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	<title>visfot.blog &#187; कारपोरेट मीडिया</title>
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		<title>मीडिया जगत में विस्फोट</title>
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		<pubDate>Mon, 20 Jul 2009 17:18:30 +0000</pubDate>
		<dc:creator>संजय तिवारी</dc:creator>
				<category><![CDATA[कारपोरेट मीडिया]]></category>

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		<description><![CDATA[खबर देने का व्यावसायिक कार्य अब विधिवत उद्योग की शक्ल अख्तियार कर चुका है.  पिछले साल प्राइस वाटरहाउस कूपर्स की रिपोर्ट में कहा गया था कि मीडिया उद्योग 2012 तक एक लाख करोड़ की इंडस्ट्री हो जाएगा. इस उद्योग में फिल्म से लेकर समाचार परोसने तक सबकुछ शामिल होगा. अब यह कहना मुश्किल है कि [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p>खबर देने का व्यावसायिक कार्य अब विधिवत उद्योग की शक्ल अख्तियार कर चुका है.  पिछले साल प्राइस वाटरहाउस कूपर्स की रिपोर्ट में कहा गया था कि मीडिया उद्योग 2012 तक एक लाख करोड़ की इंडस्ट्री हो जाएगा. इस उद्योग में फिल्म से लेकर समाचार परोसने तक सबकुछ शामिल होगा. अब यह कहना मुश्किल है कि इस उद्योग में पत्रकारिता और आम आदमी की आवाज कहां होगी. अगर पत्रकारिता करने और आम आदमी की आवाज उठाने से बिजनेस जनरेट होता है तो निश्चित रूप से आम आदमी और पत्रकारिता दोनों के संबंध भी इस उद्योग से जुड़े रहेंगे. अगर ऐसा नहीं है तो तय है कारपोरेट मीडिया इन दो शब्दों को सबसे पहले तिलांजलि देगा.</p>
<p>अगले कुछ सालों में मीडिया का स्वरूप पूरी तरह से बदलना तय है. देश के महानगर और छोटे नगरों में पत्रकारिता ऐसी करवट लेगी जैसी हम आज कल्पना भी नहीं कर सकते. दलाल पत्रकार और भ्रष्टाचार आदि की बातें व्यावसायिक कार्य मानकर सर्व स्वीकार्य कर लिये जाएंगे. ठीक वैसे ही जैसे भारत में शादी करानेवाले अगर दो पैसा ले लें तो उनकी बड़ी सामाजिक बदनामी होती है लेकिन शादी.कॉम बाकायदा फीस लेकर ही जोड़ों को मिलवाये तो बिजनेस हो जाता है. इसी तरह आज का पत्रकारीय भ्रष्टाचार कल का व्यावसायिक कार्य समझा जाएगा लेकिन दिक्कत यह होगी कि ऐसे लोग ही नहीं बचेंगे जो यह समझ सकें कि पुराने दौर में इस काम को भ्रष्टाचार कहा जाता था.</p>
<p>इसलिए अगर सूचना देने और मनोरंजन करने का काम एक लाख करोड़ का व्यापार होगा तो निश्चित तौर पर वह भी बाजार का एक ऐसा हथियार होगा जिसका वैचारिक और व्यावसायिक आधार पश्चिम से आयी विचारधारा में निहित होगा. शादी.कॉम अपने भारत की अवधारणा नहीं है. लेकिन दिक्कत यह है कि अब हमें लगता ही नहीं है कि इसका विरोध करना चाहिए. ठीक वैसे ही भविष्य की व्यावसायिक पत्रकारिता का भी हम शायद विरोध नहीं करेंगे. फिर क्या होगा? अब एक लाख करोड़ के उद्योग के समानांतर उद्योग तो खड़ा नहीं किया जा सकता ताकि उन्हें वह चुनौती दी जा सके. जो किया जा सकता है वह यह कि उनके काम काज पर लगातार वाचडॉग की तरह नजर रखें. मीडिया का नाम लेकर जो लेकर इस माध्यम का व्यावसायिक इस्तेमाल कर रहे हैं उन पर सवाल उठाना कोई अनैतिक काम नहीं होगा. यह काम इंटरनेट के जरिए होगा तो ज्यादा प्रभावी होगा.</p>
<p>शायद लोगों को नहीं मालूम है कि इस बार आमचुनाव में मीडिया घरानों द्वारा पैसा लिए जाने का मुद्दा उठा तो सिर्फ नयी मीडिया के कारण. हिन्दी में मीडिया वेबसाईटों और ब्लागरों ने देश के बड़े मीडिया घरानों को झुकने के लिए मजबूर कर दिया और अब देश के चुनाव आयुक्त की मान रहे हैं कि आमचुनाव के दौरान मीडिया ने पैसे लेकर खबरें छापी. यह पहली बड़ी घटना है जब नये मीडिया माध्यम की उपयोगिता इस व्यापक स्तर पर साबित हुई है. आनेवाले दिनों में मीडिया साईट, ब्लाग और फोरम तीनों ही प्रकार मीडिया पर नजर रखने का काम करेंगे. इसे नियति ही कहेंगे कि एक ओर जब मुख्यधारा का मीडिया व्यापारी होने चला तो जनता के हाथ में एक ऐसा हथियार आ गया कि वह सीधे तौर पर उसके काम काज की समीक्षा कर सकता है और अगर वे बहकने लगे तो कम से कम उनको बता सकता है कि उनके कदम डगमगा रहे है.</p>
<p><a href="http://visfot.com/media" target="_self">मीडियाविस्फोट.कॉम </a>भी इसी समझ से सामने आया है. अभी पक्के तौर पर नहीं कह सकते कि हम क्या करेंगे और क्या नहीं करेंगे. क्योंकि यह तो समय बताएगा कि हम कितना और क्या कर पाते हैं लेकिन इतना जरूर है कि मीडिया जनपक्षीय बना रहे इसके लिए हम जरूर हस्तक्षेप करने की कोशिश करेंगे.</p>

