मैथिली जी के बारे में रवि रतलामी ने जो कुछ लिखा उससे कई सवाल पैदा हो जाते हैं. मैथिली गुप्त ही क्यों? क्या जिसने जीवन में पैसा नहीं कमाया उसका जीना बेकार है? और अंट-शंट तरीके से जिसने पैसा कमा लिया वह महान आदमी हो गया? आज बाजार और दुकान को स्थापित सत्य बतानेवाले लोग भूल जाते हैं कि घर के बाहर दुकान होनी चाहिए, दुकान में घर नहीं. मैथिली गुप्त के बारे में रवि जी ने जो लिखा है वह बहुत बड़ा सवाल खड़ा करता है कि क्या जीवन में पैसा ही सबकुछ होता है?
मैथिली जी का इस बात पर उखड़ जाना स्वाभाविक है कि वे पैसे के बारे में सोचते तो आज करोड़पति होते. दुकानदारी एक मानसिकता है जो किसी लेखक में भी हो सकती है और पत्रकार में भी. मैथिली जी दुकानदार होते तो अरबपति भले ही हो जाते लेकिन उन करोड़ों शुभकामनाओं और मौन प्रशंसा के पात्र कभी न बनते जो उनके अनाम काम ने उन्हें दिया है. और यह कहावत तो सार्वभौमिक सत्य है ही कि लक्ष्मी और सरस्वती साथ-साथ नहीं आती. जहां आती हैं वहां जरूर कुछ गड़बड़ है. या तो लक्ष्मी की धोखाधड़ी है या फिर सरस्वती का झांसा है.
एक बातचीत में जब पता चला कि कृति देव फान्ट उन्हीं ने विकसित किये थे और तब (1993 में) जब कम्प्यूर एसी कमरों की वस्तु हुआ करते थे. अब ऐसे आदमी की कमाई क्या है? पैसा तो कदापि नहीं. रवि जी के चिट्ठे पर जो टिप्पड़ियां आयी है उससे साफ लगता है कि आज भी अनाम काम करनेवाले लोगों के प्रति एक आम भारतीय के मन में आदर और श्रद्धा का ऊंचा स्थान होता है. मैं मैथिली जी और उन तमाम आविष्कारकों को नारायणमूर्ति से बड़ा देशसेवक मानता हूं जो बिना किसी लाभ का लोभ किये करोड़ो बेजुबानों को कम्पूटर और इंटरनेट पर आवाज दे रहे हैं.
नारायणमूर्ति और अजीम प्रेमजी ने तो पैसा बनाया और मूर्ख मीडिया ने उन्हे सिर पर बिठाया. करोड़ो-अरबों कमाने वाले इन आईटी उद्योगपतियों ने अपने यहां काम करनेवाले लोगों को खूब सुविधा और सहूलियते दे रखी हैं. इसलिए हमें लगता है कि वे महान लोग हैं. लेकिन देश के लिए क्या कर रहे हैं? डालर कमा रहे हैं और अपनी पूंजी बढ़ा रहे हैं, उस पूंजी का कुछ हिस्सा अपने कर्मचारियों पर खर्च करते हैं और कुछ हिस्सा सरकार को टैक्स देते हैं. फिर बची हुई पूंजी को अपना व्यवसाय बढ़ाने में इस्तेमाल करते हैं और किसी दिन होश आता है कि मीडिया ने पर्याप्त पीआर कर दिया है तो देश का राष्ट्रपति होने का सपना पालने लगते हैं. और रूपया मजबूत होने लगे तो लाबिंग करते हैं सरकार रूपये का अवमूल्यन करे और उनके पूंजी भंडार को ऊंचा बनाये रखने में मदद करे. यही देशभक्ति है?
इंफोसिस ने एक भी ऐसा उपकरण या साफ्टवेयर तैयार किया है जो उन गरीबों के भी काम आता जो कम्प्यूटर पर काम करना चाहते हैं. उनकी तो और बड़ी जिम्मेदारी थी. उनके पास पैसा था, सोच थी मानव संसाधन था, वे चाहते तो एक ऐसा आपरेटिंग सिस्टम तैयार कर सकते थे जो भारतीय भाषाओं के अनुकूल होता और इतनी कम कीमत का होता कि हमें विन्डोज के पाईरेटेड वर्जन में काम न करना पड़ता. हमारा सीना भी गर्व से फूल जाता कि मैं अपने देश के एक महान साफ्टवेयरकर्मी का साफ्टवेयर प्रयोग करता हूं जो पूरी तरह से भारतीय है. लेकिन भारतीय भाषाओं की चिंता भी माइक्रोसाफ्ट को होती है, गूगल को होती है नारायणमूर्ति और अजीम प्रेमजी को कभी नहीं होती.
ऐसे हजार नारायणमूर्तियों और अजीमों से ज्यादा महान हैं हमारे मैथिली जी, जीतेन्द्र चौधरी, आलोक कुमार और वे सैकड़ो अनाम लोग जिनके छोटे-बड़े प्रयासों का लाभ हम जैसे गूंगो को मिल रहा है जो अंग्रेजी की बाधा के कारण कम्प्यूटर की दुनिया में अछूत बने हुए थे. ऐसे लोग कुछ और ही मिट्टी के बने होते हैं. इनकी सोच में एक सनकीपन है जो तकनीकि क्षेत्र में भारतीयों के लिए कुछ करना चाहता है. ऐसे हजार पूंजीपत
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सही फ़रमाया, दोस्त.. पैसे व बाज़ार की सत्ता को सर्वोपरि माननेवाली यही सोच है जिसने आज हिन्दी समाचार चैनलों को दो कौड़ी की शक्ल दी हुई है.. इसी पैसे का प्रताप है कि हिन्दी की दोनों ‘राष्ट्रीय’ स्तर की पत्रिकाएं राष्ट्रीय नेटवर्क पर वितरित भले होती हों, धंधा अच्छा करती हों लेकिन हिन्दी की दुनिया का वह आईना किसी भी सूरत में नहीं. पैसे की प्रभुता की गुदगुदाहट से सुखी होने का सपना संजोनेवालों को खुद से एक मर्तबा पूछना ज़रूर चाहिए कि क्या वह ऐसी ही कामना हिन्दी ब्लॉगजगत के लिए कर रहे हैं? उनके माथे में हिन्दी के भले की यही, ऐसी ही तस्वीरें हैं?
