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	<title>visfot.blog &#187; दिल्ली दरबार</title>
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		<title>राजनीति को गाली इस देश का पुराना फैशन है</title>
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		<pubDate>Tue, 02 Dec 2008 08:43:28 +0000</pubDate>
		<dc:creator>संजय तिवारी</dc:creator>
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		<description><![CDATA[राजनीति को गाली देना एक फैशन है. पढ़े लिखे और समझदार होने की निशानी है. ठीक वैसे ही जैसे आप बात करते करते एक दो शब्द अंग्रेजी के बोल दें तो तुरंत प्रतिक्रिया आती है कि अरे आप तो पढ़े लिखे आदमी हैं. ऐसे ही अगर आप राजनीतिज्ञ को गाली देते हैं तो समझा जाता [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p>राजनीति को गाली देना एक फैशन है. पढ़े लिखे और समझदार होने की निशानी है. ठीक वैसे ही जैसे आप बात करते करते एक दो शब्द अंग्रेजी के बोल दें तो तुरंत प्रतिक्रिया आती है कि अरे आप तो पढ़े लिखे आदमी हैं. ऐसे ही अगर आप राजनीतिज्ञ को गाली देते हैं तो समझा जाता है कि आप इस देश के जागरूक नागरिक हैं. लेकिन कौन लोग हैं जो राजनीति को गाली दे रहे हैं?</p>
<p>उनका न इस देश में कोई विश्वास है, न यहां की राजनीतिक प्रक्रिया में कोई हिस्सेदारी. उन्हें क्या हक है जो वे राजनीति को गाली दें? जो पैदा ही इस सपने के साथ होते हैं कि किसी तरह विदेश जाकर सैटल हो जाएं और अपने घर के दरवाजे के बाहर झांककर कभी देखते तक नहीं कि बाहर की दुनिया को भी उनकी जरूरत है या नहीं? सुबह से शाम तक सिर्फ अपने लिए परेशान ऐसे स्वार्थी नागरिकों द्वारा राजनीति और राजनीतिज्ञों को गाली देना शोभा नहीं देता.</p>
<p>मैं दावे से कह सकता हूं जो लोग राजनीति और राजतिज्ञों को गाली दे रहे हैं उनको एक मौका दीजिए वे तुरंत अमेरिका भाग जाएंगे.</p>

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		<title>लिपस्टिक लगाकर आतंक से मुकाबला</title>
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		<pubDate>Mon, 01 Dec 2008 14:51:21 +0000</pubDate>
		<dc:creator>संजय तिवारी</dc:creator>
				<category><![CDATA[दिल्ली दरबार]]></category>

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		<description><![CDATA[मुंबई में आतंकी हमले के बाद कारपोरेट मीडिया अपने आकाओं (कंपनियों और उसके चट्टुओं) के लिए मीडिया से अधिक आंदोलनकारी की भूमिका में आ गया है. इलेक्ट्रानिक मीडिया एक दो फाईवस्टार होटलों में हुए हमलों को जिस तरह से जंग पर उतारू है वह निश्चित रूप से परेशान करनेवाला है. इलेक्ट्रानिक मीडिया जो भूमिका निभा [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p>मुंबई में आतंकी हमले के बाद कारपोरेट मीडिया अपने आकाओं (कंपनियों और उसके चट्टुओं) के लिए मीडिया से अधिक आंदोलनकारी की भूमिका में आ गया है. इलेक्ट्रानिक मीडिया एक दो फाईवस्टार होटलों में हुए हमलों को जिस तरह से जंग पर उतारू है वह निश्चित रूप से परेशान करनेवाला है. इलेक्ट्रानिक मीडिया जो भूमिका निभा रहा है वह मीडिया से