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		<title>पत्रकार बातूनी क्यों होते हैं?</title>
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		<pubDate>Tue, 10 Feb 2009 15:54:59 +0000</pubDate>
		<dc:creator>संजय तिवारी</dc:creator>
				<category><![CDATA[कारपोरेट मीडिया]]></category>

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		<description><![CDATA[मेरे मन में यह सवाल बार-बार आता है कि पत्रकार बातूनी क्यों होते हैं? क्या पत्रकारों को इतनी बात करनी चाहिए जितनी आजकल के तथाकथित पत्रकार करते है?
जबसे विस्फोट.कॉम शुरू किया है, इसी एक बात ने मुझे सबसे ज्यादा परेशान किया है. मेरे संपर्क में जितने भी लोग आते हैं वे विस्फोट की सामग्री की [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p>मेरे मन में यह सवाल बार-बार आता है कि पत्रकार बातूनी क्यों होते हैं? क्या पत्रकारों को इतनी बात करनी चाहिए जितनी आजकल के तथाकथित पत्रकार करते है?</p>
<p>जबसे विस्फोट.कॉम शुरू किया है, इसी एक बात ने मुझे सबसे ज्यादा परेशान किया है. मेरे संपर्क में जितने भी लोग आते हैं वे विस्फोट की सामग्री की तारीफ करते हैं. वे मानते हैं कि लेखन तो ऐसा ही तथ्यपरक होना चाहिए. सवाल तो ऐसे ही उठाये जाने चाहिए. वेब अच्छा माध्यम है, इसका ऐसा ही उपयोग किया जाना चाहिए. उसके बाद जैसे ही मैं कहता हूं कि आप भी कुछ लिखिए तो दो तरह की प्रतिक्रिया आती है.</p>
<p>या तो वे वादा करते हैं और एक बार जान छूट गयी तो दोबारा संपर्क नहीं करते. ऐसा क्यों होता है इसे कोई भी आसानी से समझ सकता है. लेकिन एक और बात भी होती है. लोग फोन करके सलाह देते हैं कि तुम्हें ऐसे करना चाहिए. मैं कहता हूं कि भाई कैसे पत्रकार हो जो स्टोरी आईडिया बांट रहे हो. अरे, तुम्हारे मन में कोई स्टोरी आईडिया आया है तो उसे तुम्हें खुद लिखना चाहिए या फिर चर्चा करके इतिश्री कर लेना चाहते हो.</p>
<p>आमतौर पर लोग लिखते नहीं. चौराहेबाजी करते हैं. हो सकता है यह इस देश के स्वभाव के अनुकूल हो लेकिन इस युग में कुछ लोगों को तो यह स्वभाव छोड़ना पड़ेगा. आप देश में किसी भी पत्रकार संगठन, समूह या ऐसे किसी स्थान पर चले जाईये जहां पत्रकारों का जमावड़ा होता हो वहां लोग आपको बात करते हुए मिल जाएंगे. बहुत बात करते हैं. लंबी चौड़ी बातें करते हैं. अपने यहां आईएनएस बिल्डिंग तो बचकचरा का अड्डा ही है. मेरे मन में बार-बार यह सवाल आता है कि जो बात करते हैं वो काम कैसे कर सकते है?</p>
<p>क्योंकि बात करनेवाला काम नहीं कर सकता. यह प्रकृति के नियम के विरूद्ध हो जाएगा. हम अपने आस पास जो घटनाएं देखते हैं उस पर प्रतिक्रिया करते हैं. यह बहुत स्वाभाविक है. चाय की दुकान पर बैठा व्यक्ति भी प्रतिक्रिया करता है और खोखली पार्टिंयों में मंहगी गाड़ियों में आनेवाला भी बात करता है. ये लोग तो पत्रकार नहीं हो सकते. क्योंकि उनके मन में जो प्रतिक्रिया हुई वह उन्होंने बात करके बाहर निकाल दी. अब पत्रकार तो वह है जो रिपोर्ट करता हो. खालिस रियेक्शन से भी बात नहीं बनेगी. उसे तो घटना को समझने की कोशिश करनी होगी और जो भी केन्द्रीय भाव उसे समझ में आता है उसे पकड़कर रिपोर्ट करना होगा.</p>
<p>मेरा मानना है कि बातूनी पत्रकार किसी काम के नहीं होते. वे सिर्फ बात कर सकते हैं पत्रकारिता नहीं कर सकते. लेकिन कोई सुने भी तो तब जब बात करने से फुर्सत मिले.</p>

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		<title>नाजायज लाईव कवरेज बंद होना चाहिए</title>
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		<pubDate>Fri, 28 Nov 2008 15:14:34 +0000</pubDate>
		<dc:creator>संजय तिवारी</dc:creator>
				<category><![CDATA[कारपोरेट मीडिया]]></category>

