दिल्ली दरबार “पप्पू कान्ट वोट साला”

भारतनामा “शिक्षा चाहिए संस्कार नहीं”

Archive for the Category ‘दुनिया मेरे आगे’

सन 2052 का एक दिन-3

सन 2052 का एक दिन-3

आज मैं जब यहां खड़े होकर पीछे देखता हूं तो लगता है कि चार दशक पहले हम किस तरह सूचना के बैलगाड़ी युग में जी रहे थे. भारी भरकम कम्प्यूटर और लैपटाप को हम उन दिनों सूचना तकनीकि का औजार घोषित कर उसका महिमामंडन किया जाता था. महिमामंडन करने में कोई बुराई नहीं थी क्योंकि [...]

इंटरनेट मुक्ति का माध्यम है और यह मौत के बाद मिलेगी

इंटरनेट मुक्ति का माध्यम है और यह मौत के बाद मिलेगी

ब्लाग बनाना अब बहुत आसान काम है. वेबसाईट बनाना भी कोई मुश्किल काम नहीं है. हिन्दी में काम करना और लिखना भी बहुत आसान है. सब आसान है तो फिर मुश्किल क्या है? कोई शक नहीं कि अभी इंटरनेट का विस्तार अपनी शुरूआती अवस्था में है. कुल छह करोड़ उपभोक्ताओं की जमात में कितनी जमा [...]

संतोषः परमो लाभः सत्संगः परमा गतिः

संतोषः परमो लाभः सत्संगः परमा गतिः

योगवशिष्ठ मेरा प्रिय ग्रंथ है. वैसे ही जैसे रामचरित मानस, कबीर के दोहे या फिर सुखमनी साहिब. श्रीमद्भगवगीता बहुत बौद्धिक ग्रंन्थ है. मैं पढ़ता जरूर हूं लेकिन उस अपनेपन के साथ नहीं जैसे रामचरितमानस या फिर सुखमनी साहिब को. श्रीमद्भगवतगीता में बुद्धि विलास और तार्किक विश्लेषण ज्यादा है. गीता में भाव का सिरे से [...]

आत्मा का प्रकृति के साथ महासंभोग

आत्मा का प्रकृति के साथ महासंभोग

विद्वान होने के लिए बहुत सारे लोग 33 करोड़ देवी-देवता को मिथक साबित करके भारत और भारतीयता का मजाक उड़ाते हैं. लेकिन शायद ही किसी विद्वान ने इसके बारे में समझने की कोशिश की हो कि समाज में ऐसे प्रतीक आखिर गढ़े क्यों जाते हैं? आखिर वह कौन सी समझ है जो समाज को शासन [...]

दादी भीख मांगने गयी है, कुछ मिला तो खा लेंगे

दादी भीख मांगने गयी है, कुछ मिला तो खा लेंगे

यह आपकी भावनाओं के उद्दीपन के लिए किसी कहानीकार द्वारा लिखा गया कोई वाक्य नहीं है. यह पिंटू का इकबालिया बयान है और बुंदेलखण्ड की भयावह हकीकत भी. जब पिंटू से यह बातचीत हो रही थी उसी समय मायावती अपने जन्मदिन पर भारी-भरकम केक काट रही थीं. भरे पेट उन्होंने एक भारी-भरकम ऐलान भी कर [...]

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