ज्यादा वफादार कुत्ते की भूमिका है जो अपने मालिक के लिए भौंकता है. अगर यह वफादार कुत्ता देश के आम नागरिकों के दुख-दर्द के प्रति इतना वफादार होता तो बात इतनी अखरती नहीं. <a href="http://visfot.com/blog/wp-content/uploads/2008/12/india06_16170785.jpg"><img class="alignright size-medium wp-image-456" title="india06_16170785" src="http://visfot.com/blog/wp-content/uploads/2008/12/india06_16170785-300x190.jpg" alt="" width="300" height="190" /></a></p>
<p>इलेक्ट्रानिक मीडिया के कुछ अंग्रेजी चैनल इस समय भिन्नाए हुए हैं और वे एक आतंकी वारदात को रिपोर्ट करने, उसकी जानकारी देने से आगे के ाम को अंजाम दे रहे हैं. ऐसे चैनलों की भाषा और खबरनवीसी देखेंगे तो समझ आ जाएगा िक वे खबर देने से आगे का काम कर रहे हैं. क्यों? क्योंकि इस बार हमला उन अमीरी और अय्याशी के उन सुरक्षित गढ़ों पर हुआ है जो इस देश के चंद अमीरों की झूठी शान का दिखाने का अड्डा है. निश्चित रूप से इस घटना की निंदा होनी चाहिए और आगे से ऐसी घटनाएं न हों ऐसी व्यवस्था होनी चाहिए. लेकिन सुरक्षित केवल ताज और ओबेराय ही क्यों हों? या फिर किसी शहर का एकाध हिस्सा बाकी हिस्सों से अधिक सुरक्षित क्यों हो? सुरक्षा तो पूरे देश की होती है. एकसमान होती है.</p>
<p>फिर ये पूंजीपति और उनके पिट्ठू इलेक्ट्रानिक चैनल सिर्फ एक खित्ते पर हुए हमलों को देश पर हमला बता रहे हैं? यह देश पर हमला होता अगर वह खित्ता देश के बाकी लोगों के दुख दर्द के साथ जुड़ा होता. इलेक्ट्रानिक चैनलों की हिम्मत देखिए. वे राजनीतिक लोगों के चरित्र पर सवाल उठा रहे हैं. एक ऐसा माहौल बनाने में लगे हैं कि इस देश का राजनीति वर्ग बिल्कुल नाकारा है. राजनीतिज्ञों को सड़कों पर खड़ा करके गोली मार देना चाहिए. लेकिन इलेक्ट्रानिक चैनलों के ये पट्टाधारी रिपोर्टर आज अगर इस तरह से अभियान चला रहे हैं तो इसके लिए भी राजनीतिक वर्ग ही दोषी है. राजनीतिक लोग आम आदमी के वोटों से चुनकर वहां पहुंचते हैं लेकिन वहां पहुंचने के बाद वे हमेशा खास आदमियों के लिए काम करते हैं जिनका न राजनीतिक प्रणाली में कोई विश्वास है और न ही इस देश के लोकतंत्र में. लेकिन आश्चर्यजनक रूप से इसी गिटपिटाया जमात के लिए राजनीतिक और प्रशासनिक वर्ग हमेशा काम करता है.</p>
<p>इलेक्ट्रानिक मीडिया द्वारा राजनीतिक बलि लेने का सिलसिला जारी है. शिवराज पाटिल, आरआर पाटिल के बाद अब निशाने पर भाजपा के मुख्तार अब्बास नकवी हैं. नकवी ने कहा कि लिपस्टिक लगाकर और पाउडर पोतकर जो लोग आतंक के खिलाफ नारा लगा रहे हैं उनके वश में कुछ है कि वे इसे रोक पायेंगे. क्या गलत कहा नकवी ने? एक झिंगूर देखकर घर के बाहर भाग जानेवाले लोग असल में हर प्रकार के आतंक के जन्मदाता होते हैं. आज अगर देश में नक्सलवाद की समस्या है तो उसके मूल में कौन लोग हैं? आज अगर देश में आतंकवाद की समस्या है तो उसके मूल में कौन है? कौन सा वह लालची वर्ग है जो अपनी लालच को पूरा करने के लिए समाज में विषमता पैदा कर रहा है? आप सबको भ्रम है कि वह राजनीतिक लोग हैं. साहब, अब समाजवाद का जमाना नहीं है जहां राजनीतिक व्यक्ति ही सर्वोपरि होता था. यह पूंजीवाद का युग है. और इस पूंजीवादी युग में पूंजीपति राजनीतिक लोगों को सिर्फ प्रयोग करता है. आज उस पर आतंकी हमला हुआ तो उसने अपने पालतू कुत्तों को राजनीतिक लोगों को काटने के लिए ही छोड़ दिया है.</p>