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		<description><![CDATA[मिनट दर मिनट गोलियों की आवाज से केवल मुंबई के होटल ही नहीं बल्कि पूरा देश (शायद दुिनया भी) सुन रही है. यह बात सही है कि पूरा देश इस समय वहां अटका हुआ है जहां देश के जवान आतंकियों से लोहा ले रहे हैं. लेकिन इलेक्ट्रानिक मीडिया जिस तरह से घटनाओं की लाईव रिपोर्टिंग [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p>मिनट दर मिनट गोलियों की आवाज से केवल मुंबई के होटल ही नहीं बल्कि पूरा देश (शायद दुिनया भी) सुन रही है. यह बात सही है कि पूरा देश इस समय वहां अटका हुआ है जहां देश के जवान आतंकियों से लोहा ले रहे हैं. लेकिन इलेक्ट्रानिक मीडिया जिस तरह से घटनाओं की लाईव रिपोर्टिंग कर रही है क्या वह जायज है? कल शाम को गृहमंत्रालय की बैठक में सबसे बड़ी चिंता यही थी कि मीडिया ने जिस तरह से रिपोर्टिंग की उससे आतंकियों को मदद मिली है. हो सकता है सरकार जल्द ही मीिडया को ऐसे मुटभेड़ों के दौरान घटनास्थल से दूर रखने के प्रावधान करेगी.</p>
<p>कुछ भी हो, है तो यह गलत. आतंकवादियों से लोहा लेते एनएसजी के कमाण्डों कोई प्रहसन नहीं कर रहे हैं जिसे मनोरंजन के तौर पर इस्तेमाल किया जाए. बात तब और शर्मनाक हो जाती है जब हिन्दी के दो-दो कौड़ी के रिपोर्टर कहते हैं कि &#8220;हम सच्ची पत्रकारिता कर रहे हैं और आप तक पल-पल की जानकारी लेकर आ रहे हैं.- इंडिया न्यूज, २८ नवंबर शाम ६.३० बजे.&#8221; </p>
<p>मेरा मानना है कि ऐसे नाजुक मौकों पर इलेक्ट्रानिक मीडिया को दूर-दूर तक फटकने नहीं देना चाहिए. क्योंकि कुछ भी हो जाए टीवी का पत्रकार अपनी बाईट की लालच नहीं छोड़ पाता भले ही इसके लिए कोई भी नुकसान हो जाए. क्योंकि उसका सारा धंधा बाईट कवरेज पर ही टिका हुआ है. ऐसी बहुत सी सूचनाएं और जानकारियां लीक हो जाती हैं जो किसी भी कीमत पर लीक नहीं होनी चाहिए. मसलन कल जी न्यूज से बात करते हए एक बंधक संजय दत्ता ने बताया ताज में सुरक्षाबलों ने उसे कैसे बचाया. उसने सिलसिलेवार सारी बातें बताई.जी न्यूज के संवाददाता ने तफ्शीस से उससे सारी बातें पूछी. यहां तक कि उसे किस रास्ते बाहर लाया गया, सुरक्षाबल आने-जाने के लिए कौन से रास्ते का इस्तेमाल कर रहे हैं और कमरों लिफ्ट का इस्तेमाल कर रहे हैं या नहीं. (रात के कोई १२ बजे की बातचीत है) तब तक जी न्यूज का संवाददाता और एंकर मान चुका था कि शायद ताज मुक्त हो चुका है. लेकिन आज पूरा दिन ताज में लड़ाई चल रही है और अभी भी पता नहीं कितने आतंकवादी बचे हुए हैं.</p>
<p>क्या ऐसी सूचनाओं का इस्तेमाल आतंकियों ने नहीं किया होगा?</p>

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		<title>गूगल गणराज्य का मालिकाना हक</title>
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		<pubDate>Tue, 14 Oct 2008 12:00:42 +0000</pubDate>
		<dc:creator>संजय तिवारी</dc:creator>
				<category><![CDATA[कारपोरेट मीडिया]]></category>

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		<description><![CDATA[
फेशबुक सोशल नेटवर्किंग की दुनिया में वैसे ही चमकता हुआ नाम है जैसे सर्च इंजनों की दुनिया में गूगल या फिर ब्लागरों के लिए वर्डप्रेस. फेशबुक के बारे में इतनी चर्चा सुनी थी कि मन हुआ एक बार देखें तो सही आखिर यह फेशबुक है क्या बला? देखने और जुड़ने के बाद कुछ खास नयापन [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<div>
<p>फेशबुक सोशल नेटवर्किंग की दुनिया में वैसे ही चमकता हुआ नाम है जैसे सर्च इंजनों की दुनिया में गूगल या फिर ब्लागरों के लिए वर्डप्रेस. फेशबुक के बारे में इतनी चर्चा सुनी थी कि मन हुआ एक बार देखें तो सही आखिर यह फेशबुक है क्या बला? देखने और जुड़ने के बाद कुछ खास नयापन नजर नहीं आया. वहीं चालाकियां फेशबुक के साथ भी हैं जो दूसरी साईटों के साथ है. आपके पास जो कुछ है वह आप इंटरनेट पर डाल दीजिए. जगह हम मुहैया करायेंगे. आप सिर्फ अपने आप को अभिव्यक्त करिए आदि.</p>
<p>क्या कभी आपने सोचा है कि ये साईटें हमें अभिव्यक्ति के लिए इतना प्रेरित क्यों करती हैं? माले मुफ्त खिलाकर आखिर उन्हें क्या हासिल होता है? एक प्रयोग करिए. गूगल इमेज सर्च में जब भी कोई फोटो आप सर्च करते हैं तो वह उसका मूल स्रोत दिखाता है. मूल स्रोत का आशय कि इस फोटो का मालिकाना हक किसके पास है. यह कानूनन जरूरी है. अगर हम सर्च से कोई फोटो खोजकर अपनी साईट पर चिपका लेते हैं फिर भी उसका मालिकाना हक और मूल स्रोत गूगल की नजर में उसी वेबसाईट का होता है जहां से हमने वह फोटो कापी की है. (किसी हैकर ने इसका तोड़ निकाल लिया हो तो मुझे मालूम नहीं.)</p>
<p>ऐसे ही एक दिन मैंने एक ब्लागस्पाट के ब्लाग से एक फोटो कापी की. कापी करने के दौरान मैंने यूआरएल एड्रेस की ओर देखा तो वहां फोटो का मूल स्रोत ब्लागर दिखा रहा था न कि ब्लागस्पाट का वह ब्लाग. आप कहेंगे इसमें ऐसा खास क्या है? खास यह है कि आप जिस सर्वर पर अपनी सामग्री लोड कर रहे हैं वह ब्लागर के नाम दर्ज है. यानी आप ब्लागस्पाट पर जो भी सामग्री देते हैं उसका मालिकाना हक ब्लागर कंपनी के पास चला जाता है. यह बात सही है कि गूगल शायद ही कभी ऐसा दावा करे लेकिन अगर आपकी सामग्री कोई अन्य व्यक्ति लेता है तो कानूनन आप ब्लागर की ओर से ही दावा कर सकते हैं न कि सीधे तौर पर. ज्यादा विस्तार से समझना हो ब्लागर की सेवा शर्तों को पढ़ लें.</p>
<p>यही हाल सभी दूसरी पब्लिक साईटों का है. डाटकाम पराभव से बूम पर जिस एक क्रांतिकारी विचार से आ पहुंचा उसके मूल में यही सोच थी कि लोगों को अपने साथ शामिल करो. आज जितनी भी सफल डाटकाम कंपनियां हैं वे सब यही कर रही हैं. जो काम वे कर्मचारी रखकर करवातीं वह काम लोग अपने खर्चे से पूरा कर रहे हैं. आप कल्पना करिए कि फेशबुक पर एक अरब लोगों का प्रोफाईल मौजूद हो या फिर गूगल दुनिया की आधी आबादी को सेवाएं मुहैया कराता हो या फिर उनको मुफ्त में अभिव्यक्ति का मौका देता हो तो वे क्या वास्तविक गणराज्य नहीं बसा रहे हैं? </p></div>