sanjay Infosys ke baare mein aapne bhi wo hi likha jo ki rajneta karte rahte hain. kya aapne Sudha Murthy foundation ke baare mein padha hai? Shayad aapko gyat hoga ki Sudha Murthy bhi Infosys ke sansthapak sadsyon mein se hai.Aur Infosys ne pichdi jaati ke vidhyarthiyon ke liye ye yojna shuru ki hai
http://www.infosys.com/media/press_releases/IIIT-B-improve-employability.asp
aap ise 1 tarah ka “affirmative action” kah sakte hain.
Infosys ke doosre sansthapak Nandan Nilekani ki patni Rohini bhi 1 samajsevi sangthan mein sakriya hain. Yahan dekhe
http://www.indianngos.com/a/aksharafoundation.htm
Ho sakta hai main galat hoon , lekin phir bhi samachar patron mein uplabdh jankaari ke aashar par aap kam se kam Infosys ke baare mein likhne se pahle thoda jaanch parakh kar lete to achha hota.
मैथिली जी का योगदान सराहनीय और अनुकरणीय है।
एक अज्ञात भाई जो कुछ कह रहे हैं वह मैं जानता हूं. इसका जवाब मैं पहले भी दे चुका हूं कि उन्होंने अपने यहां काम करनेवाले लोगों के लिए काम किया है इंफोसिस के लिए काम किया है. देश के लिए क्या किया है?
नंदन नीलकेनी की पत्नी और सुधामूर्ति का तो नाम ही नहीं लिया मैंने. वे भद्र महिला हैं और अपने स्तर पर अच्छा काम कर रही हैं. मेरा तो विषय ही दूसरा है. इंफोसिस के उत्थान से देश का कितना उत्थान हुआ.
सही, सही!!
सत्य वचन. मैथली जी कार्य सराहनीय है.
सुधा मूर्तिजी के बारे में जो कुछ अनाम जी ने कहा बिल्कुल सही है, सुधाजी पिछड़े और कमजोर बच्चों को छातृवति आदि बहुत से काम करती हैं और मैंने ऐसे ही सुरत के एक छात्र के बारे में स्थानीय समाचार पत्र में पढ़ा था।
रही बात अजीम प्रेमजी और नारायण मूर्ती की मैं उनका पक्ष नहीं ले रहा पर इतना जरूर कहना चाहूंगा कि हजारों भारतीय छात्र हजारों-या लाख रुपये तन्ख्वाह भारत में पाने की कल्पना भी नहीं कर सकते थे। दोनों अपनी कम्पनियों में भारतीय छात्रों को अच्छी से अच्छी तनख्वाह दे रहे हैं। यह कोई मामूली काम नहीं है, अब अगर वह लाख रुपए देकर करोड़ कमा रहा है तो उसके लिये किसी को कोसा जाना शायद उचित नहीं होगा।
आशा है आप इस टिप्प्णी को अन्यथा नहीं लेंगे ।
पैसा सब कुछ नहीं होता पर बहुत कुछ होता है इस बात को एक मध्यम वर्गीय इन्सान से ज्यादा कौन समझ सकता है।
yes this is true that infosys and wipro has do nothing to the indian people dirctly. but they create the awareness that indian are capable to do something worthwhile. before doing good in the software industries, indian people see themselves worthless by comparing to the foreign people.
i have come to know about a incident when a indian person goes to the UK (or some other western countries i forget the name of country)when he reached the airport . he carry a 2-3 bags with him. so after reaching on the airport that indian man cannot able to hire the coolie on that airport and carry his all belonging with him because he cannot imagine that a UK or USA person can carry bag for him. it is always in the mind of the indian people that western people are superior to indian. so hiring a western person for bag is big thing in his mind. so this kind of self-image we have about ourselves.
Wipro, TCS and Infosys is responsible to create the self-image of a strong indian in the heart of the indian people. They are also responsible to create the shinning branding of india in western countries otherwise india is called the country of snakes and stupid religion. they creating the branding of indian now indian people purchasing the company in the other countries which cannot be imagine in 15 years back.
i am not against the Mr. Mathli he did the great job which is not done by the WIPRO and other companies. and i am really appreciate you to tell us about him because a new blogger is unaware about his contribution but in doing so do not criticize those people which also done the good job (may be they done unintentionally) to promote the indian at this current level.
You are requested to please print a series of articles on those people whose contribution to the hindi in internet is great.
the question is arise why i am not typing in hindi it is because i am good at english typing and poor in hindi typing. and i cannot type with flow in hindi. for that i am sorry. i am learning the typing in hindi as fast as possible.
sanjay sharma
http://www.sanjaysharma71.blogspot.com
सही कहा संजय जी, अगर हमारे कई साथी अपनी प्रतिभा का उपयोग पैसा कमाने में करते तो आज करोड़पति होते लेकिन इसकी बजाए उन्होंने हिन्दी सेवा का मार्ग चुना। कभी इस पर हमारी भी लिखने की इच्छा है।
Yo , I am making a website almost the same as ehow and your articles would fit the context good. Would you care if I post this article?