आजादी के आंदोलन में लोकमान्य तिलक ने नारा दिया था कि स्वराज हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है. और हम इसे लेकर रहेंगे. आजादी के बाद इस नारे में स्वराज शब्द को दायें बाये करके अनेक नारे बना दिये गये जो देश में राजनीतिक आंदोलनों और सामाजिक कार्यकर्ताओं के लिए प्रेरणा का काम करते रहे लेकिन अब नया नारा जन्म ले चुका है. यह नया नारा है- इंटरनेट हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है और हम इसे लेकर रहेंगे. निश्चित रूप से यह नारा किसी देश की आजादी की लड़ाई का हिस्सा नहीं है लेकिन ऐसा लगता है कि सूचना प्रौद्योगिकी के सहारे ज्ञान की आजादी की एक मुहिम जो पूरी दुनिया में चल निकली है इसने इस नारे को वैश्विक स्तर पर प्रभावी बना दिया है.
बीबीसी वर्ल्ड सर्विस के लिए कराए गये एक सर्वेक्षण में जो नतीजा सामने आया है कि उसमें सर्वेक्षण में शामिल 27 हजार लोगों में 87 प्रतिशत लोगों का मानना है कि इंटरनेट तक हर इंसान की पहुंच होनी चाहिए और इसे इंसान के मूलभूत अधिकारों में शामिल किया जाना चाहिए. खाना, पानी, आवास, कपड़ा, बिजली, दवाई के साथ ही इंटरनेट को मूलभूत आवश्यकता का हिस्सा बना देना चाहिए. सर्वेक्षण में शामिल लोग सही कह रहे हैं. लेकिन मुश्किल यह है कि दुनिया में इंटरनेट तक पहुंच कितने लोगों की है? विश्व की कुल आबादी का पांचवा हिस्सा ही अभी इंटरनेट के आस पास आ पाया है. तो फिर इसे मूलभूत अधिकार कैसे बना दिया जाए? सर्वेक्षण में शामिल लोगों का तर्क है कि फिर उन तक इंटरनेट की पहुंच आसान की जाए.
बिल्कुल सही है. इंटरनेट इस युग में सबसे प्रभावी माध्यम बनकर स्थापित होगा. तकनीकि के कन्वर्जेन्स की महिमा से अभी इसमें और बदलाव होंगे और स्पीड ने कमाल किया तो वीडियो भी पूरी तरह से इंटरनेट का गुलाम हो जाएगा. इसलिए नये युग का यह नारा कि इंटरनेट हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है कहीं से गलत नहीं है. हो सकता है कि इसके लिए कोई धरना प्रदर्शन और आंदोलन न हो लेकिन ध्रुवीकरण तो तेज होगा ही. समय बताएगा कि यह जन्मसिद्ध अधिकार धोखा देता है या फिर साथ निभाता है लेकिन साथ में एक सूचना और ले लीजिए. जितनी तेजी से इंटरनेट लोकप्रिय हो रहा है इंटरनेट हैकर और अपराधी भी सक्रिय हो रहे हैं. यानी यह जन्मसिद्ध अधिकार निष्कंटक नहीं होगा. देव दानव का संघर्ष यहां भी जारी रहेगा. तो आप बताईये, आप जन्मसिद्ध अधिकार का नारा कब लगा रहे हैं?
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