<p>नतीजा आप सबके सामने आ रहा है. मुंबई के होटलों पर हुए आतंकी हमले हमें यह भी बताते हैं कि इस देश में पूंजीपति कितना ताकतवर हो चुका है. असल में सरकार नाम की मशीनरी उसकी बंधुआ मजदूर होकर रह गयी है और मीडिया का बड़ा वर्ग उसका पट्टेदार सेवक.आम आदमी न कल कहीं था और न आज कहीं है, और ऐसे ही रहा तो आनेवाले वक्त में कल कहीं होगा भी नहीं.</p>

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		<title>पप्पू कान्ट वोट साला!</title>
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		<pubDate>Mon, 24 Nov 2008 17:56:58 +0000</pubDate>
		<dc:creator>संजय तिवारी</dc:creator>
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		<description><![CDATA[अभी तो पप्पू की परीक्षा भी नहीं है. फिर भी पप्पू वोट नहीं डालेगा. पप्पू को दो दिन की छुट्टी मिल रही है. वह छुट्टी मनाने जाएगा. ऐसा कभी होता है क्या? दो दिन की छुट्टी एकसाथ. फिर समय क्यों खराब करेगा? वह घर से निकलेगा लेकिन वोट डालने नहीं बल्कि आउटिंग करने. २९ को [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p>अभी तो पप्पू की परीक्षा भी नहीं है. फिर भी पप्पू वोट नहीं डालेगा. पप्पू को दो दिन की छुट्टी मिल रही है. वह छुट्टी मनाने जाएगा. ऐसा कभी होता है क्या? दो दिन की छुट्टी एकसाथ. फिर समय क्यों खराब करेगा? वह घर से निकलेगा लेकिन वोट डालने नहीं बल्कि आउटिंग करने. २९ को सटर्डे है और ३० को सन्डे. २९ को दिल्ली में कोई लोकतंत्र वगैरह के लिए वोट कास्टिंग होगा. वही लाईन लगाकर सबके साथ अंदर जाओ. फिर वहां कोई मशीन है उस पर बटन दबाकर बाहर आ जाओ. डिस्गस्टिंग यू नो?<a href="http://visfot.com/blog/wp-content/uploads/2008/11/dscn0183.jpg"><img class="alignright size-medium wp-image-444" title="delhi-election" src="http://visfot.com/blog/wp-content/uploads/2008/11/dscn0183-300x203.jpg" alt="" width="210" height="142" /></a></p>
<p>कोई कश्मीर में वोट डालने को अच्छा साईन मान रहा है ये लोग. पप्पू को सब टाईम खराब करनेवाला काम लग रहा है. दो दिन का टाईम है, गर्ल है तो ब्यायफ्रेण्ड और ब्याय है तो गर्लफ्रेण्ड को साथ लेगा. हो सकता है अब ब्वाय ब्वाय के साथ और गर्ल गर्ल के साथ भी हो जाए. वो देखा है न दोस्ताना. वैसा ही कुछ. यू नो. ह्वाई आल हैव टू से? अण्डरस्टैण्ड यार&#8230;..वैसा ही. दो दिन के लिए घर से निकल जाने का. इधर दिल्ली में बहुत शोर रहेगा. न्यूज चैनलवाला सब डेमोक्रेसी की बात करेगा. मम्मी डेडी भी बिजी रहेगा. वोट देने में नहीं. सबको ये बताने में कि उन्होंने वोट दिया. ऐसा ही पूरा दिन निकल जाएगा. </p>
