मातृत्व एक ऐसी सौगात है जो हर जीव योनि को समान सुख देती है. मां का अपने शिशु से रिश्ता उस जीव योनि के स्वभाव से निर्धारित होता है. लेकिन हर जीव योनि में एक बात समान होती है कि मातृत्व के बिना संपूर्णता और संतति दोनों ही बधित हो जाते हैं. इंसान का बुद्धि विकास और तर्क क्षमता सर्वाधिक है इसलिए उसने मातृत्व को भी बहुत कुसंस्कारित कर दिया है. आप पायेंगे कि जो मां जितनी अधिक आधुनिक है वह मातृत्व से उतनी ही विमुख है. लेकिन जिन्हें आधुनिक शिक्षा का कुसंस्कार ज्यादा नहीं मिला है वे इस संबंध की संवेदनशीलता को संपूर्णता में ही स्वीकार करते हैं.
लेकिन शिक्षा की विनाशकारी व्यवस्था ने आधुनिक मनुष्य की बुद्धि को जिस प्रकार जड़ कर दिया है उसने प्रकृति की व्यवस्था में घातक दोष पैदा कर दिया है. मनुष्य मानता है कि प्रकृति में वह जैसा चाहे वैसी व्यवस्था होनी चाहिए. अत्याचार की हद यह कि हमारे शहरों के विस्तार ने सिर्फ इंसान और उसकी सुविधा के लिए उपलब्ध संसाधनों के अलावा और किसी बात के लिए कोई जगह नहीं बची है.
काली कुतिया सड़क पर आवारा घूमती है. भौंकती है लेकिन काटती नहीं. भौंकना उसका स्वभाव है, काटना उसे हम सिखाते हैं. अब तक तो उसने काटना नहीं सीखा है. इस साल तीन साल की हो गयी. जो महीना चल रहा है वह कुत्तों के समागम का महीना होता है इसलिए उसके आस पास भी कुत्तों की फौज मंडराने लगी थी. लेकिन अचानक इस व्यवस्था में इंसान ने अपनी शिक्षित बुद्धि के साथ प्रवेश किया. नगर निगम के लोग आये. न जाने कब आये और उसे पकड़कर ले गये. आज देखा तो उसके पेट पर पट्टी बंधी है. पूछने पर पता चला कि सरकार ने उसकी नसबंदी कर दी है. अब वह कभी मां नहीं बन सकेगी.
मैं जानता हूं शिक्षित मष्तिष्क के लिए यह कोई आपदा नहीं है. आपदा तब है जब कोई संजय गांधी पैदा होता है और कहता है कि इंसानों की जबरन नसबंदी कर दो. कुत्तों की नसबंदी से इंसान को भला क्या फर्क पड़ेगा? उसकी शिक्षित बुद्धि यह कहती है कि जेब में पैसा रखो, बाजार जाओ और एक बढ़िया नस्ल का कुत्ता खरीदकर ले आओ. फिर उस कुत्ते को सिर पर बैठाओ और उसकी पूरी चिंता करो. यह शिक्षित और स्वार्थ बुद्धि है जो कहती है कि उससे ही मतलब रखो जिससे तुम्हें कोई फायदा होता हो. लेकिन जिससे हमारा कोई फायदा न हो क्या उसको उसी रूप में जीवन जीने का कोई अधिकार नहीं है? फिर सवाल इंसान या जानवर का नहीं है. सवाल है कि हम कैसे सोचते हैं? आज जो इंसान किसी जानवर के जीवन में हस्तक्षेप करके खुश होत है क्या वही इंसान अपने जीवन में हस्तक्षेप बर्दाश्त करेगा?
लेकिन कौन सुनता है? सब तो शिक्षित होते जा रहे हैं. शिक्षित होने का अर्थ ही होता है अस्तित्व से कट जाना. अपने आस पास से हट जाना. हमारी शिक्षा प्रणाली जिस तरह से हमें इंसान से राक्षस बना देती है उसी का परिणाम है कि हम अपने अलावा किसी और का अस्तित्व स्वीकार ही नहीं करना चाहते. घिन आती है कि ऐसी शिक्षा प्रणाली से निकले लोग ही आधुनिक और पढ़े लिखे कहे जाते हैं. थू है ऐसी पढ़ाई और शिक्षा पर जो इंसान को स्वार्थी राक्षस में तब्दील कर देती है.
Possibly Related Posts:
- ब्लागरों के लड़ने झगड़ने की आदत यहां भी नहीं गयी
- ब्लागवाणीः आदि, अंत, अनंत…
- चारे पासे सुख हूण किसी ने ना दुख हूण
- दुनिया के सभी संजय तिवारी एक हो जाएं
- मेरे पास इंटरनेट है, और आपके पास क्या है?
जब यह शिक्षा प्रणाली नहीं थी, तब इंसान कैसा था?
हमने कुछ शब्द घड़ लिए है और हर समस्या के लिए उन्हे कोस कर निवृत हो जाते है.
प्रकृति के काम में हस्तक्षेप अपराध है. मगर आज मानवजाती के अस्तित्व को बचाने के लिए यह काम किया जाता है ताकि आबादी पर नियंत्रण लाया जा सके.
आवारा कुत्ते भी एक समस्या है. यह सोच गलत है मगर है. एक उपाय है उन्हे मार देना. दुसरा है उनकी नसबन्दी कर आबादी को नियत्रित करना. कौन सा ज्यादा मानवीय है?
आपकी सोच संवेदनशील और आवाकार्य है. पोस्ट देख अच्छा भी लग रहा है. साधूवाद, प्राणियों के बारे में सोचने के लिए. मैने केवल दुसरा पहलू लिखा है.
ऐसा बिल्कुल नहीं है कि दिल्ली में आवारा कुत्ते कोई समस्या हैं. हमारी तर्कबुद्धि ने उन्हें समस्या बना रखा है.
बेगाणी जी की बात से पूरी तरह सहमत हूँ !