राष्ट्रपति कौन हो इसकी बहस अपने ब्लागर भैये भी चला रहे हैं. यह स्वस्थ लोकतंत्र की निशानी है. गयादीन ने घुरहू को सूचित किया. जाहिर है जिस बात पर ब्लागरों का ध्यान चला जाता है वह अपने-आप समसामयिक हो जाती है. लोग थोड़े भले हों लेकिन बहस स्तरीय से द्विस्तरीय, बहुस्तरीय होते हुए निम्नस्तरीय भी हो सकती है. दुनिया में यह कहावत भले ही न चलती हो अकेला चना भाड़ नहीं फोड़ सकता लेकिन यहां अकेला चना भाड़ को ऊपर से नीचे तक फोड़ देता है. क्यों जी गलत बात बोल रहा हूं, गयादीन ने घूरहू को पुनः अपनी टिप्पड़ी के लिए प्रेरित किया.
घूरहू उसी तरह शांत रहते हैं जिस तरह कूड़ा-करकट पड़ते-पड़ते कोई एक स्थान इतना शांत हो जाता है कि लोग उसे घूर की उपमा दे देते हैं. आमतौर गांव-देहातों में इस स्थान का उपयोग कम्पोस्ट खाद बनाने के लिए होता हैं. यह ज्ञात सत्य है कि कम्पोस्ट खाद से जमीन को जितनी उर्वराशक्ति मिलती है उतनी डाई-यूरिया से नहीं. लेकिन उस घूर की अपनी नियति क्या है? वह खुद दिन रात मक्खियों, कीट-पतंगों का अड्डा बना रहता है. फिर भी उसकी उदारता में कोई कमी नहीं आती. मानों वह साबित करने में लगा है कि अपने को मारकर दूसरों को जीवन देनेलाला घूरहू बन जाता है.
लेकिन इस विषय पर घूरहू शांत न रह सके. आंखे ऊठाईं, मानों किसी राकेट लांचर से राकेट ऊपर उठ रहा हो. मुखमुद्रा पर कुछ भावों को आने-जाने दिया. वैसे ही जैसे राकेट लांच करने के पहले एक कैमरेनुमा आंख दूर-दूर तक निशाने का जायजा लेती है. और फिर धड़ाम से आंखों को नीचे गिरा ठुड्ढी को गर्दन में ऐसे घुसा लिया कि अग्नि मिसाईल ने दगने से मना कर दिया. इसके दो मतलब हो सकते हैं. एक, या तो उन्होंने अभी सोचना शुरू नहीं किया, या फिर उन्हें गयादीन की पात्रता पर संदेह हो गया था. अपनी सलाह जिसे वे बहुमूल्य कोहिनूर से भी थोड़ा कीमती समझते हैं ऐसे ही किसी को भला क्यों दे दें.
गयादीन बातूनी हैं. जितनी तेजी से कोई विषय उठाते हैं उतनी ही जल्दी उसका गरारा करते हैं और उसी तेजी से उसका वमन भी कर देते हैं. फिर नया विषय, नया गरारा और वमन. दिन भर उनका यही क्रम चलता रहता है. ऐसे में घूरहू उनके प्रिय मित्र हैं तो इसका कारण समझ में आता है. गयादीन इस भाव में रहते हैं कि तीर खाली नहीं जा रहा. तीर पत्थर से टकराये तो क्या कहीं टकराता तो है. घूरहू के लिए यह सब मक्खी भिनभिनानेवाला प्रकरण है जिसे रोका नहीं जा सकता लेकिन जिससे प्रभावित होने की भी जरूरत नहीं है.
“तो अपने बिल्लू को राष्ट्रपति बना दो”
गयादीन फक्क पड़ गये. घूरहू ने अचानक कुछ कहा है. राकेट लांचर में वापस जा चुकी मिसाईल अचानक दग गयी थी.
पहले तो कुछ सूझा नहीं. कुछ देर घूरहू को ऐसे देखते रहे मानों परवेज मुशर्रफ ने वर्दी छोड़ने का ऐलान कर दिया हो. फिर थोड़ी जिज्ञासा और ढेर सारे आश्चर्य को एकसाथ मिलाकर पूछ लिया-
” यह अपना बिल्लू कौन है?”
“वही अमेरिकवाला. बिल किलिंटन, पहले अमेरिका भी तो कितना अच्छा चला चुका है. तबियत का मस्त है और यहां आता-जाता भी रहता है. उसकी बीवी वहां प्रेसीडेन्ट बन जाएगी, बिल्लू यहां. सारा झंझट ही खत्म. हमारा अमेरिका से सच्चे अर्थों में धोती-साड़ी का साथ हो जाएगा. वैसे भी आज देश को चलाने के लिए सब तरफ विदेशी पैसा आ रहा है, विदेशी तकनीकि आ रही है, विदेशी कंपनियों के विदेशी मालिक आ रहे हैं तो फिर राष्ट्रपति वहां से क्यों नहीं आ सकता. जब अर्थव्यवस्था को ठीक करने के लिए उद्योग में विदेशी निवेश हो सकता है तो राजनीति में विदेशी निवेश क्यों नहीं किया जा सकता? “
इतना बोल घुरहू चुप हुए तो मातादीन की बोलती बंद. घूरहू की बात में नाजायज क्या है? मातादीन ने तय किया कि इस पवित्र विचार के साथ वे सोनिया माईनो गांधी से मिलेंगे. लेकिन उसके पहल
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भाइ जे समझो कि हम जे तुमाये बिलुआ ते काई देसी उलुआ को ज्यादा पंसंद करिबे करब,और देसी उलुआ ढूढने मे विदेसी से देसी भई सौनिया भौजी ते ज्यादा कोई देसी नेता नही कर सकत है,बे एक ठो पहले खोज के टेसटवा भी चुकी है,