<p>सब दुकानें बंद रहेंगी इसलिए इंतजाम पहले से करके रखना. अभी टाईम है. दोस्तों के साथ मिलकर रायल स्टैग या फिर तेरी जो भी पसंद हो उसका क्रेट गाड़ी में रखना और फुल स्पीड में दिल्ली से बाहर चले जाना. वैसे मेरा फार्महाउस है, उधर भी आ सकता है. दो दिन मस्ती करेंगे. दो दिन बाद जब इधर न्वाईज कम हो जाएगा तो आ जाएंगे. ये स्साला डेमोक्रेसी का भी कमाल है. घड़ी-घड़ी आता रहता है. अब मेरे को क्या करना है इससे. तुम लोग इतने साल से राज कर रहा है लेकिन पार्किंग को जगह नहीं मिलती. सड़क पर जगह नहीं है, हाउ टू ड्राईव आन रोड? नो मैनर? ह्वेयर इज डेमोक्रेसी? क्यों वोट डालने का? तुमको डालना है तो डालो. मैं तो इस बकवास को सुननेवाला नहीं.</p>
<p>(यह वर्तमान शिक्षा-दीक्षा में तैयार पप्पू बहुत कम बचा है दिल्ली में. जो बचा है वह भी अमेरिका भागने की तैयारी में है. उसे लगता है कि वह सिर्फ इसलिए पैदा हुआ है कि उसे अमेरिका जाने का वीजा मिल सके. इसलिए जब तक इस देश को झेल रहा है तब तक वह &#8216;महान लोकतंत्र&#8217; को इसी नजरिये से देखकर घुट-घुट कर जीता है. दिल्ली जैसे महानगर में सबसे कम वोटिंग दिल्ली के मंहगी कालोनियों में होता है और सरकार सबसे ज्यादा काम उन्हें मंहगे लोगों के लिए करती है. यही लोकतंत्र है.)</p>

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		<title>सरकार की जीत संसद की हार</title>
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		<pubDate>Tue, 22 Jul 2008 17:29:56 +0000</pubDate>
		<dc:creator>संजय तिवारी</dc:creator>
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		<description><![CDATA[मनमोहन सिंह की सरकार बच गयी है. अब वे मुस्कुराते हुए आईएईए में जा सकते हैं. अमरीका से परमाणु करार कर सकते हैं, और देश को सदियों के लिए नरक की भट्टी में झुलसने के लिए झोंक सकते हैं. वे एक ऐसी आग में देश को झोंकने के लिए स्वतंत्र हैं जो एक बार लग [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p><a href="http://visfot.com/blog/wp-content/uploads/2008/07/singhadvani.jpg"><img class="alignright size-medium wp-image-300" title="singhadvani" src="http://visfot.com/blog/wp-content/uploads/2008/07/singhadvani-272x300.jpg" alt="" width="272" height="300" /></a>मनमोहन सिंह की सरकार बच गयी है. अब वे मुस्कुराते हुए आईएईए में जा सकते हैं. अमरीका से परमाणु करार कर सकते हैं, और देश को सदियों के लिए नरक की भट्टी में झुलसने के लिए झोंक सकते हैं. वे एक ऐसी आग में देश को झोंकने के लिए स्वतंत्र हैं जो एक बार लग गयी तो शायद ही बुझे. संसद में दो दिनों तक बहस हुई. झगड़ा हुआ. फसाद हुआ. लेकिन सारी बहस मुद्दे से दूर अपने-अपने एजण्डों को भुनाने के इर्द-गिर्द घूमती रही. इस पूरी बहस का पटाक्षेप भी एक ऐसे शर्मनाक हादसे से हुआ कि सारी पोल-पट्टी खुलकर सामने आ गयी.</p>
<p>हो सकता है ओमप्रकाश अर्गल ने समय और तरीका गलत चुना हो लेकिन इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि अमर सिंह ने पैसे का बड़ा खेल किया है. भाजपा के ही एक सांसद ब्रजभूषण शरण सिंह को अमर सिंह पहले ही तोड़ चुके थे. सरकार को विश्वास मत अर्जित करने में कोई चूक न रह जाए इसलिए हो सकता है यह पैसा अमर सिंह ने अर्गल के पास भिजवाया हो लेकिन जैसा कि सदन के बाहर अमर सिंह ने कहा कि अगर वे इतने ही इमानदार थे तो जिस समय पैसा दिया जा रहा था उसी समय मीडिया को बताते, पुलिस में रिपोर्ट करवाते. अमर सिंह सही कह रहे हैं. भाजपा के लोग रणनीतिक रूप से यहां भी चूक गये.</p>
