दिल्ली दरबार “पप्पू कान्ट वोट साला”

भारतनामा “शिक्षा चाहिए संस्कार नहीं”

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ब्लागवाणीः आदि, अंत, अनंत…

Posted by संजय तिवारी on Sep 28th, 2009 and filed under बियाबान में शोर. You can follow any responses to this entry through the RSS 2.0. You can leave a response or trackback to this entry

ब्लागवाणी भी एक प्रयोग ही था. मार्च-अप्रैल 2007 में जब ब्लागवाणी की शुरूआत की गयी थी तो लक्ष्य क्या था? हिन्दी में ब्लाग बढ़ने लगे थे. दिल्ली में सामान्य सा व्यापार करनेवाले मैथिली गुप्त ने सोचा कि हिन्दी के ब्लागों के लिए एक ऐसा एग्रीगेटर होना चाहिए जो बिना लाग लपेट और किसी पूर्वाग्रह के लोगों के लिखे को सबके सामने लाये. उनसे जब भी बात हुई तो हमेशा वे एक बात बोलते थे कि ब्लागवाणी पर कौन सा ब्लाग होगा और कौन सा ब्लाग नहीं होगा इसका चयन करते समय वे और किसी बात का ध्यान नहीं रखते. सिर्फ एक ही बात का ध्यान रखते हैं कि ब्लाग लिखनेवाला किस तरह से ब्लाग लेखन कर रहा है. जब मैथिली गुप्त ब्लागवाणी लेकर मैदान में डटने के लिए आ रहे थे उसी वक्त अनिल अंबानी की कंपनी बिग अड्डा ने ब्लाग अड्डा नाम से एक ब्लाग एग्रीगेटर लांच किया था लेकिन समय के साथ ब्लाग अड्डा गायब हो गया और ब्लागवाणी आगे बढ़ गया.
लेकिन इसके जिन प्रयोगों का स्वागत होना चाहिए था उसको ही इसकी आलोचना का रास्ता बना लिया गया. देशभर में फैले तकनीकि के जानकार शूकरों ने अपनी अपनी तरह से ब्लागवाणी पर हमला बोलना शुरू किया. जिस नेकनीयती से इस एग्रीगेटर को शुरू किया गया था कि हिन्दी के ब्लागरों के बीच एक प्लेटफार्म बने उस नेकनीयती को कीचड़ में घसीटकर उस पर गोबर फेंकने का काम शुरू हो गया. ऐसे शूकरों और वायरसों ने अपनी अपनी तरह से ब्लागवाणी को निशाने पर लेना शुरू कर दिया. इसका नतीजा यह हुआ बनने के साथ ही आये िदन ब्लागवाणी विवाद का दूसरा नाम हो गया. इंटरनेट की सतही समझ ने इन शूकरों को दिन रात मुंह मारने का मौका दे दिया. इससे ब्लागवाणी के संचालकों को आर्थिक और तकनीकि नुकसान जो हुआ सो हुआ, मानसिक रूप से अधिक कष्ट हुआ. कई मौके ऐसे आये जब उन्होंने इसे बंद करके गोवा चले जाने की मंशा जाहिर की. फिर भी वे बने रहे. हिन्दी में ब्लाग लिखनेवालों को एक ऐसा माध्यम मिला रहा जो एक दूसरे से आपस में जोड़ता था. ब्लाग के बाहर की दुनिया के लिए भले ही ब्लागवाणी का कोई मतलब न हो लेकिन ब्लागरों के लिए ब्लागवाणी सबसे बेहतरीन माध्यम था. आखिरकार तकनीकि विरोधी जीते और मैथिली गुप्त को इस हद तक मानसिक रूप से परेशान किया कि वे ब्लागवाणी समेटकर अलविदा कह गये.
ब्लागवाणी के बंद होने से पहला बडा़ सवाल तो यही उठता है कि ऐसे शूकरों और हिन्दी के वायरसों से मुक्ति कैसे मिले? मैथिली गुप्त व्यावसायिक इंसान नहीं हैं, ऐसा कहना ठीक नहीं होगा लेकिन अच्छे काम के प्रति उनके मन में हमेशा आग्रह रहता है. ब्लाग का चुनाव करते समय भी वे यही बात ध्यान में रखते थे क्योंकि वे मानते थे कि भविष्य में इंटरनेट पर वैकल्पिक पत्रकारिता अगर ब्लाग के जरिए होनी है तो एग्रीगेटर को महत्वपूर्ण भूमिका निभानी होगी. ऐसे में कतर-ब्यौंत करना उनकी मजबूरी भी थी लेकिन इसके रास्ते में सबसे बडी़ बाधा मनुष्य का वह स्वभाव आती है जिसके अंदर यह छटपटाहट होती है कि वह जो कुछ भी लिख रहा है उसे लोग पढे़. इंटरनेट और ब्लाग ने उसे वह माध्यम भी मुहैया करवा दिया है कि व्यक्ति अभिव्यक्ति के लिए स्वतंत्र है. व्यक्तिगत इच्छा और सार्वजनिक जरूरत के बीच का यह द्वंद बहुत जटिल है. फिर भी मैथिली गुप्त और उनकी टीम ने इस द्वंद को बखूबी संभाला. और दो साल तक ब्लागवाणी को बनाये और चलाये रखा.
कुछ लोग तर्क देते हैं कि ऐसे काम भावुक होकर नहीं किये जाते. मेरा कहना है कि ऐसे काम भावुकता में ही किये जाते हैं. रेशनल बुद्धि से निर्जीव व्यापार तो होते हैं लेकिन सजीव काम नहीं होता. ब्लागवाणी ब्लागरों के बीच एक सजीव उपस्थिति थी. कहने के लिए तो अभी भी कई एग्रीगेटर हैं और हो सकता है कुछ और लोग एग्रीगेटर बना दें लेकिन कोई भी वह स्थान नहीं भर सकता जो ब्लागवाणी को स्वतः ही मिल गया था. बेहतर तो हो कि मैथिली गुप्त और टीम ब्लागवाणी कुछ नया अवतार लेकर आये जिसमें पीछे की गलतियों को दोहराने की गुंजाईश न हो और वह उनकी इच्छा वैकल्पिक पत्रकारिता को भी पूरा करता हो.

