 करोड़ की.
दलित की 52 वर्षीय कुंवारी बेटी ने कैश को ज्यादा महत्व नहीं दिया है इसलिए केवल 50 लाख रूपये अपने पास रखे हैं. कुछ एक करोड़ के गहने वगैरह भी बनवा रखे हैं जिसमें थोड़े से हीरे वगैरह हैं, बस. एक बात भूल रहा हूं, वे जिस चांदी के बर्तन में खाना खाती हैं उसे भी उन्होंने संपत्ति माना है और कहा है कि 1.12 लाख के इन बर्तनों को भी संपत्ति मान लीजिए और जिन मूर्तियों और कलाकृतियों को आपलोग (चुनाव आयोग) संपत्ति मानता है वे भी कुछ 15 लाख की हैं. आप जोड़ घटाव कर लीजिए 52 करोड़ से कम-ज्यादा हो तो एडजस्ट कर लीजिए. 12.88 लाख का कैश डिपाजिट भी है. बस जी.
ये वही मायावती हैं जो दिल्ली बुधविहार कालोनी में रहती थीं. आज मायावती बुधविहार क्या इंद्रपुरी भी नहीं आती जहां इनके रिश्तेदारों ने तीन बंग्ले बना लिये हैं. अब वे सरदार पटेल रोड और लुटियन्स जोन के बीच तैरती रहती हैं. अगर इस बात की कोई आलोचना करे तो अपने सिर आफत मोल ले. वैसे भी कल उन्होंने खंडन कर ही दिया कि भैये ज्यादा सवाल मत खड़े करो, यह सब पैसा कार्यकर्ताओं का है. मैं पूंजीपतियों से पैसा नहीं लेती. कार्यकर्ता लोग जो देते हैं उसी में गुजारा कर लेती हूं. अब कार्यकर्ता मुझे सरदार पटेल रोड (दिल्ली) और कालीदास रोड (लखनऊ) पर ही देखना चाहता है तो आप नैतिकता की दुहाई क्यों दे रहे हैं?
यह बहस पुरानी है कि नेताओं को मालदार होना चाहिए या नहीं. कुछ लोग कहते हैं कि नेताओं के पास ज्यादा पैसा नहीं होना चाहिए जबकि नेताओं के बीच बड़ा तबका इसमें सुधार करते हुए कहता है कि हमारे पास घोषित तौर पर ज्यादा पैसा नहीं होना चाहिए. और सत्तर के दशक से यही होता आ रहा है. नेताओं ने घोषित तौर पर पैसा नहीं रखा. अगर बोफोर्स पर इतना हल्ला नहीं मचता तो यह भी पता नहीं चलता कि स्विस बैंक का भारतीय राजनीति से किस तरह का पवित्र और गुप्त रिश्ता है. लेकिन यह सब पुरानी बात थी.
अब मंहगाई का जमाना है. उदारीकरण का माहौल है. एक सीईओ अगर करोड़ों में वेतन-भत्ते ले सकता है तो क्या नेता लोग सीईओ से कमतर हैं? मनमोहन सिंह ने दोनों में साम्य बैठाने के उद्येश्य से ही हाल में कहा था थोड़ा अपना लेवल नीचे कर लो सीईओ लोग. उनका इशारा साफ था- एडजस्ट करने में हमें दिक्कत हो रही है. सवाल यह है कि क्या नेता लोग जो संपत्ति की घोषणा करते हैं बहस उस पर हो या फिर वे जो नहीं बताते बहस उस पर हो. इस देश में नेता और व्यवसायी दोनों के पास जो पैसा है वह सागर में तैरते हिमखण्ड की तरह है. जो सतह से ऊपर सिर्फ 10 प्रतिशत दिखाई देता है. कई बार यह 10 प्रतिशत भी इतना अधिक होता है कि बहस शुरू हो जाती है. हम भूल ही जाते हैं कि 90 प्रतिशत अभी भी पानी के नीचे है.
राजनीति एक खर्चीला व्यवसाय है. जहां होनेवाले खर्चों का को
ई हिसाब रखना गुनाह है. फिर भी यहां राजनीतिक दल एक दूसरे की चाहे जितनी राजनीतिक आलोचना करें, खर्चों पर कभी बात नहीं करते. एक राष्ट्रीयकृत पार्टी के केन्द्रीय कार्यालय का मासिक खर्च करोड़ों में होता है. इसमें वे खर्चे शामिल नहीं हैं जिनके लिए कह दिया जाता है कि इस रैली को कराने का खर्च देख लीजिए. इन खर्चों का बाउचर बनता है, हर राष्ट्रीय पार्टी के कार्यालय में एक अधिकारी होता है जो इन खर्चों का हिसाब रखता है. लेकिन इनकी आय का स्रोत हमेशा गुप्त रहता है, इसलिए ये खर्चे किसी भी सरकारी रिकार्ड से हमेशा दूर रहते हैं.
लेकिन सिक्के का एक ही पहलू कभी नहीं होता. केवल यह कह देना कि राजनीतिक लोगों में ही सारा दोष है, ठीक नहीं होगा. आज की राजनीतिक व्यवस्था ऐसी हो गयी है जहां जनप्रतिनिधि से लोग मुफ्त की अपेक्षा रखते हैं. जो भी राजनीतिज्ञ जनप्रतिनिधि होता है उससे उसके क्षेत्र के लोग यह अपेक्षा करते हैं कि जब वह उनके पास आये तो कम से कम भोजन-पानी की व्यवस्था हो. नेताजी अगर कोई काम कह दें तो उसे पूरा करने का खर्च भी मुहैया कराएं. कार्यकर्ता भी नेताओं से इस बात की आश लगाए बैठा रहता है कि वे कार्यकर्ताओं के लिए अवसर पैदा करेंगे. इसके अलावा सामाजिक जिम्मेदारियां अलग. अगर किसी जनप्रतिनिधि को सच्चे अर्थों में अपने आप को जनप्रतिनिधि साबित करना है तो उसे धनबल, बाहुबल और प्रशासनिक क्षमता से अपनेआप को लैस रखना होता है. क्योंकि इस जन-गण-मन वाले देश में जनप्रतिनिधि ही वह पहली और आखिरी कडी है जहां कोई भी मुंह उठाये जा सकता है. और जहां जाने पर जनप्रतिनिधि को उन लोगों की मदद करनी ही होती है. अगर जनप्रतिनिधि ऐसा नहीं कर पाता तो जनता उसे बहुत दिनों तक अपना प्रतिनिधि मानने से मना कर देती है.
आप ही बताईये दोष किसका है, नेता का, राजनीति का, आम आदमी का या फिर उस गरीबी और निरक्षरता का जिसके कारण आज भी जनप्रतिनिधि ईश्वर के लघुरूप राजा का आधुनिक संस्करण है.

Possibly Related Posts:


2 Responses for “माया की माया”

  1. Gaurav Pratap says:

    दलित नेताओं को दलितों का भविष्य बनाने के लिये अपना वर्तमान तो सुधारना ही होगा ना…….

  2. Sanjeeva Tiwari says:

    संजय भाई समाचार तो हमहू पढे रही पर आपने ई समाचार पर जो जायज चिंतन करे हो वो वर्तमान परिस्थिति में सौ फीसदी सही है । अब यू पी में दलित जोगन हमारे मितान हैं भई हम कुछ नही कहेंगे वईसे हमारे छत्‍तीसगढ में भी बसपा वाले नेता भाई लोग अडबड मोटा रहे हैं सब माया है ।

Leave a Reply

Advertisement 250x250 ad code to be displayed on the inner pages