
आज मैं जब यहां खड़े होकर पीछे देखता हूं तो लगता है कि चार दशक पहले हम किस तरह सूचना के बैलगाड़ी युग में जी रहे थे. भारी भरकम कम्प्यूटर और लैपटाप को हम उन दिनों सूचना तकनीकि का औजार घोषित कर उसका महिमामंडन किया जाता था. महिमामंडन करने में कोई बुराई नहीं थी क्योंकि [...]
July 22, 2009 | Posted in
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ब्लाग बनाना अब बहुत आसान काम है. वेबसाईट बनाना भी कोई मुश्किल काम नहीं है. हिन्दी में काम करना और लिखना भी बहुत आसान है. सब आसान है तो फिर मुश्किल क्या है? कोई शक नहीं कि अभी इंटरनेट का विस्तार अपनी शुरूआती अवस्था में है. कुल छह करोड़ उपभोक्ताओं की जमात में कितनी जमा [...]
March 14, 2009 | Posted in
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योगवशिष्ठ मेरा प्रिय ग्रंथ है. वैसे ही जैसे रामचरित मानस, कबीर के दोहे या फिर सुखमनी साहिब. श्रीमद्भगवगीता बहुत बौद्धिक ग्रंन्थ है. मैं पढ़ता जरूर हूं लेकिन उस अपनेपन के साथ नहीं जैसे रामचरितमानस या फिर सुखमनी साहिब को. श्रीमद्भगवतगीता में बुद्धि विलास और तार्किक विश्लेषण ज्यादा है. गीता में भाव का सिरे से [...]
April 26, 2008 | Posted in
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विद्वान होने के लिए बहुत सारे लोग 33 करोड़ देवी-देवता को मिथक साबित करके भारत और भारतीयता का मजाक उड़ाते हैं. लेकिन शायद ही किसी विद्वान ने इसके बारे में समझने की कोशिश की हो कि समाज में ऐसे प्रतीक आखिर गढ़े क्यों जाते हैं? आखिर वह कौन सी समझ है जो समाज को शासन [...]
April 10, 2008 | Posted in
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यह आपकी भावनाओं के उद्दीपन के लिए किसी कहानीकार द्वारा लिखा गया कोई वाक्य नहीं है. यह पिंटू का इकबालिया बयान है और बुंदेलखण्ड की भयावह हकीकत भी. जब पिंटू से यह बातचीत हो रही थी उसी समय मायावती अपने जन्मदिन पर भारी-भरकम केक काट रही थीं. भरे पेट उन्होंने एक भारी-भरकम ऐलान भी कर [...]
January 19, 2008 | Posted in
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