सबसे पहले मैं अपना परिचय देता हूं-
नाम – संजय
जाति- तिवारी (तिवारी में भी “मणि” तिवारी)
वर्ण- ब्राह्मण (सरयूपारीण)
धर्म- सनातन (वैष्णव)
गोत्र – शांडिल्य
इतने के बाद भी एक आखिरी सवाल लोग और पूछते हैं, तीन के ब्राह्मण हो या तेरह के? तो मैं आपको बता दूं कि मुझे यह बताया गया है कि मैं तीन का ब्राह्मण हूं. क्योंकि गर्ग, गौतम और शांडिल्य गोत्र तीन में आते हैं.
मेरे इस परिचय से मुझे जाहिर तौर पर श्रेष्ठता का बोध होता है और सुधारवादी लोगों के दृष्टिकोण से मैं ब्राह्मणवादी मानसिकता का आदमी बन जाता हूं. आज की शहरी जीवनशैली में बहुतों के लिए इन बातों का कोई मतलब नहीं है वैसे ही आज मेरे लिए भी इस परिचय का मतलब नहीं रह गया है. रोजी, रोटी, संबंध और व्यवहार में इन विश्लेषणों का कोई उपयोग नहीं है. फिर भी क्या इस वर्गीकरण को खारिज किया जा सकता है ? एक बार कुछ दिनों के लिए मैंने भी अपनी जाति छोड़ दी थी. तब एक बुजुर्ग समाजवादी ने मुझे बहुत डांटा था. उसने कहा यह सब पागलपन क्यों कर रहे हो. हालांकि तब भी उसकी बात का मेरे ऊपर कोई खास असर नहीं हुआ था लेकिन आज मुझे लगता है कि उन्होंने सही कहा था. जाति छोड़ने का नाटक पागलपन ही है. ऐसा हम इसलिए करते हैं क्योंकि इस व्यवस्था में आये विकार हमें इससे अलग करने के लिए प्रेरित करते हैं. रास्ता क्या है? क्या हम अलग हो जाएं या फिर इसके विकार दूर करें?
हरियाणा में सगोत्रीय विवाह के कारण एक जोड़े की हत्या कर दी जाती है तो कुछ लोगों ने इसे बर्बरता करार दिया. मैं भी इसे बर्बरता मानता हूं लेकिन वैसे नहीं जैसे और लोग मान रहे हैं. गोत्र को गाली देते हुए मैं इसे बर्बरता नहीं कह सकता. यह वर्तमान अंग्रेजी शिक्षा का प्रभाव है कि हमारे लिए कुल, गोत्र आदि का मतलब समाप्त हो गया है. हम भी जाति और जनपद को उसी तरह गाली देने लगे हैं जैसे अंग्रेज बहादुर देकर चले गये. सजातीय गोत्र में शादी न करने के पीछे कारण यह है कि हम एक ही ऋषि की संतान हैं. इसलिए आज उस गोत्र का कोई भी व्यक्ति कितनी भी दूर क्यों न हो रिश्ता भाई-बहन का होता है. इसको कोई पोंगापंथी नजरिये से देखना चाहे तो यह उसकी समझ है मैं इसे दूसरे नजरिये से देखता हूं. हमारे बंधुत्व को बढ़ाने में यह एक कारगर औजार है. आज जब अंग्रेजी शिक्षा पद्धति के उपयोग से हमारी समझ छिन्न-भिन्न् करने की कोशिश की जा रही है ऐसे औजारों के बारे में हमें नये सिरे से सोचने और समझने की जरूरत है.