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		<title>हिन्दी ब्लाग बनें वैकल्पिक मीडिया</title>
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		<pubDate>Thu, 19 Jun 2008 10:24:00 +0000</pubDate>
		<dc:creator>संजय तिवारी</dc:creator>
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		<category><![CDATA[खबरदार]]></category>

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		<description><![CDATA[निजी डायरी लेखन से अलग हटकर ब्लाग सार्वजनिक हित का माध्यम बने यह हिन्दी ब्लागिंग की सबसे बड़ी जरूरत है और काम भी. इसके सामाजिक और आर्थिक कारण हैं. आज भारत में अधकचरे भूमंडलीकरण का दौर है. कंपनियां अपना प्रभुत्व स्थापित कर रही हैं और लोगों को बताया जा रहा है कि विकास जैसा कोई [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p>निजी डायरी लेखन से अलग हटकर ब्लाग सार्वजनिक हित का माध्यम बने यह हिन्दी ब्लागिंग की सबसे बड़ी जरूरत है और काम भी. इसके सामाजिक और आर्थिक कारण हैं. आज भारत में अधकचरे भूमंडलीकरण का दौर है. कंपनियां अपना प्रभुत्व स्थापित कर रही हैं और लोगों को बताया जा रहा है कि विकास जैसा कोई काम हो रहा है. ऐसे में जनसंचार माध्यम  पूरी तरह से कंपनियों के प्रभाव में काम कर रहे हैं. ऐसा करना उनकी मजबूरी है. अब समाज की बात, मूल समस्याओं की बात चाहते हुए भी मीडिया घराने नहीं उठाते हैं. ऐसे में ब्लागिंग एक सशक्त माध्यम बन सकता है.    भारत कोई अमेरिका और यूरोप नहीं है जहां भरे-पेट लोगों को अभिव्यक्ति का साधन चाहिए. यहां लोगों की आवाज उठाने का माध्यम चाहिए जो लगभग मुफ्त हो और जिसकी पहुंच सार्वदेशिक हो. अपनी भाषा में हो तो क्या कहने. यहां विज्ञापनों की वैसी बंदिशें भी नहीं हैं कि आपके लिखने पर तय हो कि आपको विज्ञापन मिलेगा या नहीं. इसलिए  हिन्दी ब्लागिंग का स्वरूप थोड़ा भिन्न होगा. कोई ब्लागिंग को इस नजरिये से देखता है तो खुशी होती है.</p>
<p>मैं खुद ब्लाग को वैकल्पिक मीडिया के रूप में देख रहा हूं और इसी दिशा में काम करने के लिए अपने दूसरे कई सारे कार्यों से निजात पा ली है. भूमंडलीकरण के इस दौर में जब टीवी और अखबार भी सच कहने से कतराते हैं तो ब्लाग्स एक शसक्त माध्यम बनकर उभर सकते हैं. हिन्दीवाले अपनी कहानी कविता के चक्कर में पीछे रह गये तो एक उभरते माध्यम के साथ न्याय नहीं होगा. क्योंकि अगला नया माध्यम कब अस्तित्व में आयेगा नहीं कह सकते.    15 अगस्त के मौके  पर जार्ज पंचम और रवीन्द्र नाथ टैगोर के राष्ट्रगान लेखन पर जो बहस चली थी वह अपने-आप में दस्तावेजों का संकलन बन गयी. इसी तरह परमाणु समझौते पर भी ब्लागरों द्वारा की गयी बहस का परिणाम है कि आपको इंटरनेट पर इस विषय पर पर्याप्त सामग्री मिल जाएगी. ऐसे और अवसरों को पैदा करने की जरूरत है जब हिन्दी ब्लागिंग साहित्य की राजनीति और निजी अभिव्यक्ति से थोड़ा आगे निकलकर सार्वजनिक हित के मुद्दों को अपना विषय बनाएं.</p>

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		<title>मीडिया ने भी भाषाघात किया है</title>
		<link>http://visfot.com/blog/archives/269</link>
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		<pubDate>Wed, 23 Apr 2008 23:54:00 +0000</pubDate>
		<dc:creator>संजय तिवारी</dc:creator>
				<category><![CDATA[कारपोरेट मीडिया]]></category>
		<category><![CDATA[ब्लाग-विचार]]></category>
		<category><![CDATA[हिन्दी भाषा]]></category>