<p>इस पूरे मसले में कई सारी रणनीतिक चूकें हुई हैं. ऐसी चूकों में भाजपा सबसे आगे है. सबसे पहले परमाणु समझौते पर जिन दो लोगों ने आपत्ति उठायी थी उनमें एक वीपी सिंह हैं और दूसरे हैं अटल बिहारी वाजपेयी. अटल जी की आपत्ति के बाद मनमोहन सिंह उनसे मिलने उनके घर गये थे. बैठक में तीन लोग थे. अटल बिहारी वाजपेयी, मनमोहन सिंह और ब्रजेश मिश्र. उस समय जो सहमति बनी थी वह यह कि भारत सरकार भी हाईड एक्ट की तर्ज पर कोई ऐसा कानून बनाए जिससे आनेवाली सरकारें बाध्य हों. इस समझौते के तहत यह भारतीय सेफगार्ड होता. कहते हैं मनमोहन सिंह इस पर सहमत हो गये थे और अटल जी ने भरोसा दिलाया था कि अगर ऐसा होता है तो भाजपा इस समझौते का समर्थन करेगी. लेकिन ऐसा हुआ नहीं. यह भाजपा की बड़ी रणनीतिक चूक थी.</p>
<p>अब मनमोहन सिंह ऐसे किसी एक्ट को पारित करने के लिए भी बाध्य नहीं है. वैसे भी उनके ऊपर आरोप है कि वे ग्लोबल सरकार के लोकल प्रधानमंत्री हैं. वे जिन उद्येश्यों को पूरा करने के लिए प्रधानमंत्री बनाये गये थे उनमें से अधिकांश पूरे हो चुके हैं. वे अमरीका से एक ऐसे कृषि समझौते पर भी हस्ताक्षर कर आये हैं जिससे भारत की कृषि नीति अमेरिका की मर्जी से तय होगी. यह समझौता भी उसी वक्त हुआ था जब परमाणु करार पर दोनों सरकारों की आम सहमति बनी थी. लेकिन क्योंकि किसानी कोई ऐसा विषय नहीं है कि उस पर संसद में बहस होती या सरकार को गिराने तक की नौबत आती इसलिए उसकी तो आज तक मीडिया ने चर्चा भी नहीं की.</p>
<p>सरकार विश्वास मत जीत गयी है. सांसदों की मण्डी में उसे 275 सांसदों का समर्थन मिल गया है. लेकिन संसद हार गयी है. संसद हार गयी है कि उसके होने न होने का कोई खास मतलब नहीं रह गया. उसकी बहसों का भी कोई खास मतलब नहीं रह गया है. बहस तो एक रस्म अदायगी मात्र है फैसले तो संसद के बाहर ही हो जाते हैं. इधर संसद में बहस चल रही थी उधर अमेरिका के विदेश उपमंत्री ने बयान दे दिया कि अगर सरकार अल्पमत में भी आ जाती है तो अमेरिका डील से पीछे नहीं हटेगा. बात साफ है. तीसरी दुनिया के देशों की संसद में क्या होता है इसका कोई खास मतलब पहली दुनिया के देशों से नहीं रहता. पहली दुनिया संसदों में जो होता है उसका असर जरूर तीसरी दुनिया के देशों की संसदों पर होता है. भारत की संसद में यही हुआ है. पहली दुनिया के पहले नंबर के देश ने फैसले किये हैं कि परमाणु करार के मुद्दे पर सरकार को रहना चाहिए या नहीं. दुर्भाग्य से अभी भी हम जयचंदों से मुक्त नहीं हैं इसलिए अमेरिका जैसे देश तीसरी दुनिया के देशों में मनमाफिक फैसला कराने में सफल हैं.</p>

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		<title>सदन में अटल जी की कमी खल रही है</title>
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		<pubDate>Mon, 21 Jul 2008 10:25:11 +0000</pubDate>
		<dc:creator>संजय तिवारी</dc:creator>