बहुत समय नहीं गुजरा जब योग और आयुर्वेद को आधुनिक चिकित्सा के सामने तुच्छ और हीन माना जा रहा था. पिछले 10 सालों में ऐसा क्या हो गया कि योग और आयुर्वेद इलिट क्लास की चिकित्सा पद्धति बन बैठा. त्रिदोष और पंचमहाभूत की अवधारणा को हमने अचानक ही वैज्ञानिक मान्यता क्यों दे दी? क्योंकि पश्चिम ने उसे नये सिरे से अपना लिया. पश्चिम ने कहा कि योग और आयुर्वेद अच्छा है. फिर हमें भी होश आया कि योग-आयुर्वेद तो हमारा अपना है. नहीं तो समाजवादी अर्थव्यवस्था और सोच ने गांव-गांव से वैद्य परंपरा को खत्म कर दिया था. आज गांवों में वैद्य उपनाम बचे हैं लेकिन उस घर का आदमी अपनी रोजी-रोटी चलाने के लिए मेहनत मजदूरी करता है. मैं यह नहीं कहता कि वैद्यकी में दोष नहीं आये होंगे. लेकिन दोष निवारण की जगह उस विधा को ही समाप्त कर देना कहां की बुद्धिमानी है?
कुछ इतिहासकार गोत्र, जाति व्यवस्था की मनमानी व्याख्या करते हैं. उनके अपनी जानकारी के स्रोत क्या हैं? वे वही समझते हैं जो उन्हें समझाया जाता है. इसलिए ऐसे इतिहासकारों को बहुत अहमियत देना हमारी कुंद समझ का ही उदाहरण है और कुछ नहीं. गोमांस खाने का जो सवाल रवीश कुमार ने अपने ब्लाग पर उठा
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आप जिस खेचरी मुद्रा द्वारा गोमांस भक्षण की बात कर रहे हैं वह हठ योग प्रदीपिका में आप को मिलेगा.. जो आठवीं नौवीं शताब्दी में गोरखनाथ और मत्स्येन्द्रनाथ के होने के बाद ग्यारवीं बारहवीं शतब्दी में लिखी गई.. पा जिस गोमांस भक्षण की बात रवीश ने की या अम्बेदकर अपनी पुस्तक अछूत में बताते हैं.. वह वैदिक काल में किया गया गोमांस भक्षण है..
आहत न हो.. इतिहासकारों को गाली न दें.. संयत स्वर से सुनें, सवाल करें.. अपने धर्मग्रंथ पढ़ें.. किसी को गाली देने की ज़रूरत न होगी.. और न ये कहने की कि वो इतिहासकार किसी के सिखाने पर बोल रहा है.. और उसके स्रोत क्या है..
अछूत सीरिज के दौरान मैंने अम्बेदकर द्वारा दिये गये हर उद्धरण को ऋग्वेद और मनुस्मृति से मिलाया है.. हर उद्धरण सौ प्रतिशत सही है.. हिन्दू, ब्राह्मण, यानी हमारे आपके पूर्वज.. गोमांसाहारी थे..विश्वास न हो तो मेरे ब्लॉग पर ऋगवेद की उन ऋचाओं की जो क्रमसंख्या दी है.. उस से मिला कर खुद देख लें..
यह अभय का शोध कार्य ब्लॉग पोस्ट से हट कर टिप्पणियों में फैल गया है
संजयजी आपने अच्छा लिखा है. ग्लोबलाइजेशन भले हो जाये, तलाशते हम अपनी जड़ें ही हैं.
3/13 का आगे भी कोई स्प्लिटिंग है – अर्थात 3 में भी 3+ या 3- के ब्राह्मण!
मेरे बाबा जिदा होते तो आपको निहायत पसन्द करते. वे बेचारे जिन्दगी भर ‘कौन बाभन?’ के प्रश्न ही लोगों से करते रहे!
थे बड़े संतपुरुष.
भाइ तब भी तो तुम्हारे जैसे लेखक रहे होगे,उन्होने जोड तोड कर गौ मांस खाने का कार्य्क्रम अपनी सुविधानुसार जोड लिया होगा.अब आप उसी का उदाहरण पढा रेह हो…?