		<guid isPermaLink="false">http://visfot.wordpress.com/2008/04/24/%e0%a4%ae%e0%a5%80%e0%a4%a1%e0%a4%bf%e0%a4%af%e0%a4%be-%e0%a4%a8%e0%a5%87-%e0%a4%ad%e0%a5%80-%e0%a4%ad%e0%a4%be%e0%a4%b7%e0%a4%be%e0%a4%98%e0%a4%be%e0%a4%a4-%e0%a4%95%e0%a4%bf%e0%a4%af%e0%a4%be/</guid>
		<description><![CDATA[किसी भाषा से आप क्या उम्मीद करते हैं? यह कि वह आपको कवि बना दे या फिर चूतिया? हिन्दी इन्हीं दो विधाओं की भाषा बनकर रह गयी है. प्रकाशनों के बड़े तबके ने कवि पैदा किये. कवियों की राजनीति पैदा की और साहित्य की कोंपले फोड़ते रहे. कोंपले फूटी न फूटी लोगों के सिर जरूर [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p>किसी भाषा से आप क्या उम्मीद करते हैं? यह कि वह आपको कवि बना दे या फिर चूतिया? हिन्दी इन्हीं दो विधाओं की भाषा बनकर रह गयी है. प्रकाशनों के बड़े तबके ने कवि पैदा किये. कवियों की राजनीति पैदा की और साहित्य की कोंपले फोड़ते रहे. कोंपले फूटी न फूटी लोगों के सिर जरूर फूटने लगे. फिर पुरस्कार की राजनीति घुस गयी तो अच्छे साहित्यकार दवा-दारू के भी मोहताज हो गये. साहित्यकार जी के चंपुओं की एक फौज बन गयी क्योंकि बिना साहित्यकार जी की मेहरबानी से प्रकाशक भाव नहीं देता और प्रकाशक हिन्दी सेवा करने लगा क्योंकि इस सेवा के मेवा में उसका दफ्तर चलता है.</p>
<p>प्रकाशकों और दोयम दर्जे के साहित्यकारों के घटिया संबंधों ने भाषा को स्थाई घात मारा है. नब्बे के दशक में भारत तेजी से बदला. एक तो भूमंडलीकरण का प्रभाव ऊपर से तकनीकि की धमक. इन बदलावों ने भाषा की ओर निहारा तो पता चला कि वहां तो पिछले तीस-चालीस साल से कोंपले ही फूट रही हैं. कुछ है ही नहीं. आधार क्या बनाएं? विरोध की बात ही छोड़िये समर्थन का क्या आधार बनाएं? प्रकाशक महोदय भी बदलाव महसूस किये तो सामग्री कहां से लायें? यहां तो कोंपले ही फोड़ते रहे थे वे अब तक. अब जब बाजार का असर अंदर तक घुस गया तो टिके कैसे रहें? क्योंकि उनके साहित्यकार लोग साहित्य की कोंपले भले ही फोड़ लें लेकिन लोकोपयोगी जानकारी का कखग भी नहीं लिख सकते.</p>
<p>फिर साहित्यकार यह भी साबित नहीं होने देना चाहता कि वह सर्वज्ञ नहीं है. इसलिए इस बात को जोर-शोर से स्थापित करने की कोशिश की जाती है कि साहित्य ही भाषा का प्राण होती है. होती होगी. हिन्दी के लिए ऐसा कूड़ा साहित्य का ढेर तो प्राणघातक है. जहां कविता पर राजनीति होती हो और भाषा को इतना ऐतिहासिक बना दिया गया हो कि 50-55 करोड लोगों की भाषा होने के बावजूद दिवसों के सहारे जिन्दा हो.</p>
<p>यही हाल हिन्दी मीडिया का है. हिन्दी अखबारों ने जानकारी से ज्यादा वर्तनी पर ध्यान दिया. मेरा ज्यादा पुराना अनुभव नहीं रहा है लेकिन जबसे है तबसे मैंने एक बात अनुभव की आपकी रिपोर्ट की क्वालिटी इस बात पर निर्भर करती है कि संपादक या वरिष्ठ पत्रकार के साथ आपके संबंध कैसे हैं. उसकी समझ से आपकी समझ मेल कैसे खाती है. आपने क्या लिखा इससे कोई मतलब नहीं उसकी समझ में कितना आया इससे सारा मतलब है.</p>
<p>मुक्त पत्रकारिता के दौरान एक दिन एक मैगजीन के समाचार संपादक ने मुझे कहा कि यार ऐसे तो तुम सर्वाइव नहीं कर पाओगे. मैंने कहा क्यों? उसने कहा तुम रिपोर्ट पर जैसी मेहनत करते हो उसके बदले में इतना पैसा ही नहीं मिलेगा कि तुम जी खा सको. बात सही थी. इसलिए आप हिन्दी अखबारों को देखें तो आपको पता चलेगा कि खबरों में तथ्यों आदि को गोल-मोल कर दिया जाता है और कई बार एक ही बात को घुमा-फिराकर कई बार कहा जाता है. क्योंक? क्योंकि उसे अपनी टीसी-डीसी भरनी होती है. खबर तो वह कभी लिखता ही नहीं.</p>
<p>रही-सही कसर टीवी चैनलों ने पूरी कर दी. टीवी चैनलों ने साबित कर दिया कि न केवल वे निरामूर्ख हैं बल्कि समाज को मूर्ख बनाने का पट्टा भी ले लिया है. ऐसे में नवजात वेब माध्यम पर भी वही सारा कोढ़ हावी हो जाए जो अब तक भाषा को भंग करता रहा है तो फिर रास्ता कहां बचेगा?</p>

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		<title>पत्रकार या स्टेनोग्राफर</title>
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		<pubDate>Mon, 21 Apr 2008 00:05:00 +0000</pubDate>
		<dc:creator>संजय तिवारी</dc:creator>
				<category><![CDATA[कारपोरेट मीडिया]]></category>
		<category><![CDATA[कंपनीराज]]></category>