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		<description><![CDATA[परमाणु करार के मुद्दे पर सदन का विश्वास मत हासिल करने के लिए आज लोकसभा में शुरू हुई बहस में नेता प्रतिपक्ष लालकृष्ण आडवाणी ने बहुत निराश किया. उनका भाषण सधा हुआ नहीं था. ऐसा लग रहा था कि उनके पास बोलने के लिए कुछ खास है भी नहीं. वे परमाणु करार के मुद्दे पर [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p><a href="http://visfot.com/blog/wp-content/uploads/2008/07/atal1.jpg"><img class="size-medium wp-image-296 alignleft" style="float: left;" title="atal1" src="http://visfot.com/blog/wp-content/uploads/2008/07/atal1-259x300.jpg" alt="" width="259" height="300" /></a>परमाणु करार के मुद्दे पर सदन का विश्वास मत हासिल करने के लिए आज लोकसभा में शुरू हुई बहस में नेता प्रतिपक्ष लालकृष्ण आडवाणी ने बहुत निराश किया. उनका भाषण सधा हुआ नहीं था. ऐसा लग रहा था कि उनके पास बोलने के लिए कुछ खास है भी नहीं. वे परमाणु करार के मुद्दे पर सदन में वह उत्तेजना नहीं भर पाये जैसा कि इस मुद्दे पर नेता प्रतिपक्ष से उम्मीद की जा रही थी. अगर यह मान लें कि सरकार सदन में विश्वास मत हासिल नहीं कर पायेगी तो नेता प्रतिपक्ष का यह भाषण आनेवाले लोकसभा चुनाव का केन्द्रीय मुद्दों की झलक भी दे सकता था. लेकिन ऐसे महत्वपूर्ण मौके पर विपक्ष के नेता ने पूरी तरह से निराश किया.</p>
<p>जिन्हें याद है उन्हें याद होगा अटल बिहारी वाजपेयी का वह भाषण जो उन्होंने 13 दिन की सरकार के विश्वास को हासिल करने के लिए सदन में दिया था. वह भाषण आनेवाले चुनावों तक लोगों के जेहन में बना रहा और इसका सीधा फायदा भाजपा को हुआ. आज नेता प्रतिपक्ष के तौर पर आडवाणी उसका लेशमात्र भी असर नहीं पैदा कर सके. ऐसा लगा कि प्रधानमंत्री के रूप में पहले ही इस देश में एक गैर-राजनीतिक आदमी काम कर रहा है अब नेता प्रतिपक्ष में भी कोई दम नहीं रहा. हालांकि आडवाणी जी के कुछ सवालों का जवाब देने के लिए आज मनमोहन सिंह ने जो तेवर दिखाया वह आडवाणी से बहुत बेहतर था. लगा कि हां, प्रधानमंकत्री को तो ऐसे ही बोलना चाहिए.</p>
<p>बहुत सारे लोग मानते हैं कि राजनीति भी वैसे ही लोगों के पास होनी चाहिए जैसे ब्यूरोक्रेसी नौकरशाहों के हाथ में है. यह ठीक नहीं है. राजनीतिज्ञ कोई क्लर्क नहीं होता जो बैठकर फाईलें निपटाता रहे. राजनीतिज्ञ लीडर होता है. और उसे लीडर जैसा व्यवहार भी करना चाहिए. परमाणु करार पर चर्चा में भाकपा के मोहम्मद सलीम ने आडवाणी से बहुत बेहतर भाषण दिया. मोहम्मद सलीम के पूरे वक्तव्य को सदन ने बहुत ध्यान से सुना और एकाध बार छोड़कर कोई खास टोका-टोकी नहीं हुईं. जिन तथ्यों, तर्कों और तेवरों की उम्मीद आडवाणी से थी उसे पूरा किया मोहम्मद सलीम ने जो उत्तर कोलकाता से भाकपा के सांसद है. बार-बार सभापति को याद दिलाने के बावजूद कि उनकी पार्टी को केवल 56 मिनट मिला है वे कोई 40 मिनट बोले और अब तक वामपंथी पार्टियों द्वारा जो भी आपत्तियां की जाती रही हैं उसका बहुत सटीक और तार्किक विश्लेषण किया.</p>
<p>आज अटल बिहारी वाजपेयी जैसे व्यक्तित्व की कमी बहुत खल रही थी. वे सदन में नेता प्रतिपक्ष होते तो सदन में बहस का स्तर ही कुछ और होता. अभी तो यह भी पता नहीं कि वे सदन में वोट देने भी आयेंगे या नहीं?</p>

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