संजय जी ब्राह्मणों की सहज परशुराम प्रवृत्ति के कारण ही राम से साक्षातकार हो पाया है इसलिए आपकी आक्रामकता जायज है । अभय भाई की बातों को भी सुनें । नाम के पीछे तिवारी, पाण्डेय लिखना कितना दुखदायी हो जाता है इसका अनुभव मुझे है पर हमे अपना काम करना है वर्तमान में कैसे विचार पल व पनप रहे है इसका आभास यहां हो ही रहा है ।
भई, अब तो अन्तर्राष्ट्रीय अदालत भी ‘गोत्र’ को मान्यता देने लगी हैं। गोत्र = गुणसूत्र = D.N.A. डीएनए टेस्ट के द्वारा ही पता लगाया जाता है कि ‘अमुक’ बालक उक्त व्यक्ति का बेटा है या नहीं। समग्र विज्ञान अब मानने लगा है कि वंशबीज (वीर्य) के आधार पर ही व्यक्ति का शरीर(रक्त), मन, चरित्र, ज्ञान, शक्ति सब कुछ के विकास होता है, जिसका प्रभाव सैंकड़ों पीढ़ियों तक अमिट रहता है।
एक ओर अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर लुप्त होती जा रहे पशुओं की प्रजातियों (शेर, डानयासोर, सफेद हाथी, पक्षियों, साँपों, मेंढकों और कीट पतंग तक)के वंश बचाने/बढ़ाने के लिए अनेक कानून बन रहे हैं, करोड़ों/अरबों खर्च किए जा रहे हैं। देशी गाय की आनुवंशिकी को बचाने के लिए उतने प्रयास नहीं हो रहे। अधिकांश गायों का प्रजनन ‘इंजेक्शन’ माध्यम से करके जर्सी बनाया जा रहा है।
दूसरी ओर अन्तर्जातीय विवाहों, तलाकों, द्वितीय, तृतीय, बहु-विवाहों के कारण अनेक पिता और अनेक माँ होने की घटनाएँ बढ़ रही हैं और सन्तानें “वर्णसंकर” मानव बनती जा रही है।
अतः ‘गोत्र’ को गाली देनेवाले क्या ‘अगोत्री’ या ‘वर्णसंकर’ कहलाने के हकदार नहीं हैं?
संजय जी, आपके इस लेख के शीर्षक से ऐसी भ्रान्ति होती है कि आपने केवल गोत्र को “गाली देने वालों” को कुछ सुनाने के लिये इस लेख को लिखा है. ऐसे शीर्षक से आपके लेख और उसमें प्रस्तुत तर्कों का वजन हल्का हो जाता है. मैं गोत्र को गाली नहीं देता, फिर भी आपकी बात सुनी और महसूस किया कि लेख विचारपूर्ण है और इस पर गहराई से चिंतन की आवश्यकता भी है.
मुझे इस सम्बन्ध में ज्ञान की कमी है, अत: कुछ जिज्ञासाएं हैं, यदि समाधान हो सका तो बहुत प्रसन्नता होगी:
१. आपने अपनी जड़े खोदने का आह्वान किया, पर जड़ें खोदते-खोदते कितना पीछे जायें? उस दृष्टिकोण से सभी मनुष्य भाई-बहन नहीं हुये क्या?
२. यदि अपने गोत्र के बाहर का विवाह ही स्वीकार्य है तो उन्हीं कारणों के आधार पर अपनी जाति व धर्म के बाहर किया गया विवाह और भी स्वीकार्य होना चाहिये. परन्तु जैसा कि हम अपने समाज में देखते हैं, ऐसा कदापि नहीं हैं. क्या आप प्रकाश डाल सकते हैं इस विरोधाभास पर.
३. हरिराम जी की टिप्पणी से एक और जिज्ञासा उतपन्न हुई. वर्णसंकर होने का अर्थ क्या है, और वर्णसंकर होने में क्या बुराई है. प्रसिद्ध वैज्ञानिक मेण्डलीफ़ ने जाने कितने प्रयोग किये इस बारे में. हम आप जो गेंहूं-चावल खाते हैं, उनमें अधिकांश वर्णसंकर तकनीकि से ही विकसित बीजों से आते हैं. इसी प्रकार गाय-भैंस व अन्य पशुओं की अनेक प्रजातियां वर्णसंकर हैं. क्या सगोत्र विवाह को हतोत्साहित करने के साथ-साथ वर्णसंकर संतानों का विरोध करना क्या स्वयं एक विरोधाभास नहीं है?
