
किसी भाषा से आप क्या उम्मीद करते हैं? यह कि वह आपको कवि बना दे या फिर चूतिया? हिन्दी इन्हीं दो विधाओं की भाषा बनकर रह गयी है. प्रकाशनों के बड़े तबके ने कवि पैदा किये. कवियों की राजनीति पैदा की और साहित्य की कोंपले फोड़ते रहे. कोंपले फूटी न फूटी लोगों के सिर जरूर [...]
April 24, 2008 | Posted in
कारपोरेट मीडिया |
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हमारे बिजनेस अखबार आयातित बुद्धि के प्रभाव में कंपनियों को रिपोर्ट करते समय निवेश पत्रकारिता का रूख अपनाते हैं. अखबारों और चैनलों में बिजनेस रिपोर्टिंग में हर रोज ऐसी खबरें होती हैं कि यह कंपनी यहां इतना निवेश करेगी. वह कंपनी वहां उतना निवेश करेगी. लेकिन कभी आपने यह भी सुना कि उस निवेश की [...]
April 21, 2008 | Posted in
कारपोरेट मीडिया |
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इस देश में पत्रकारिता जिस ऊंचाई से शुरू हुई थी वह बहुत गौरवशाली है. इसे आप संयोग भी कह सकते हैं और नियति भी कि ब्रिटिशों से आजादी के संघर्ष के दौरान भारत में पत्रकारिता की शुरूआत होती है. इसलिए यहां पत्रकारिता हमेशा सत्ता प्रतिष्ठान के आलोचक की भूमिका में ही रही है. आज जो [...]
April 4, 2008 | Posted in
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एनडीटीवी का बहुप्रतीक्षित हिन्दी वेब पोर्टल http://www.ndtvkhabar.com/ आज स्क्रीन पर चमक गया है.
हो सकता है अभी यह चमक आये जाये क्योंकि साफ लिखा है कि बीटा संस्करण है लेकिन पहली नजर में निराशा हो रही है. लेआऊट के स्तर पर बहुत ही फूहड़ किस्म की साईट है. खबरों के बारे में कुछ कहना उचित नहीं [...]
April 1, 2008 | Posted in
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परसों देर रात राजवीर सिंह की हत्या हो गयी. कल दिन-रात टीवी वाले हल्ला मचाते रहे. हल्ला मचाने में कोई हर्जा भी नहीं था. एनडीटीवी इंडिया से बात करते हुए रिटारर्ड पुलिस अफसर किरण बेदी ने कहा कि जब वे इंटेलिजेंस सेल की प्रमुख बनाई गयीं तो 48 घंटे के अंदर स्पेशल सेल को उनके [...]
March 26, 2008 | Posted in
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