आज मैं जब यहां खड़े होकर पीछे देखता हूं तो लगता है कि चार दशक पहले हम किस तरह सूचना के बैलगाड़ी युग में जी रहे थे. भारी भरकम कम्प्यूटर और लैपटाप को हम उन दिनों सूचना तकनीकि का औजार घोषित कर उसका महिमामंडन किया जाता था. महिमामंडन करने में कोई बुराई नहीं थी क्योंकि आज दुनिया जहां आकर खड़ी हो गयी है उसकी शुरूआत तो उन्हीं भोथरे हथियारों से हुई थी जिन्हें उस जमाने में क्रांति के औजार कहे जाते थे. लेकिन वह समय अब काफी पीछे छूट गया है. आज हम तकनीकि शब्द को वैसे ही नफरत करते हैं जैसे उस समय प्रेम करते थे. मानो प्रेम ने प्रतिक्रिया कर दी हो. लेकिन अब कुछ हो नहीं सकता. आज शायद ही कोई ऐसा व्यक्ति मिले जो यह कहे कि उसे तकनीकि से प्रेम है. नयी पीढ़ी के लड़कों में इसे लेकर सबसे अधिक विद्रोह दिखाई देता है. लेकिन वे भी कुछ कर नहीं सकते. जो है उसे तो स्वीकार करना ही होगा. उसी के साथ जीने की आदत डालनी होगी.
नौजवान कहते हैं कि वे मुक्त होकर जीना चाहते हैं. वे किसी भी प्रकार की तकनीकि को अपने जीवन पर अंकुश मानते हैं. आये दिन इस बारे में साइबर बहस होती है, एक ग्रह से दूसरे ग्रह तक लगातार बहस और आंदोलन चलते हैं कि तकनीकि के प्रभाव को कैसे कम किया जाए. उनका ऐसा करना जायज भी है. इक्कीसवीं सदी की शुरूआत में जिस तकनीकि को मुक्ति का माध्यम मानकर स्वीकार किया गया था आज वह तकनीकि गुलामी का सबसे बड़ा हथियार बन गयी है. मैंने पहले ही आपको बताया है कि कैसे मशीन और आदमी के बीच का अंतरसंबंध आदमी के लिए ही बहुत घातक साबित हो रहा है. हमारे पूरे शहर, देश और ग्रह तकनीकि के जरिए ही नियंत्रित किये जा रहे हैं. जिस शहर में मैं रहता हूं उस शहर की किसी भी सार्वजनिक सुविधा पर आदमी का नियंत्रण नहीं हैं. सारी सुविधा, उत्पादन और सुरक्षा पर मशीनों का नियंत्रण है. ऐसा नहीं है कि मशीनों ने कोई युद्ध करके कब्जा कर लिया है, यह तो क्रमिक रूप से हम खुद ही मशीनों पर निर्भर होते चले गये और आज जब अपने ऊपर निर्भर होना चाहते हैं तो वापस लौटने का कोई रास्ता दिखाई नहीं देता.
