समकाल मे चिट्ठाकारों पर लिखी स्टोरी को काकेश ने जब अपने ब्लाग पर प्रकाशित कर दिया तब वहां कुछ लोगों ने मेरे द्वारा दी गयी जानकारियों को अपर्याप्त और अधूरा बताया जो कि है भी. आप कहेंगे कैसे?
तो इन्हीं जानकारियों में एक जानकारी मैंने यह दी थी कि आलोक कुमार हिन्दी के पहले ब्लागर हैं और उनके हिन्दी ब्लाग का नाम है नौ-दो-ग्यारह. लेकिन हाल में ही जो मुझे पता चला है उससे नौ-दो-ग्यारह के पहले हिन्दी ब्लाग होने पर सवाल खड़ा होता है. प्राप्त सूचना देखें तो नौ-दो-ग्यारह पर पहली हिन्दी पोस्ट दिखाई देती है सोमवार 21 अप्रैल 2003 को. जबकि एक अन्य हिन्दी ब्लाग “हिन्दी” पर हिन्दी में पहली पोस्ट है शनिवार 19 अक्टूबर 2002 को. और चार दिन बाद एक दूसरी हिन्दी में पोस्ट है जिसमें जय हनुमान की तख्ती का विस्तार से उल्लेख किया गया है. जैसा कि इस ब्लाग के अध्ययन से पता चलता है कि यशवंत मलैया नामक किसी व्यक्ति ने यह हिन्दी साईट शुरू की थी जिसमें हिन्दी से जुड़ी जानकारियों को देने का वचन दिया गया है. सौभाग्य से दोनों ब्लाग अस्तित्व में है, तो फिर आप ही बताईये हिन्दी का पहला ब्लाग कौन सा है?
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इसमें इतने कौतूहल की कोई बात नहीं है, विनय जैन द्वारा http://hindi.blogspot.com शुरु किया गया था (मलैया की साईट की कड़ी उन्होंने दी है उल्लिखित पोस्ट में, मलैया इसके लेख नहीं हैं) और वे नेट पर काफी सालों से हैं। हम पहला हिन्दी ब्लॉगर पहला पूर्णतः हिन्दी पोस्ट लिखने के लिहाज़ से पुकारते रहे हैं। विनय अपने चिट्ठे पर अंग्रेज़ी में ही लिखते थे। तो पहली हिन्दी पोस्ट लिखी गई 21 अप्रैल 2003 को और दूसरी हिन्दी लिखी विनय जैन ने 24 जून 2003 को। इस लिहाज़ से आलोक को पहला चिट्ठाकार पुकारा जाता है, अतः ये श्रेय विनय और आलोक दोनों को ही दे सकते हैं। श्रेय किसी को भी जाये इससे विनय और आलोक दोनों के प्रति हमारा सम्मान कम नहीं होगा। एडमंड हिलेरी और तेंग्ज़िंग नार्गे, दोनों का ही नाम इतिहास में दर्ज है।
पुनश्चः मैंने विनय का ब्लॉग अभी देखा और आज की तिथि में तो उनकी ब्लॉग पोस्ट वाकई पहली दिखती है जैसा कि आपने लिखा है, अक्टुबर २००२ की। हैरत है कि मैंने पहले क्यों नहीं देखा। अब तो विनय ही बता पायेंगे।
एडमंड हिलेरी और तेंग्ज़िंग नार्गे, दोनों का ही नाम इतिहास में दर्ज है।
वाह देबू दा, खूब मिसाल दी है!
संजय तिवारी ने सही बात कही है। अब क्या हिंदी ब्लाग का जन्मदिन बदला जायेगा।
आलोक और विनय दोनों ही चुपचाप काम करने वालों में रहे हैं। अपने काम का बखान इनकी फ़ितरत में नहीं हैं।
सही है, यह सब चलते रहना चाहिये. हमेशा इस तरह के स्पेस उपलब्ध होते हैं. आपने ध्यान दिया, आभार.