आपने गोत्र व्यवस्था की तुलना आयुर्वेद से करने की चेष्टा की है, वह मेरी दॄष्टि में सर्वथा अनुचित है. आयुर्वेद में अलग-अलग गोत्र के लोगों में होने वाले एक ही रोग का उपचार अलग-अलग तरीके से करने की व्यवस्था है क्या? मेरे विचार से नहीं. तो फिर आयुर्वेद और गोत्र व्यवस्था का कोई सम्बन्ध नहीं है. अत: सदियों से चली आ रही किन्हीं दो परम्पराओं में से एक को स्वीकार करना और दूसरी को अस्वीकार करना कोई विरोधाभास नहीं है, बल्कि सीधी-साधी तार्किक सोच का परिणाम है. और ऐसी सोच में अंग्रेजों का कोई योगदान नहीं, बल्कि ऐसी सोच हमारे अपने उपनिषदों से मिली प्रेरणा का फल है, जिनमें कहा गया है, नेति नेति!
नेति-नेति…
नाम – संजय
जाति- तिवारी (तिवारी में भी “मणि” तिवारी)
वर्ण- ब्राह्मण (सरयूपारीण)
धर्म- सनातन (वैष्णव)
गोत्र – शांडिल्य
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वैसे ही आज मेरे लिए भी इस परिचय का मतलब नहीं रह गया है. रोजी, रोटी, संबंध और व्यवहार में इन विश्लेषणों का कोई उपयोग नहीं है
वैसे आपकी इस मोहक सी अबोधता पर मिट मिट जाने का मन है। यदि सब कुछ इतना आदर्श हो गया है तब तो सारा दलित विमर्श ही मूर्खता हो गया- एक उच्च कोटि के ब्राह्मण का दावा है कि आजकल व्यवहार से इन सब वर्गीकरणों का लोप हो गया। गोत्र तो उसकी ‘वैज्ञानिकता’ के कारण स्वीकार्य होने चाहिए- सदके जाएं।
जो वर्णसंकर हैं- उनका क्या करेंगे पंडितजी–जीने का अधिकार छीन लेंगे। अमरीका सारा वर्णसंकर है- भारत के सारे मुसलमान भी- क्या आदेश है आपका- मिटा दें धरा से- आज्ञा दें परशुराम।
ऐसा नहीं कि हैवानगी के पक्ष में तर्क नहीं हो सकते, हो सकते हैं पर विवेक हैवानगी के पक्ष में कभी नहीं हो सकता।
लेकिन हत्या को जायज कैसे ठहराया जा सकता है। बर्बरता तो बर्बरता है, वह न तो छोटी होती है न ही बड़ी।
जहाँ तक गोमांस भक्षण की प्रथा का ज़िक्र है, उसका उल्लेख तो स्पष्टतः ऋग्वेदादि संहिताओं में है। वैदिक युग में “मधुपर्क” नामक प्रथा प्रचलित थी, जिसमें अतिथि के सामने खाने के लिए शहद के साथ गाय, बैल आदि का मांस प्रस्तुत किया जाता था। हालाँकि आपने जो अर्थ बताया है, योगशास्त्र में वही अर्थ सही है।
योग और आयुर्वेद, दोनों ही काफ़ी वैज्ञानिक हैं। कम-से-कम इनका प्रयोग करने पर स्वास्थ्य अच्छा होता है, यह बात सिद्ध है। इनका प्रयोग कर खुद इसका अनुभव किया जा सकता है। सगोत्र विवाह से ऐसा क्या विशेष लाभ होता है? इतर गोत्र में विवाह से क्या हानि होती है? कुछ भी नहीं। परम्परा से प्राप्त ज्ञान (जैसे योगायुर्वेदादि) को सहेजना और तथ्यहीन बातों (जैसे गोत्रादि) को छोड़ना ही उचित जान पड़ता है।