इक्कीसवीं सदी की शुरूआत में केवल पूंजी का ही केन्द्रीयकरण नहीं हुआ. मानव जीवन में सप्रयास तकनीकि की पैठ बनायी गयी और जीवन का केन्द्रीयकरण किया गया. विकेन्द्रित जीवन और विकेन्द्रित व्यवस्था को उस दौर के कुछ लोगों ने जानबूझकर गलत साबित करने की कोशिश की. उनका ऐसा करने का मकसद था. वे जानते थे कि अगर विकेन्द्रित जीवन को विखंडित नहीं किया जाएगा तो अधिपत्य स्थापित करने में बहुत मुश्किल होगी. मसलन उस दौर में गांवों से तेजी से पलायन करने वाली अर्थव्यवस्था को स्वीकार किया गया और उसे बढ़ावा दिया गया. उसी दौर में मशीनों को जानबूझकर हर कार्यक्षेत्र में दाखिल किया गया. बिजली जैसी मूलभूत सुविधा से लेकर संचार, स्वास्थ्य और दैनिक जरूरतों की दूसरी सभी जरूरतों को हमने मशीन के हाथों गिरवी रख दिया. हमारे घर, कार्यालय, सड़कें, गलियां, गाड़ियां सब जगह मशीनों का ही नियंत्रण है. हमारे बैंक एकाउण्ट, आर्थिक लेन-देन पर भी पूरी तरह से मशीनों का कब्जा है. मैं जानबूझकर कब्जा शब्द का प्रयोग कर रहा हूं क्योंकि अब ऐसा नहीं है कि इंसान मशीन का उपयोग करता है. मशीनें अब बैलगाड़ी युग में नहीं हैं. वे अपेक्षाकृत अधिक उन्नत अवस्था में हैं और उन्होंने अपनी बुद्धि विकसित कर ली है. अब वे अपने पासवर्ड बदलने से लेकर जरूरतों के निर्धारण तक का सारा फैसला खुद करती हैं. इसका सीधा असर इंसानों के ऊपर हो रहा है.
मसलन अब मेरी जरूरत एक क्रेडिट की है और वह क्रेडिट मेरे एकाउण्ट में मौजूद है तो भी वह क्रेडिट तब तक हासिल नहीं कर सकता जब तक कि मशीन इसकी अनुमति न दे. किसी नागरिक को एक क्रेडिट (यह इस समय की अंतराष्ट्रीय मुद्रा का नाम है) पाने के लिए उसके बहुत सारे पहलुओं की मशीन द्वारा जांच की जाती है. उसमें सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह है कि आपके इस एक क्रेडिट के भुगतान से अंततः पर्यावरण पर क्या प्रभाव पड़ेगा. अगर मेरे एक क्रेडिट के संभावित खर्च से पर्यावरण पर नकारात्मक प्रभाव पड़ने की संभावना दिखती है तो बैंक हमें वह एक क्रेडिट देने से मना कर देता है. बैंक कई सारे पहलुओं पर जांच करता है, हमारे खर्चे के पैटर्न की जांच करता है, हमारी नागरिकता और देश को अंतरराष्ट्रीय बिरादरी में मिले क्रेडिट की जांच करता है तथा देश के पर्यावरण खाते में उपलब्ध क्रेडिट तथा नागरिकों की कुल संख्या का अनुपात निकालकर उस दिन के साथ गणना करता है फिर वह तय करता है कि वह एक क्रेडिट मुझे मिल सकता है या नहीं. कई बार तो ऐसा होता है कि एक सिगरेट पीने के लिए तीन-तीन दिन का इंतजार करना पड़ता है क्योंकि मशीनों की गणना में अगर उस दिन वातावरण में कार्बन का उत्सर्जन मेरे एक सिगरेट पीने से निर्धारित सीमा से बढ़ता है तो वह मुझे सिगरेट का क्रेडिट नहीं देता है और हमें मजबूरन सिगरेट पीने के लिए वातावरण में उपलब्ध कार्बन उत्सर्जन के मानक को पूरा करने के लिए बाध्य होना पड़ता है. क्योंकि हम हम जिस देश में रहते हैं उसने पहले ही अंतरराष्ट्रीय बिरादरी में अपने हिस्से का क्रेडिट संप्रभु देशों को बेचकर आर्थिक सहायता हासिल कर ली है और अब हमारे हिस्से का क्रेडिट दुनिया के कुछ संप्रभु देश इस्तेमाल करते हैं. (जारी)
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सिगरेट पीने के लिये अनुमति का इंतजार ! सुन्दर!
Rochak prastuti.
-Zakir Ali ‘Rajnish’
{ Secretary-TSALIIM & SBAI }
बहुत अच्छा लिखा है संजय जी
bahut hi saral bhasha mein ek gambhir vichar rakhne ka unnat prayas………
prasanshaniya..
agle bhag kii pratiksha hai..