वैसे है तो एक सूचना भर ही पर हम भी कई जगह आलोक की ‘क्या आप हिंदी पढ पा रह हैं’ वाली पोस्ट को पहली यूनीकोड हिदी पोस्ट घोषित कर चुके हैं- अकादमिक दुनिया में तथ्यों को पवित्र माना जाता है इसलिए हम भी इच्छुक हैं कि तथ्यात्मक यथास्थिति का पता चले।
अच्छी बहस चल रही है. (मुर्गी पहले या अण्डा टाइप?
)
जानकारी के लिये धन्यवाद.
आलोक भाई और विनय भाई,
दोनो हो बहुत पुराने चिट्ठाकार है, दोनो ही हमारे लिए आदर्श है। इन दोनो ने हिन्दी के लिए जो भी कार्य किए, चुपचाप, पर्दे के पीछे रहकर किए, कभी भी श्रेय लेने के लिए आगे नही आए। महान लोगों की यही पहचान होती है।
अब इस तारीख के विषय मे या तो आलोक भाई बता सकते है या विनय भाई। हम और आप इस पचड़े मे काहे पड़े? वैसे मै नही समझता यदि हम आलोक को पहला चिट्ठाकार मानेंगे तो विनय को बुरा लगेगा या विनय को मानेंगे तो आलोक को। दोनो ही वरिष्ठ चिट्ठाकार है।
बकिया आप लोग वाद विवाद करने के लिए स्वतन्त्र है।
क्या इतिहास की बखिया उधेड़ने के राजनेता कम पड़ रहे हैं?
विनय जी की 19 अक्तूबर 2002 की जो पहली पोस्ट है, उसमें तो केवल एक लिंक दिया है और चार दिन बाद की दूसरी पोस्ट में तख्ती की साइट पर डॉक्यूमेंटेशन से कुछ टैक्स्ट कॉपी-पेस्ट किया गया है।
मतलब इन दो पोस्टों में विनय जी ने खुद हिन्दी टाइप नहीं की थी। खुद टाइप करके पहली पोस्ट आलोक जी द्वारा 21 अप्रैल 2003 को की गई है।
अब यह बहस का विषय हो सकता है कि पहला हिन्दी ब्लॉग/पोस्ट किसे माना जाए।
इस बहस से मुझे जो समझ में आ रहा है वह यह कि –
1. तथ्यात्मक रूप से देखें तो फिलहाल विनय जैन हिन्दी के पहले चिट्ठाकार हैं जिन्होंने 23 अक्टूबर 2002 को हिन्दी का पहला चिट्ठा लिखा था. यह तभी तक मान्य होगा जबतक कि कोई नयी खोज सामने नहीं आ जाती.
2. श्रीश की यह बात मान भी लें कि हिन्दी पर पहली पोस्ट कापी-पेस्ट है तो भी 23 अक्टूबरवाली पोस्ट के बारे में यह नहीं कहा जा सकता. वह तो बाकायदा लिखी गयी है.
3. जीतेन्द्र और देबाशीष ने दोनों के योगदान को समान माना है और मैं उनकी इस बात से पूरी तरह सहमत हूं. आलोक, विनय के साथ-साथ अनूप शुक्ल, जीतेन्द्र, देबाशीष, रवि रतलामी, जैसे शुरूआती चिट्ठाकारों की भूमिका को भी कम करके नहीं आंका जा सकता. और ऐसे अनाम चिट्ठाकारों को भी नमन करना होगा जो आये-गये लेकिन उनके कम-अधिक कामों से चिट्ठाजगत संपन्न हुआ है.
4. मैं न पहला चिट्ठाकार हूं न आखिरी. बीच रास्ते कहीं मिला हूं और चलते-चलते समय आने पर कहीं अलग हो जाऊंगा. लेकिन हिन्दी चिट्ठा अब नयी ऊंचाईयों पर लगातार चढ़ता चला जाएगा. और इस सफर में अभी हजारों-लाखों लोग आयेंगे और अपनी क्षमता से इसे बुलंदियों पर ले जाएंगे.
5.तय है इतिहास लिखा जाएगा तो उसमें हम कहीं नहीं होंगे. सफर की शुरूआत और अंत ही इतिहास बनता है हम सब बीच रास्ते के मुसाफिर है. इसलिए जिन्होंने शुरू किया उनको धन्यवाद और जो नये चिट्ठाकार आ रहे हैं उनको मेरा नमन.