हालाँकि आपने जातिव्यवस्था के योगदान का तो उल्लेख किया है, लेकिन इसके दुष्परिणामों का ज़िक्र नहीं किया। क्या आपको लगता है कि दुष्परिणामों की अपेक्षा इसके लाभ अधिक हैं? मुझे तो ऐसा नहीं लगता है। हाँ, इतना अवश्य है कि अपने मूल वैदिक रूप में जाति व्यवस्था एक हितकारी व्यवस्था ज़रूर है। वर्तमान रूप दोषों से परिपूर्ण है।
इसी तरह आपने वर्णसंकरता की बात उठाई है। वैज्ञानिक तथ्य है कि वर्णसंकर जाति (मनुष्य, फल या जानवर; सभी की) उन दोनों जातियों से उत्तम होती है, जिनके संकरण से नई जाति की उत्पत्ति हुई है। वैसे भी वेदों (संहिता, ब्राह्मण, आरण्यक और उपनिषद) में कहीं भी सगोत्र विवाह को अनिवार्य नहीं कहा गया है। यह बाद के कुछ स्मृतिकारों का मत है। और स्मृतियों में ही यह भी स्पष्ट लिखा है कि स्मृति केवल समयोपयोगी नियमों का संकलन भर हैं और यदि उनमें कुछ भी वेदविरुद्ध है तो वह सर्वथा त्याज्य है।
हिन्दू धर्म को वैदिक धर्म कहा जाता है, क्योंकि यह वेदों पर प्रतिष्ठापित है। यदि स्मृतियों पर होता, तो वैदिक की बजाय स्मार्त्य धर्म कहलाता। स्मृतियों में कई देशाचारों का उल्लेख है, जो वेदविरुद्ध होने से त्याज्य हैं; जैसे कि छूआ-छूत आदि।
क्षमा चाहता हूं. ऊपर की गई टिप्पणी में मेण्डल की जगह मेण्डलीफ़ लिख गया हूं.
प्रतीक भाई, आपने बहुत अच्छे रूप से पूरी चर्चा का सार कम से कम शब्दों में रखा, आपको बधाई.
बहुत अच्छा लिखा संजीव जी, आपसे सहमत हूँ (कुछेक बातें छोड़कर)
bahut sahi likha hai apne
संजय जी
आपने अच्छा प्रयास किया अंगरेजी मानसिकता के लोग बिरोध तो करेगे ही
सगोत्र विवाह भारतीय वैदिक परम्परा मे निषिद्ध माना जाता है.गोत्र शब्द का प्रयोग वैदिक ग्रंथों मे कहीं दिखायी नही देता. सपिण्ड (सगे बहन भाइ) के विवाह निषेध के बारे में ऋग्वेद 10वें मण्डल के 10वें सूक्त मे यम यमि जुडवा बहन भाइ के सम्वाद के रूप में आख्यान द्वारा उपदेश मिलता है.
यमी अपने सगे भाई यम से विवाह द्वारा संतान उत्पन्न करने की प्रबल इच्छा प्रकट करती है.परन्तु यम उसे यह अच्छे तरह से समझाता है ,कि ऐसा विवाह प्रकृति के नियमों के विरुद्ध होता है, और जो इस प्रकार संतान उत्पन्न करते हैं वे घोर पाप करते हैं.
“सलक्षमा यद्विषुरुषा भवाति” ऋ10/10/2 (“सलक्ष्मा सहोदर बहन से पीडाप्रद संतान उत्पन्न होने की सम्भावना होती है”)
“ पापमाहुर्य: सस्वारं निगच्छात” ऋ10/10/12 ( “जो अपने सगे बहन भाई से संतानोत्पत्ति करते हैं, भद्र जन उन्हें पापी कहते हैं)
इस विषय पर स्पष्ट जानकारी पाणिनी कालीन भारत से भी मिलती है.
अष्टाध्यायी के अनुसार “ अपत्यं पौत्र प्रभृति यद गोत्रम् “, एक पुरखा के पोते,पडपोते आदि जितनी संतान होगी वह एक गोत्र की कही जायेगी.
