ब्लाग मीट शब्द को लेकर हिन्दी ब्लागरों ने अक्सर विरोध किया था. आपस की मुलाकात को ब्लाग मीट में तब्दील करनेवाले अनूप शुक्ला ने वास्तव में ब्लागरों को एक दूसरे से मिलने मिलाने का सिलसिला शुरू किया था. वह थोड़ा आगे बढ़ा और भरभराकर गिर गया. लेकिन जो लोग इलाहाबाद में मौजूद हैं वे देख रहे हैं ब्लागर नये सिरे से मिलने जुलने का सिलसिला शुरू कर रहे हैं. यह नया सिलसिला थोड़ा तार्किक और बहुत सारा आयोजित और प्रायोजित है.
देश के कुछ चुनिंदा ब्लागर जिन्हें बुलाया गया या फिर जो अपने से कोशिश करके इस सम्मेलन में आये हैं वे मुक्त होकर बोल रहे हैं. पहले दिन उद्घाटन के बाद जो चर्चा सत्र शुरू हुआ. सत्र की शुरूआत लड़ने झगड़ने से हुई. ऐसी ऐसी बातों पर अड़े और लड़े कि औचित्य भी समझ में नहीं आया. लेकिन थोड़ी ही देर में बात मुद्दे पर होने लगी और सिलसिला चल पड़ा. पहले दिन का थीम यही रहा कि अभिव्यक्ति का नया माध्यम ब्लाग क्या अभिव्यक्ति का माध्यम बन रहा है. क्या यहां स्तरीय बहस हो रही है? क्या मुद्दे सही तरीके से उठाये जा रहे हैं.
देर शाम तक बातचीत होती रही. ब्लागरों के अलावा कुछ स्थानीय लोग भी इस बैठक में शामिल हुए जो भकुआ बने सिर्फ देख सुन रहे थे. व्यवस्था अच्छी है. सबके रुकने की और आने जाने की बेहतर व्यवस्था है. ऐसा लग रहा है कि ब्लागर न हुए कोई अति विशिष्ट प्राणी हो गये और उनकी हर सुख सुविधा का ध्यान रखा जा रहा है. यह सब देखकर अच्छा लग रहा है और नयी जमात के उभरने का भी साफ संकेत दिखाई दे रहा है.
दूसरे दिन ब्लागरों में कुछ लोग बैठने से कतराए हुए हैं और यहां वहां घूम रहे हैं. मसलन दूसरे दिन अविनाश का पता नहीं है. कुछ ब्लागर सम्मेलन के बहाने पूरे इलाहाबाद को नापने का मौका भी नहीं छोड़ना चाहते. अरे हां, बोधिसत्व तो एक ही दिन भाग लेकर भाग लिए. जो बचे हैं वे बहस में उलझे हैं. नामवर सिंह का विवाद थमता नजर नहीं आ रहा है. सम्मेलन जारी है.
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देश के कुछ चुनिंदा ब्लागर जिन्हें बुलाया गया या
चुनिंदा ki paribhasha kyaaa thee ???
अब यह तो आयोजकों को पूछना होगा. लेकिन हमें लगता है कि इसके लिए कोई मानक तय किया गया था ऐसा नहीं है. मैं भी संयोग से ही आया हूं.
sanjay
aap ki post mae haen yae vaaky so define bhi aap ko karna hogaa !!!!!!!
aayojak kae paas to apna nazariya haen / hoga hi par aap kisae kisae चुनिंदा ब्लागर maantey haen !!!!!!!!
ब्लागर क्या कोई मंगल ग्रह से उतरे प्राणी है जो नही लड़ेँगे.
है तो वो यही के इंसान.
@Rachna– Question is very valid especially when the organisers are thriving on grant money !
यह सम्मेलन हिन्दी ब्लाग जगत के लिए नए आयाम खोलेगा।
aayam haaa haa pehlae jaraaa jo vaktaa they unkae blog hi banva deatey
एक ब्लाग बना दिया गया है. बच्चा नामक एक व्यक्ति ने मीडिया पर एक ब्लाग बनाया है जो कि हिन्दी में मास कम्युनिकेश के छात्र हैं. यह चिट्ठाकार की दुनिया की एक बड़ी उपलब्धि है.