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		<description><![CDATA[हमारे बिजनेस अखबार आयातित बुद्धि के प्रभाव में कंपनियों को रिपोर्ट करते समय निवेश पत्रकारिता का रूख अपनाते हैं. अखबारों और चैनलों में बिजनेस रिपोर्टिंग में हर रोज ऐसी खबरें होती हैं कि यह कंपनी यहां इतना निवेश करेगी. वह कंपनी वहां उतना निवेश करेगी. लेकिन कभी आपने यह भी सुना कि उस निवेश की [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p>हमारे बिजनेस अखबार आयातित बुद्धि के प्रभाव में कंपनियों को रिपोर्ट करते समय निवेश पत्रकारिता का रूख अपनाते हैं. अखबारों और चैनलों में बिजनेस रिपोर्टिंग में हर रोज ऐसी खबरें होती हैं कि यह कंपनी यहां इतना निवेश करेगी. वह कंपनी वहां उतना निवेश करेगी. लेकिन कभी आपने यह भी सुना कि उस निवेश की जरूरत वहां है कितनी? या फिर निवेश करने का प्रभाव होगा या दुष्प्रभाव. हमारे बिजनेस अखबार इसे पत्रकारिता नहीं मानते. वह जो निवेश कर रहा है उससे उसे फायदा कितना होगा और समाज-पर्यावरण को कितना नुकसान इसका कोई आंकलन कभी हमारे बिजनेस पत्रकार नहीं करते. भाई कुएं में बाल्टी डालने की खबरें देते हो लेकिन उसने वहां से कितना पानी उलीचा कभी यह खबर क्यों नहीं बनाते?</p>
<p>इसीलिए मैं इन पत्रकारों को कंपनी पत्रकार कहता हूं. पत्रकार भी क्यों कहें? पी साईंनाथ ठीक कहते हैं कि असल में ये लोग स्टेनोग्राफर हैं. जो कंपनियों से डिक्टेशन लेते हैं. इस डिक्टेशन के बदले उन्हें तनख्वाह के अलावा कुछ गिफ्ट-शिफ्ट भी मिल जाता है.</p>
<p>पत्रकारिता तो शायद ही कहीं बची हो. हिन्दी टीवी चैनलों ने अपनी औकात दिखा दी है और यह साबित कर दिया है कि हिन्दी लुच्चों और लफंगों की भाषा है इसलिए उनकी प्राथमिकता वही लोग हैं. बिजनेस अखबर और चैनल तो कंपनियों को रिपोर्ट करने को ही पत्रकारिता समझते हैं. लगता है फिर पश्चिम से कोई हवा आयेगी तो इन पत्रकारों की बुद्धि ठिकाने आयेगी इनकी अपनी कोई समझ तो बची नहीं है.</p>
<p>पत्रकारिता का एक मूलभूत सिद्धांत है कि वह खबर नहीं है जो आपके पास चलकर आती है. खबर वह है जिसके पास चलकर आप जाते हैं. और इस चलने-फिरने में भी एक बात नहीं भूलनी चाहिए आपका अंतिम लक्ष्य आम आदमी की भलाई, उसका हक-हित सुरक्षित करना है न कि कंपनियों और साम्राज्यवादी ताकतों का. लेकिन अव्वल तो पत्रकारों ने चलने-फिरने से ही तौबा कर लिया है. चलते-फिरते भी हैं तो वहीं जाते हैं जहां उन्हें ले जाया जाता है.</p>
<p>ज्यादा कुछ तो नहीं सिर्फ इतनी प्रार्थना करता हूं कि ऐसे स्टेनोग्राफरों से भगवान इस देश की रक्षा करें.</p>

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		<title>तो आप किस घराने के पत्रकार हैं?</title>
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		<pubDate>Fri, 04 Apr 2008 03:29:00 +0000</pubDate>
		<dc:creator>संजय तिवारी</dc:creator>
				<category><![CDATA[कारपोरेट मीडिया]]></category>
		<category><![CDATA[बात करामात]]></category>