यहां पर सपिण्ड का उद्धरण करना आवश्यक हो जाता है.
“ सपिण्डता तु पुरुषे सप्तमे विनिवर्तते !
समानोदकभावस्तु जन्मनाम्नोरवेदन !! “
मनु: 5/60
“सगापन तो सातवीं पीढी में समाप्त हो जाता है. और घनिष्टपन जन्म और नाम के ज्ञात ना रहने पर छूट जाता है.”
आधुनिक जेनेटिक अनुवांशिक विज्ञान के अनुसार inbreeding multiplier अंत:प्रजनन से उत्पन्न विकारों की सम्भावना का वर्धक गुणांक इकाई से यानी एक से कम सातवीं पीढी मे जा कर ही होता है.
गणित के समीकरण के अनुसार,
अंत:प्रजनन विकार गुणांक= (0.5)raised to the power N x100, ( N पीढी का सूचक है,)
पहली पीढी मे N=1,से यह गुणांक 50 होगा, छटी पीढी मे N=6 से यह गुणांक 1.58 हो कर भी इकाई से बडा रहता है. सातवी पीढी मे जा कर N=7 होने पर ही यह अंत:पजनन गुणांक 0.78 हो कर इकाई यानी एक से कम हो जाता है.
मतलब साफ है कि सातवी पीढी के बाद ही अनुवांशिक रोगों की सम्भावना समाप्त होती है. यह एक अत्यंत विस्मयकारी आधुनिक विज्ञान के अनुरूप सत्य है जिसे हमारे ऋषियो ने सपिण्ड विवाह निषेध कर के बताया था.
सगोत्र विवाह से शारीरिक रोग , अल्पायु , कम बुद्धि, रोग निरोधक क्षमता की कमी, अपंगता, विकलांगता सामान्य विकार होते हैं. भारतीय परम्परा मे सगोत्र विवाह न होने का यह भी एक परिणाम है कि सम्पूर्ण विश्व मे भारतीय सब से अधिक बुद्धिमान माने जाते हैं.
सपिण्ड विवाह निषेध भारतीय वैदिक परम्परा की विश्व भर मे एक अत्यन्त आधुनिक विज्ञान से अनुमोदित व्यवस्था है. पुरानी सभ्यता चीन, कोरिया, इत्यादि मे भी गोत्र /सपिण्ड विवाह अमान्य है. परन्तु मुस्लिम और दूसरे पश्चिमी सभ्यताओं मे यह विषय आधुनिक विज्ञान के द्वारा ही लाया जाने के प्रयास चल रहे हैं. एक जानकारी भारत वर्ष के कुछ मुस्लिम समुदायों के बारे मे भी पता चली है. ये मुसलमान भाई मुस्लिम धर्म मे जाने से पहले के अपने हिंदु गोत्रों को अब भी याद रखते हैं, और विवाह सम्बंध बनाने समय पर सगोत्र विवाह नही करते.
आधुनिक अनुसंधान और सर्वेक्षणों के अनुसार फिनलेंड मे कई शताब्दियों से चले आ रहे शादियों के रिवाज मे अंत:प्रजनन के कारण ढेर सारी ऐसी बीमारियां सामने आंयी हैं जिन के बारे वैज्ञानिक अभी तक कुछ भी नही जान पाए हैं.