मीट काहे कि संसाधनों का दुरूपयोग
manish
not only that they are publishing books also from grant
अच्छी व्यवस्था की बात जानकर बहुत अच्छा लगा. जब रचनाशील व्यक्तित्व मिल बैठेंगे तो मतभेद भी तो होगा ही.
@ रचना
चुनिंदा मतलब चूंटी मार मार कर जिन्हें चुना गया
या चुनने के बाद चूंटी मारी गई
या जब वे आपस में लड़ झगड़ लेंगे
तब मारी जाएगी चूंटी
वे सभी जो खूंटी से बंधे न हों
पर चूंटी से तो बंध ही गए हैं।
waah
संजय भाई बुरा मत मानियेगा, इलाहाबादी होने के नाते पहुँच गया था वैसे निमत्रंण तो मुझे भी नही मिला था औन नही प्रारूप की जानकारी थी।
और न ही कोई ऐसी इज्जत जिसे खोन का डर, बस आप लोगो की चाहत थी कि मिलने पहुँच गया।
आपका कहना सही हो सकता है कि देश भर के चुनिन्दा ब्लागर ही बुलाये गये थे, बिना बुलाये पहुँचने पर तकलीफ हुई हो तो क्षमा कीजिएगा।
ये धुआं कहां से उठता है?
ये किस के जलने की बू आ रही है?:)
मैंने यह कहा है कि चुनिंदा ब्लागरों को बुलाया गया था. लेकिन इसके साथ मेरा यह भी कहना है कि जो संपर्क में आये उन्हें निमंत्रण दे दिया गया.
मुझे लगता है कि इसमें किसी को बुरा नहीं मानना चाहिए. लोगों से तकलीफ की माफी मांग रहे प्रमेन्द्र के शहर में आयोजन था लेकिन वे खुद ही थोड़ी देर के लिए आये. उन्हें ऐसा बिल्कुल नहीं कहना चाहिए कि वे बिना बुलाये आये और किसी को तकलीफ हुई होगी.
मैंने तो उनसे कहा भी कि आपको अगले दिन भी आना चाहिए लेकिन वे घर के किसी काम में व्यस्त थे इसलिए शायद अगले दिन नहीं आ पाये.
सन्ज्य जि जितना मैने देखा सुना वहा ब्लोगिन्ग कि ब्ला ब्ला कम थी और देश दुनिया कि ब्ला ब्ला ज्यादा
-वीनस केशरी
इसमें थोड़ी तो सच्चाई है. लेकिन मुख्यरूप से जो सक्रिय थे वे सब ब्लागर ही थे.
मेरा कार्यक्रम से किसी प्रकार का रोष नही था, यह सही है किसी कार्यक्रम मुझे आने के लिये किसी ने नही कहा, अपने घर कार्यक्रम से ठीक 15 मिनट पहले दो मित्रो ने फोन कर आने के लिये कहा तो घर के कार्यक्रम का हवाला देकर शाम को आने की बात कहीं और दोनो दिनो में शाम को कार्यक्रम में पहुंचा था।
मैने तकलीफ शब्द का उल्लेख इसलिये किया था क्योकि मुझे प्रथम दिन के रात्रि में पता चला कि ब्लागरों का आने जाने का व्यय भी दिया गया, आर्थात जो भी बुलाये गये थे सेलेक्टिव थे, अगर मुझे किसी ने नही कहा तो बिन बुलाये ही पहुँचा था।
अंत भला तो सब भला
फिर वही बात बिना बुलाए की बात क्यों करते हो भाई? आप आये तो वह सबको अच्छा लगा था. अगले दिन आते तो और भी अच्छा लगता.
आदत किसी की नहीं जाती है
पप्पू की इस कथा को पढि़ए
और खुद ही समझिए
http://words.sushilkumar.net/2009/10/blog-post_24.html
ये जो लड़ने की आदत आम हो गई,
तौबा-तौबा ब्लॉगिंग बदनाम हो गई…
जय हिंद…
जिन्हें मौका नहीं मिलता नहीं मिलता घर में मुँह खोलने का भी…
वो अक्सर बाहर.. अपना गला साफ किया करते हैँ
यह बात बहुत अच्छी है राजीव जी.
aapka mobail band mil raha hay