
खबर देने का व्यावसायिक कार्य अब विधिवत उद्योग की शक्ल अख्तियार कर चुका है. पिछले साल प्राइस वाटरहाउस कूपर्स की रिपोर्ट में कहा गया था कि मीडिया उद्योग 2012 तक एक लाख करोड़ की इंडस्ट्री हो जाएगा. इस उद्योग में फिल्म से लेकर समाचार परोसने तक सबकुछ शामिल होगा. अब यह कहना मुश्किल है कि [...]
July 20, 2009 | Posted in
कारपोरेट मीडिया |
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मेरे मन में यह सवाल बार-बार आता है कि पत्रकार बातूनी क्यों होते हैं? क्या पत्रकारों को इतनी बात करनी चाहिए जितनी आजकल के तथाकथित पत्रकार करते है?
जबसे विस्फोट.कॉम शुरू किया है, इसी एक बात ने मुझे सबसे ज्यादा परेशान किया है. मेरे संपर्क में जितने भी लोग आते हैं वे विस्फोट की सामग्री की [...]
February 10, 2009 | Posted in
कारपोरेट मीडिया |
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मिनट दर मिनट गोलियों की आवाज से केवल मुंबई के होटल ही नहीं बल्कि पूरा देश (शायद दुिनया भी) सुन रही है. यह बात सही है कि पूरा देश इस समय वहां अटका हुआ है जहां देश के जवान आतंकियों से लोहा ले रहे हैं. लेकिन इलेक्ट्रानिक मीडिया जिस तरह से घटनाओं की लाईव रिपोर्टिंग [...]
November 28, 2008 | Posted in
कारपोरेट मीडिया |
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फेशबुक सोशल नेटवर्किंग की दुनिया में वैसे ही चमकता हुआ नाम है जैसे सर्च इंजनों की दुनिया में गूगल या फिर ब्लागरों के लिए वर्डप्रेस. फेशबुक के बारे में इतनी चर्चा सुनी थी कि मन हुआ एक बार देखें तो सही आखिर यह फेशबुक है क्या बला? देखने और जुड़ने के बाद कुछ खास नयापन [...]
October 14, 2008 | Posted in
कारपोरेट मीडिया |
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निजी डायरी लेखन से अलग हटकर ब्लाग सार्वजनिक हित का माध्यम बने यह हिन्दी ब्लागिंग की सबसे बड़ी जरूरत है और काम भी. इसके सामाजिक और आर्थिक कारण हैं. आज भारत में अधकचरे भूमंडलीकरण का दौर है. कंपनियां अपना प्रभुत्व स्थापित कर रही हैं और लोगों को बताया जा रहा है कि विकास जैसा कोई [...]
June 19, 2008 | Posted in
कारपोरेट मीडिया |
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