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		<description><![CDATA[इस देश में पत्रकारिता जिस ऊंचाई से शुरू हुई थी वह बहुत गौरवशाली है. इसे आप संयोग भी कह सकते हैं और नियति भी कि ब्रिटिशों से आजादी के संघर्ष के दौरान भारत में पत्रकारिता की शुरूआत होती है. इसलिए यहां पत्रकारिता हमेशा सत्ता प्रतिष्ठान के आलोचक की भूमिका में ही रही है. आज जो [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p>इस देश में पत्रकारिता जिस ऊंचाई से शुरू हुई थी वह बहुत गौरवशाली है. इसे आप संयोग भी कह सकते हैं और नियति भी कि ब्रिटिशों से आजादी के संघर्ष के दौरान भारत में पत्रकारिता की शुरूआत होती है. इसलिए यहां पत्रकारिता हमेशा सत्ता प्रतिष्ठान के आलोचक की भूमिका में ही रही है. आज जो पत्रकारिता के पुराने घराने दिखाई देते हैं उनकी भी शुरूआत ऐसी ही रही है और एक से एक श्रेष्ठ लोगों ने इसकी आधारशिला रखने में अपनी आहुति दी है.</p>
<p>मसलन हिन्दुस्तान साप्ताहिक के एक संपादक का किस्सा है 50-55 के आसपास का. कहते हैं जब कोई लेखक उनसे मिलने आता था तो वे उसे दफ्तर की चाय पिलाकर छुट्टी नहीं पा लेते थे. वे उसे लेकर बाजार जाते और पूरी आवभगत करते थे. एक बार किसी ने उनसे पूछा कि सर जब दफ्तर में सारी सुविधा है फिर आप लेखकों के ऊपर बाहर जाकर पैसा क्यों खर्च करते हैं? उन्होंने जवाब दिया था कि ये लेखक ही हमारी पूंजी हैं. ये जैसा लिखेंगे वैसी ही पत्रिका चलेगी.</p>
<p>लेकिन आज संपादकों की उन्हीं घरानों में क्या भूमिका है? घराने सबसे पहले एक संपादक पकड़ते हैं और उसे इतना पैसा देते हैं कि वह बेखटके अपने से नीचे के लोगों का शोषण कर सके. अब संपादक की काबिलियत यह नहीं होती कि खबर को कैसे ट्रीट करता है बल्कि उसकी काबिलियत का पैमाना यह है कि वह खबर और खबरची दोनों को कैसे पीटता है. कैसे एक रीढ़युक्त इंसान को रीढ़वीहिन पत्रकार में तब्दील कर देता है. हो सकता है उसे पता हो कि वह गलत कर रहा है लेकिन उसे यह सब करना पड़ता है क्योंकि इसी काम के लिए उसे पैसे दिये जाते हैं. पत्रकार भी अब संपादक के सिपहसालार नहीं होते बल्कि घराने के पत्रकार हो गये हैं. अब संपादक नहीं बल्कि घराना तय करता है कि आपको कैसी पत्रकारिता करनी है. फिर वह चाहे बिड़ला घराना हो या फिर समीर जैन का. जो नये घराने पैदा हो रहे हैं उनकी दशा अगर इस मामले में ठीक है कि अपने कर्मचारियों (मैं उन्हें पत्रकार कहने से हिचक रहा हूं) को अच्छा पैसा देते हैं तो उनकी अस्मिता को जमकर लूटते भी है.</p>
<p>और देखते ही देखते घराना पत्रकारिता का जन्म हो जाता है जो आम आदमी के लिए नहीं कारपोरेट घरानों और सरकारों का भोंपू बन जाता है. खबर खोजने वाला पत्रकार या तो खबर पैदा करने लगता है या फिर आफिस तक चलकर आयी प्रेस विज्ञप्तियों को खबर बनाकर छाप देता है. कहने की जरूरत नहीं कि कंपनियों ने देखा कि अगर ऐसा ही होता है तो उन्होंने सुंदर लड़कियों को इस काम पर लगा दिया जो अखबार-टीवी के दफ्तरों में घूमकर खबर बांटती हैं. और उनकी खबरें छपती भी हैं. ऐसे तो पत्रकार  स्वयंभू तानाशाह होता है लेकिन घराने के अहाते में आते ही तनखहिया नौकर की तरह व्यवहार करने लगता है.</p>
<p>आज देश में आठ-दस बड़े घराने हैं जिनके पास पत्रकारिता का ठेका रखा हुआ है. इसमें दो सबसे बड़े घराने हैं जो आज भी प्रासंगिक बने हुए हैं वे हैं टाईम्स घराना और हिन्दुस्तान टाईम्स घराना. (क्योंकि मैं सिर्फ हिन्दी पत्रकारिता के संदर्भ में बात कर रहा हूं इसलिए हिन्दू वगैरह की बात नहीं करता.) अगर कोई पत्रकार इन दो घरानों के पेरोल पर है तो वह पत्रकार हो जाता है. और अपने अलावा किसी और को पत्रकार नहीं मानता.</p>
<p>उसका यह श्रेष्ठताबोध अनावश्यक नहीं है. गोपाल कहता है कि ऐसे पत्रकारों को पत्रकार का संबोधन देने की बजाय बिड़ला जी के पत्रकार या फिर समीर जैन के पत्रकार कहना चाहिए. दुर्भाग्य से मुक्त पत्रकारों की आज भी पत्रकार बिरादरी में कोई खास इज्जत नहीं होती. जबकि होना चाहिए उल्टा. मुक्त पत्रकार ही असल में ज्यादा प्रोफेशनल होकर काम कर सकता है. वह नहीं कर पाता इसके कारण दूसरे हैं. लेकिन मेरा मानना है कि उसे घराना पत्रकारों से हर हाल में ज्यादा सम्मान मिलना चाहिए. लेकिन घराना पत्रकार ऐसा नहीं होने देता.</p>
<p>फिर<br />
 यहां से शोषण की जिस श्रृंखला की शुरूआत होती है उसकी चोट न केवल पत्रकारों पर पड़ती है बल्कि भाषा भी नष्ट होती है और समाज का स्थाई अहित होता है. घराना पत्रकारिता से मुक्ति कैसे मिले इसके लिए पूरे समाज को बहुत काम करने की जरूरत है. अन्यथा तो ये घराने और घराने के पत्रकार दोनों ही समाज को कंपनियों का गुलाम बनाकर छोड़ेंगे.</p>

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		<title>आ गया ndtvkhabar.com</title>
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		<pubDate>Tue, 01 Apr 2008 05:06:00 +0000</pubDate>
		<dc:creator>संजय तिवारी</dc:creator>
				<category><![CDATA[कारपोरेट मीडिया]]></category>
		<category><![CDATA[बात करामात]]></category>

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		<description><![CDATA[एनडीटीवी का बहुप्रतीक्षित हिन्दी वेब पोर्टल http://www.ndtvkhabar.com/ आज स्क्रीन पर चमक गया है.
हो सकता है अभी यह चमक आये जाये क्योंकि साफ लिखा है कि बीटा संस्करण है लेकिन पहली नजर में निराशा हो रही है. लेआऊट के स्तर पर बहुत ही फूहड़ किस्म की साईट है. खबरों के बारे में कुछ कहना उचित नहीं [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p><a href="http://bp0.blogger.com/_ae352Y7bWYQ/R_INFcO_6DI/AAAAAAAAAxQ/O8dhaLawLh8/s1600-h/ndtvkhabar.JPG"><img style="float:right;cursor:hand;margin:0 10px 10px 0;" alt="" src="http://bp0.blogger.com/_ae352Y7bWYQ/R_INFcO_6DI/AAAAAAAAAxQ/O8dhaLawLh8/s320/ndtvkhabar.JPG" border="0" /></a>एनडीटीवी का बहुप्रतीक्षित हिन्दी वेब पोर्टल <a href="http://www.ndtvkhabar.com/">http://www.ndtvkhabar.com/</a> आज स्क्रीन पर चमक गया है.</p>
<p>हो सकता है अभी यह चमक आये जाये क्योंकि साफ लिखा है कि बीटा संस्करण है लेकिन पहली नजर में निराशा हो रही है. लेआऊट के स्तर पर बहुत ही फूहड़ किस्म की साईट है. खबरों के बारे में कुछ कहना उचित नहीं होगा क्योंकि एनडीटीवी के पास खबरों का जखीरा है. इसलिए वे जैसी चाहें वैसी खबरें दे सकते हैं. <a href="http://www.ndtvkhabar.com/Home.aspx">होम पेज </a>देखने में कहीं से आकर्षक नहीं है. फाण्ट बहुत बड़ा दिखता है जो फूहड़ लगता है. रंगों का सामंजस्य भी कोई स्तरीय नहीं है. सच मानें तो <a href="http://www.tehelkahindi.com/">तहलका हिन्दी </a>अब आये पोर्टलों में इस मामले में काफी आगे है. प्रस्तुति के स्तर पर तहलका काम काबिले तारीफ है.</p>
<p>एनडीटीवी खबर कुछ-कुछ वैसे ही शुरू हुआ है जैसे दो-ढाई महीना पहले भाष्कर शुरू हुआ था. प्रयोग करते-करते भाष्कर लगातार बेहतर हो रहा है. उम्मीद करनी चाहिए कि एनडीटीवी खबर भी अपना उन्नयन करेगा और हिन्दी की वेबसाईट को सेवाभाव से नहीं बल्कि प्रोफेशनल तरीके से चलाएगा.</p>
<p>एक अच्छी सुविधा यह है कि वेब पर आप विडियो क्लिप्स देखने के साथ-साथ लाईव टीवी भी देख सकते हैं. निसंदेह अच्छा प्रयास. एनडीटीवी की टीम को बधाई और सुधार की गुजारिश भी.</p>