नयी तकनीकि और नये माध्यम आये तो हिन्दी को कैसे व्यवहार करना चाहिए था? वह और अधिक उदात्त होती और ज्ञान की शिष्टता को स्थापित करती. लेकिन हुआ क्या? जैसे जैसे तकनीकि के द्वारा नये माध्यम उभरे हिन्दी ऐसे शूकरों की प्रतिनिधि भाषा हो गयी है जो सिवाय गंदगी में मुंह मारने के अलावा दूसरा कोई काम ही नहीं करते. ऐसे शूकरों की कुल ताकत का आधार थोडा़ सा तकनीकि ज्ञान है. इन्हीं शूकरों की वजह से टेलीविजन उद्योग बर्बाद हुआ और अब इंटरनेट पर एक एक प्रयोग धराशाही होने शुरू हो गये हैं.

ब्लागवाणी भी एक प्रयोग ही था. मार्च-अप्रैल 2007 में जब ब्लागवाणी की शुरूआत की गयी थी तो लक्ष्य क्या था? हिन्दी में ब्लाग बढ़ने लगे थे. दिल्ली में सामान्य सा व्यापार करनेवाले मैथिली गुप्त ने सोचा कि हिन्दी के ब्लागों के लिए एक ऐसा एग्रीगेटर होना चाहिए जो बिना लाग लपेट और किसी पूर्वाग्रह के लोगों के लिखे को सबके सामने लाये. उनसे जब भी बात हुई तो हमेशा वे एक बात बोलते थे कि ब्लागवाणी पर कौन सा ब्लाग होगा और कौन सा ब्लाग नहीं होगा इसका चयन करते समय वे और किसी बात का ध्यान नहीं रखते. सिर्फ एक ही बात का ध्यान रखते हैं कि ब्लाग लिखनेवाला किस तरह से ब्लाग लेखन कर रहा है. जब मैथिली गुप्त ब्लागवाणी लेकर मैदान में डटने के लिए आ रहे थे उसी वक्त अनिल अंबानी की कंपनी बिग अड्डा ने ब्लाग अड्डा नाम से एक ब्लाग एग्रीगेटर लांच किया था लेकिन समय के साथ ब्लाग अड्डा गायब हो गया और ब्लागवाणी आगे बढ़ गया.

