संघ का दिल्ली कार्यालय राजनीतिक गतिविधियों का गहरा अड्डा बन चुका है. जब से केन्द्र में अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार आयी संघ कार्यालय पर लाल बत्तियों की आवाजाही बढ़ गयी. इसका असर यह हुआ कि रानी झांसी रोड पर इस लंबे चौड़े भूखण्ड पर सरगर्मियां बढ़ गयी हैं. पिछले दस सालों से यहां सुरक्षाकर्मी भी तैनात हैं जो स्वयंसेवकों की डंडा सुरक्षा से अलग बाकायदा मेटल डिटेक्टर लगाकर जांच पड़ताल करते हैं. शुरूआत में थोड़ा विरोध जरूर हुआ था लेकिन बाद में संघ के स्वयंसेवक भी इस सुरक्षा के अभ्यस्त हो गये.
इसी संघ कार्यालय पर शुक्रवार को मोहनराव भागवत ने प्रेस कांफ्रेस आयोजित की. जो प्रेस रिलीज बांटी गयी या फिर जो कुछ शुरूआत में उन्होंने कहा उसमें से एक लाईन भी कहीं खबर नहीं बनी. बनती भी क्यों किसी संघ के विकास से देश की मुख्यधारा को क्या लेना लादना है? जब बात शुरू हुई तो घूम-फिरकर हर कोई संघ भाजपा संबंधों पर पूछता और मोहनराव भागवत बड़ी चालाकी से उत्तर देने से बच जाते. लगभग एक घण्टे की प्रेस कांफ्रेस में उन्होंने एक ही बात काम की कही कि संघ में जो तय हुआ है भाजपा को वही अमल में लाना होगा. अब क्या तय हुआ है और भाजपा को क्या अमल में लाना है यह तो संघ जाने और भाजपा वाले जानें लेकिन भाजपाईयों के इस मक्का से समय समय पर चुपचाप फतवे तो निकलते ही रहते हैं.
जब तक वाजपेयी प्रभावी रहे उन्होने इस मक्का को मक्के की रोटी का भाव भी नहीं दिया. खुद वाजपेयी कभी संघ कार्यालय नहीं आये और जब भी संघ भाजपा के बीच बात करनी हुई तो संघ के सरसंघचालक को ही घर बुला लिया. इसके कूटनीतिक संकेत विजय वाले थे. वाजपेयी के छह साल के शासनकाल में संघ कभी उनके खिलाफ मुखर नहीं हुआ लेकिन जब यही चाल आडवाणी ने खेलनी शुरू की तो उनको बहुत भारी पड़ गया. वाजपेयी की ही तर्ज पर आडवाणी ने उन्हीं सुधीन्द्र कुलकर्णी और कुछ अन्य नेताओं को साथ मिलाकर अपना गुट बनाना चाहा तो मक्का ने फतवा जारी कर दिया कि अब आप रास्ता छोड़ दें.
भाजपा के लोग लाख कहें कि संघ उनकी राजनीति में सिर्फ मार्गदर्शक की भूमिका में रहता है या फिर संघ लाख कहे कि वह भाजपा को सिर्फ सलाह देता है, लेकिन सच्चाई यह है कि भाजपा फुल टाईम संघ का पेड राजनीतिक वर्कर है तो संघ फुल टाईम सिर्फ भाजपा के कामकाज के बारे में ही सोचता रहता है. संघ में अब शायद ही कोई कार्यकर्ता हो जो भाजपा में दखल देना अपना अधिकार न समझता हो. जैसे ऋषिकेश के सन्यासी की कीमत तब होती है जब उसे कोई एक विदेशी भक्त मिल जाता है वैसे ही संघ में उस कार्यकर्ता की अहमियत अपने आप बढ़ जाती है जिसके आगे पीछे भाजपा के नेता टहलते हों. इसका सबसे बड़ा प्रमाण खुद भागवत की प्रेस कांफ्रेस है जिसमें सैकड़ों पत्रकार, दर्जनों टीवी चैनल के लोग सिर्फ इसलिए ही तो आये क्योंकि वे भाजपा के बारे में कुछ बोलेंगे.
खैर, जब तक भाजपा है तब तक इस मक्का की अहमियत खत्म नहीं होगी. यह हर भाजपाई जानता है.
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इनके जोकर वहा पर एक जिन्ना की मूर्ती भी स्थापित कर लेते तो फायदे में रहते !
मक्का के स्थान पर चारधाम लिखते तो ज्यादा सार्थक होता…नहीं?
मक्का थोड़ा सटीक बैठता है. और कोई बात नहीं
khamkhan hi… muddaa kya hai yaar!…. bina koi prasang ke …. bas khinchaai hi karani hai? aur koi kaam nahin raha gaya lagata hai sanjayaji ke paas?