प्रधानमंत्री पद संभालने के बाद मेरी प्राथमिकताएं वही रहीं जो मेरे राजनीतिक जीवन के प्रारंभ में थीं. अपनी प्राथमिकताएं तय करते हुए मैं इस मानसिक बोझ से नहीं दबा कि सरकार कितने दिन चलेगी. जीवन के बारे में मेरा शुरू से एक दृष्टिकोण रहा है. उसे सरकार पर भी लागू करना होगा. जीवन अपने हाथ में नहीं है. अपने हाथ में है कर्म. जीवन लंबा चल सकता है और कल भी समाप्त हो सकता है. दोनों ही स्थितियों में मैं मानता हूं कि कोई व्यक्ति इतिहास का आखिरी व्यक्ति नहीं है. वही सारी समस्याओं का समाधान नहीं कर सकता. कांग्रेस के कुछ नेता शायद यह सोचते थे कि वे जैसा चाहेंगे सरकार को वैसा चलाएंगे. मेरा रूख यह था कि उनकी केवल उचित बातें ही मानूंगा. जिसे ठीक नहीं मानता उसे पूरा नहीं कर सकता. नियुक्तियों के मामलें में मुझे जहां गलत लगा मैंने विनम्रता से मना कर दिया, लेकिन ठीक सिफारिश को मैंने मानने में देर भी नहीं की.
मेरी सरकार को गिराने के लिए एक बहाना बनाया गया. वह बहाना था खुफिया पुलिस का. लेकिन यह अकेला कारण नहीं था. एक उद्योगपति के घर खाने पर कलकत्ता गया था. वहीं किसी ने मुझे कहा कि आपकी सरकार में रिश्वत चल रही है. मैंने कहा मैं इसकी जांच कराऊंगा. मैंने जांच कराई तो पता चला कि एक सज्जन हैं जो उद्योगपतियों से पैसा ले रहे हैं. इसके बाद मैंने साफ कर दिया कि अगर कोई ऐसा व्यवहार करता है वह अपनी जिम्मेदारी पर करे. हम इस तरह की बातों को नजरअंदाज नहीं कर सकेंगे. बाद में एक वरिष्ठ व्यक्ति आये और मुझे कहा कि इस तरह के वाकयात मैं भुला दूं. ऐसी और भी कई घटनाएं हुईं जिसके कारण कांग्रेस से दूरी बढ़ती गयी.
राज्यपालों की नियुक्ति के सवाल पर भी मतभेद उभरे. गुजरात में राज्यपाल की नियुक्ति पर कांग्रेस की आपत्ति यह थी कि उनका चुनावी गणित गड़बड़ा जाएगा. वे चाहते थे हितेन्द्र देसाई को राज्यपाल बनाया जाए. इसी तरह अनुसूचित जाति आयोग के अध्यक्ष की नियुक्ति के मसले पर विवाद था. कांग्रेस चाहती थी कि मैं रामधन को हटाकर उनके किसी आदमी को इसका अध्यक्ष बना दूं. इसी तरह कैबिनेट सेक्रेटरी बनाने के सवाल पर भी मतभेद हुआ. कांग्रेस जिस नाम पर जोर दे रही थी वह एक औद्योगिक घराने का पैरोकार था और मेरी राय में वह लोगों को साथ लेकर काम करने की योग्यता नहीं रखता था.
जहां तक पुलिस की जासूसी का बहाना था, मेरे मित्रों ने यह नहीं सोचा था कि मैं इस्तीफा दे दूंगा. लोकसभा में मैं जवाब देने के लिए खड़ा हुआ उसी समय मेरे पास देवीलाल आये. उन्होंने कहा कि राजीव गांधी जी उनसे बात करना चाहते हैं. मैं जाऊं? मैंने उन्हें कहा – जरू
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Chandrashekhar remained a politician till the end. At 80 one expects such stalwarts to be statesman.
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शुक्रिया, चंद्रशेखर जी के शब्दों को यहां पेश करने के लिए।
समझौता न करना ही तो चंद्रशेखर के होने का असली मतलब था। इस महत्वपूर्ण प्रस्तुति के लिए बधाई.
Dear Sanjay,
Thanking you for publishing the news heading ” Meri sarakar Kyun Gayi”.
from
krishan gopal singh
9831012407
kolkata