लेकिन इसके जिन प्रयोगों का स्वागत होना चाहिए था उसको ही इसकी आलोचना का रास्ता बना लिया गया. देशभर में फैले तकनीकि के जानकार शूकरों ने अपनी अपनी तरह से ब्लागवाणी पर हमला बोलना शुरू किया. जिस नेकनीयती से इस एग्रीगेटर को शुरू किया गया था कि हिन्दी के ब्लागरों के बीच एक प्लेटफार्म बने उस नेकनीयती को कीचड़ में घसीटकर उस पर गोबर फेंकने का काम शुरू हो गया. ऐसे शूकरों और वायरसों ने अपनी अपनी तरह से ब्लागवाणी को निशाने पर लेना शुरू कर दिया. इसका नतीजा यह हुआ बनने के साथ ही आये िदन ब्लागवाणी विवाद का दूसरा नाम हो गया. इंटरनेट की सतही समझ ने इन शूकरों को दिन रात मुंह मारने का मौका दे दिया. इससे ब्लागवाणी के संचालकों को आर्थिक और तकनीकि नुकसान जो हुआ सो हुआ, मानसिक रूप से अधिक कष्ट हुआ. कई मौके ऐसे आये जब उन्होंने इसे बंद करके गोवा चले जाने की मंशा जाहिर की. फिर भी वे बने रहे. हिन्दी में ब्लाग लिखनेवालों को एक ऐसा माध्यम मिला रहा जो एक दूसरे से आपस में जोड़ता था. ब्लाग के बाहर की दुनिया के लिए भले ही ब्लागवाणी का कोई मतलब न हो लेकिन ब्लागरों के लिए ब्लागवाणी सबसे बेहतरीन माध्यम था. आखिरकार तकनीकि विरोधी जीते और मैथिली गुप्त को इस हद तक मानसिक रूप से परेशान किया कि वे ब्लागवाणी समेटकर अलविदा कह गये.

ब्लागवाणी के बंद होने से पहला बडा़ सवाल तो यही उठता है कि ऐसे शूकरों और हिन्दी के वायरसों से मुक्ति कैसे मिले? मैथिली गुप्त व्यावसायिक इंसान नहीं हैं, ऐसा कहना ठीक नहीं होगा लेकिन अच्छे काम के प्रति उनके मन में हमेशा आग्रह रहता है. ब्लाग का चुनाव करते समय भी वे यही बात ध्यान में रखते थे क्योंकि वे मानते थे कि भविष्य में इंटरनेट पर वैकल्पिक पत्रकारिता अगर ब्लाग के जरिए होनी है तो एग्रीगेटर को महत्वपूर्ण भूमिका निभानी होगी. ऐसे में कतर-ब्यौंत करना उनकी मजबूरी भी थी लेकिन इसके रास्ते में सबसे बडी़ बाधा मनुष्य का वह स्वभाव आती है जिसके अंदर यह छटपटाहट होती है कि वह जो कुछ भी लिख रहा है उसे लोग पढे़. इंटरनेट और ब्लाग ने उसे वह माध्यम भी मुहैया करवा दिया है कि व्यक्ति अभिव्यक्ति के लिए स्वतंत्र है. व्यक्तिगत इच्छा और सार्वजनिक जरूरत के बीच का यह द्वंद बहुत जटिल है. फिर भी मैथिली गुप्त और उनकी टीम ने इस द्वंद को बखूबी संभाला. और दो साल तक ब्लागवाणी को बनाये और चलाये रखा.

कुछ लोग तर्क देते हैं कि ऐसे काम भावुक होकर नहीं किये जाते. मेरा कहना है कि ऐसे काम भावुकता में ही किये जाते हैं. रेशनल बुद्धि से निर्जीव व्यापार तो होते हैं लेकिन सजीव काम नहीं होता. ब्लागवाणी ब्लागरों के बीच एक सजीव उपस्थिति थी. कहने के लिए तो अभी भी कई एग्रीगेटर हैं और हो सकता है कुछ और लोग एग्रीगेटर बना दें लेकिन कोई भी वह स्थान नहीं भर सकता जो ब्लागवाणी को स्वतः ही मिल गया था. बेहतर तो हो कि मैथिली गुप्त और टीम ब्लागवाणी कुछ नया अवतार लेकर आये जिसमें पीछे की गलतियों को दोहराने की गुंजाईश न हो और वह उनकी इच्छा वैकल्पिक पत्रकारिता को भी पूरा करता हो.

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2 Responses for “ब्लागवाणीः आदि, अंत, अनंत…”

  1. Lovely says:

    धन्यवाद टीम ब्लोग्वानी ..आपने हजारों प्रशंसकों के निवेदन का मान रखा . मुझे खुसी है की ब्लोग्वानी वापस आ गई ..बाकि विवादों का निपटारा होता रहेगा.

  2. Peter says:

    I read a few topics. I respect your work and added blog to favorites.

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