मेडिकल अनुसंधानो द्वारा , कोरोनरी हृदय रोग, स्ट्रोक, कैंसर , गठिया, द्विध्रुवी अवसाद (डिप्रेशन), दमा, पेप्टिक अल्सर, और हड्डियों की कमजोरी. मानसिक दुर्बलता यानी कम बुद्धि का होना भी ऐसे विकार हैं जो अंत:प्रजनन से जुडे पाए गए हैं
बीबीसी की पाकिस्तानियों पर ब्रिटेन की एक रिपोर्ट के अनुसार, उन के बच्चों मे 13 गुना आनुवंशिक विकारों के होने की संभावना अधिक मिली, बर्मिंघम में पहली चचेरे भाई से विवाह के दस बच्चों में एक या तो बचपन में मर जाता है या एक गंभीर विकलांगता विकसित करता है. बीबीसी ने यह भी कहा कि, पाकिस्तान में ब्रिटेन, के पाकिस्तानी समुदाय में प्रसवकालीन मृत्यु दर काफी अधिक है. इस का मतलब यह है कि ब्रिटेन में अन्य सभी जातीय समूहों. के मुकाबले मे जन्मजात सभी ब्रिटिश पाकिस्तानी शिशु मौते 41 प्रतिशत अधिक पाई गयी. इसी प्रकार Epidermolysis bullosa अत्यधिक शारीरिक कष्ट का जीवन, सीमित मानवीय और संपर्क शायद त्वचा कैंसर से एक जल्दी मौत भीआनुवंशिक स्थितियों की संभावना बताती है.
माना जाता है, कि मूल पुरुष ब्रह्मा के चार पुत्र हुए, भृगु, अंगिरा, मरीचि और अत्रि. भृगु के कुल मे जमदग्नि, अंगिरा के गौतम और भरद्वाज,मरीचि के कश्यप,वसिष्ट, एवं अत्रि के विश्वामित्र हुए.
इस प्रकार जमदग्नि, गौतम, भरद्वाज, कश्यप, वसिष्ट, अगस्त्य और विश्वामित्र ये सात ऋषि आगे चल कर गोत्रकर्ता या वंश चलाने वाले हुए. अत्रि के विश्वामित्र के साथ एक और भी गोत्र चला बताते हैं.इस प्रकार के विवरण से प्राप्त होती है आदि ऋषियों के आश्रम के नाम.
अपने नाम के साथ गुरु शिष्य परम्परा, पिता पुत्र परम्परा आदि, अपने नगर, क्षेत्र, व्यवसाय समुदाय के नाम जोड कर बताने की प्रथा चल पडी थीं. परन्तु वैवाहिक सम्बंध के लिए सपिंड की सावधानी सदैव वांछित रहती है. आधुनिक काल मे जनसंख्या वृद्धि से उत्तरोत्तर समाज, आज इतना बडा हो गया है कि सगोत्र होने पर भी सपिंड न होंने की सम्भावना होती है. इस लिए विवाह सम्बंध के लिए आधुनिक काल मे अपना गोत्र छोड देना आवश्यक नही रह गया है. परंतु सगोत्र होने पर सपिण्ड की परीक्षा आवश्यक हो जाती है.यह इतनी सुगम नही होती. सात पीढी पहले के पूर्वजों की जानकारी साधारणत: उपलब्ध नही रह्ती. इसी लिए सगोत्र विवाह न करना ही ठीक माना जाता है.
इसी लिए 1955 के हिंदु विवाह सम्बंधित कानून मे सगोत्र विवाह को भारतीय न्याय व्यवस्था मे अनुचित नही माना गया. परंतु अंत:प्रजनन की रोक के लिए कुछ मार्ग निर्देशन भी किया गया है.
वैदिक सभ्यता मे हर जन को उचित है के अपनी बुद्धि का विकास अवश्य करे. इसी लिए गायत्री मंत्र सब से अधिक महत्वपूर्ण माना और पाया जाता है.
निष्कर्ष यह निकलता है कि सपिण्ड विवाह नही करना चाहिये. गोत्र या दूसरे प्रचलित नामों, उपाधियों को बिना विवेक के सपिण्ड निरोधक नही समझना चाहिये
sanjay jee , appane jo bhi likha hai wo sahi hai , lakein aaj ke samay me apani asamat ko aour jathi , dhram ko bachna hai to purani bato ko manan hoga .
pankaj says: Dec28, 2011
sanyay jee, aapjo bhi likhe kam tha, saryupari bramin banshwali upload karna chahiye.
r.p.mishra,
sanjai jee,
please write fully saryupariy brahmin banshwali at your site. this is required to saryupariya bramin.this is very useful for all brahman jan.’
thanking you in advance,