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		<title>माफिया, पुलिस और न्यूज माफिया</title>
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		<pubDate>Wed, 26 Mar 2008 02:40:00 +0000</pubDate>
		<dc:creator>संजय तिवारी</dc:creator>
				<category><![CDATA[कारपोरेट मीडिया]]></category>
		<category><![CDATA[बात करामात]]></category>

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			<content:encoded><![CDATA[<p><a href="http://bp2.blogger.com/_ae352Y7bWYQ/R-oCh8O_5_I/AAAAAAAAAwc/MrD9fchSqiQ/s1600-h/DSC00003.JPG"><img style="float:left;cursor:hand;margin:0 10px 10px 0;" alt="" src="http://bp2.blogger.com/_ae352Y7bWYQ/R-oCh8O_5_I/AAAAAAAAAwc/MrD9fchSqiQ/s320/DSC00003.JPG" border="0" /></a>परसों देर रात राजवीर सिंह की हत्या हो गयी. कल दिन-रात टीवी वाले हल्ला मचाते रहे. हल्ला मचाने में कोई हर्जा भी नहीं था. एनडीटीवी इंडिया से बात करते हुए रिटारर्ड पुलिस अफसर किरण बेदी ने कहा कि जब वे इंटेलिजेंस सेल की प्रमुख बनाई गयीं तो 48 घंटे के अंदर स्पेशल सेल को उनके विभाग से अलग कर दिया गया. उन्होंने पूछा ऐसा क्यों किया गया यह बहुत अनहोनी बात नहीं है. किरण बेदी का कहना था कि राजवीर सिंह एण्ड कंपनी ने ऊंचे अधिकारियों के साथ मिलकर ऐसा करवा लिया था.
<div></div>
<p>
<div>असल में पुलिस के बारे में एक कहावत है कि वही अपराध (आतंकवाद नहीं) होते हैं जिसकी पुलिस इजाजत देती है. जाहिर है अपराधियों और पुलिस के बीच एक गढजोड़ रहता है जो दोनों को फायदे में रखता है. किरण बेदी की मानें तो राजबीर सिंह उसी कड़ी का एक हिस्सा था. </div>
<p>
<div></div>
<p>
<div>खैर, जांच-पड़ताल में क्या सामने आता है पता नहीं लेकिन हर मौके को टीआपी में कैसे बदल दिया जाए इसके लिए हमारे न्यूज (आप न्यूड भी कह सकते हैं) चैनलों में से एक इंडिया टीवी ने कमाल कर दिया. उसने धूम-धड़ाके के साथ यह दिखाना शुरू कर दिया कि असल में हत्या किसी बंटी पाण्डेय नामक अपराधी के दो लोगों ने किया. टीवी ने बंटी पाण्डेय का महिमामण्डन करते हुए बताया कि ये कोई मामूली आदमी नहीं हैं ये छोटा राजन के खास आदमी हैं. बकौल इंडिया टीवी क्योंकि राजवीर सिंह भी छोटा राजन गिरोह के लिए काम करता था इसलिए दोनों में दुश्मनी चल रही थी. बड़े दिनों से बंटी पाण्डेय ताड़ रहा था कि कब मौका मिले और कब वह राजबीर सिंह को मार गिराये. आखिरकार मौका मिल गया और राजबीर सिंह बंटी पाण्डेय का शिकार हो गया.</div>
<p>
<div></div>
<p>
<div>अब अंदरखाने की खबर सुनिये. बंटी पाण्डेय की राजबीर से दुश्मनी जरूर थी लेकिन इस बात के कोई संकेत नहीं है कि राजबीर सिंह की हत्या में उसके किसी आदमी का हाथ है. असल में बंटी पाण्डेय ने इस मौके का उपयोग किया और इंडिया टीवी ने भी. राजबीर हत्याकाण्ड से बंटी पाण्डेय ने अपनी रेटिंग बढ़ा ली और इंडिया टीवी ने अपनी टीआरपी. बिना इस बात को जांचे कि क्या बंटी सही बोल रहा है इंडिया टीवी ने उसे सही साबित करके घंटों अपनी टीआरपी बनाए रखी. सबको मालूम है कि यह सब लंबी जांच का विषय होता है और जब तक जांच ठीक से शुरू होगी कौन पलटकर पूछने जाता है कि आपने गलत खबर क्यों दिखाई? </div>
<p>
<div></div>
<p>
<div>उधर बंटी पाण्डेय ने भी इंडिया टीवी का वैसे ही उपयोग कर लिया जैसे एक नाचनेवाली लड़की राखी सावंत करती रही है. अब बंटी का अपराध जगत में नये सिरे से रौब कायम हो जाएगा. उसकी वसूली इत्यादि ढर्रे पर आ जाएगी. क्यों न हो आखिरकार एक टीवी ने उसे अपराध का हीरो जो बना दिया. क्यों जी इंडिया न्यूड चैनल वालों क्या बोलते हो? </div>

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