स्त्री-पुरूष संबंधों के बीच एक वायरस आ गया है. उस वायरस का नाम है- एड्स. इस वायरस की महिमा ही कहें कि कामुकता ने नैतिकता का जामा पहन लिया है. और हम अपनी-अपनी खोल से बाहर आते जा रहे हैं. जीवन पर खतरा है इसलिए बहस से कोई गुरेज नहीं. क्या दफ्तर, क्या दुकान और क्या घर का बैठकखाना. एड्स का बहसी वायरस चहुंओर दनदनाता हुआ घूम रहा है. हम भयातुर हैं कि ईश्वर मुझे बचा लेना इस वायरस से. लेकिन चिंता तब कम हो जाती है जब हमें पता चलता है कि इस वायरस से लड़नेवाला एक शूरवीर है जिसका नाम है – कन्डोम.
लेकिन क्या खेल सिर्फ उतना ही है जितना हम देख रहे हैं? हाल में देश के स्वास्थमंत्री ने भी कहा है कि एड्स के मसले पर बात उतनी भी नहीं बिगड़ी है जितना बताया जा रहा है. लेकिन भारत सरकार की ही लोक लेखा समिति ने साल भर पहले जारी अपनी एक रिपोर्ट में कहा था देश में इसी गति से एड्स रोगी बढ़ते रहे तो सन 2010 तक 2.5 करोड़ एड्स संक्रमित रोगी हो जाएंगे. इस लोकलेखा समिति के अध्यक्ष राष्ट्रवादी पार्टी के राष्ट्रवादी नेता विजय कुमार मल्होत्रा थे. रिपोर्ट में इस आंकड़े के लिए जिस अमरीकन संस्था का हवाला दिया गया है उसका नाम है अमेरिकन नेशनल इंटेलिजेन्स काउंसिल. यह नाको छाप कोई एड्स कन्ट्रोल करने वाली संस्था नहीं है. यह अमरीका के सभी खुफिया एजंसियों के बीच समन्वय का काम करती है.
तो क्या एड्स के तार अमरीका की खुफिया एजंसियों से जुड़े हुए हैं. ऐसा क्यों? 2002 में भारत के दौरे पर आये बिल गेट्स की प्रेस कांफ्रेस में जो पर्चा बंटा था वह सीआईए ने तैयार किया था. उस पर्चे में कहा गया था कि भारत में एड्स का फैलाव जिस गति से हो रहा है उससे अमरीका की राष्ट्रीय सुरक्षा को खतरा पैदा हो गया है. इसी खतरेवाली रिपोर्ट में यह कहा गया था कि 2010 तक भारत में 2.5 करोड़ एड्स रोगी पैदा हो जाएंगे. और क्योंकि अमरीकन अब भारत के पोर्न व्यवसाय में संलग्न हैं इसलिए यह अमरीका की राष्ट्रीय सुरक्षा को खतरा है.
एड्स रोग का वायरस कम, व्यवसाय और अघोषित युद्ध का वायरस ज्यादा है. भारत में आजकल सालाना कन्डोम 175 करोड़ बिकता है और इसमें सालाना 25 फीसदी की वृद्धि हो रही है. हालांकि यह बहुत बड़ा बाजार नहीं है और इस क्षेत्र में सालाना केवल 250 करोड़ का बिजनेस होता है लेकिन वृद्धिदर पर्याप्त है. एड्स का भय बढ़ेगा तो कंडोम की बिक्री और एसआरवी की मांग बढ़ेगी. आज एड्स की दवा को सरकार फंड करती है और उस फंड का पैसा विदेश से आता है. यानि विदेश से आया पैसा घूम-फिर कर फिर विदेश चला जाता है. एड्स सरकार के लिए महामारी है. इसलिए अन्य रोगों से लड़ने-बचने की कोई जरूरत नहीं है. सरकारी एजंसी वही काम करती हैं जिसमें उन्हें पैसा मिलता है. आज एड्स के नाम पर पानी की तरह पैसा बहाया जा रहा है. और एजंसियां बजट बनाकर खर्च करने में लगी हुई हैं.
पानी की तरह बहते इस पैसे को नाको से लेकर कुकुरमुत्तों की तरह उग आये सैकड़ो एनजीओ भी लपक रहे हैं. अचानक ही एड्स जागरूकता अभियान चलानेवाले एनजीओ की भरमार हो गयी है. और इन संस्थानों को एड्स एक भयावह महामारी दिखाई देने लगी है. कल इनका पैसा बंद हो जाए न इन्हें एड्स दिखाई देगा और एड्स की महामारी. सच्चाई यह है कि इनके आका कहीं और बैठे हैं जिनका लक्ष्य साफ है. इतना पैसा फेंक दो कि एक आम भारतीय अपनी ही नजर में गिर जाए. और हम गिरने के लिए तैयार बैठे हैं. क्यों?
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“सच्चाई यह है कि इनके आका कहीं और बैठे हैं जिनका लक्ष्य साफ है. इतना पैसा फेंक दो कि एक आम भारतीय अपनी ही नजर में गिर जाए. और हम गिरने के लिए तैयार बैठे हैं. क्यों?”
एक दम सही निष्कर्ष है आप का
— शास्त्री जे सी फिलिप
हिन्दी ही हिन्दुस्तान को एक सूत्र में पिरो सकती है
http://www.Sarathi.info
Sahi kaha hai Bhai, har jagah NGO khel rahi hai.
पते की बात कही है आपने। इस नंगे सच का प्रचार-प्रसार बहुत जरुरी है। मैने कुछ दिनो पहले ही इस पर कविता लिखी है। आप पढ्ने के लिये आमंत्रित है।
तब तो न था दामन मैला
http://dardhindustani.blogspot.com/2007/07/blog-post_9106.html