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	<title>visfot.blog &#187; दुनिया मेरे आगे</title>
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		<title>सन 2052 का एक दिन-3</title>
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		<pubDate>Tue, 21 Jul 2009 21:12:38 +0000</pubDate>
		<dc:creator>संजय तिवारी</dc:creator>
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		<description><![CDATA[आज मैं जब यहां खड़े होकर पीछे देखता हूं तो लगता है कि चार दशक पहले हम किस तरह सूचना के बैलगाड़ी युग में जी रहे थे. भारी भरकम कम्प्यूटर और लैपटाप को हम उन दिनों सूचना तकनीकि का औजार घोषित कर उसका महिमामंडन किया जाता था. महिमामंडन करने में कोई बुराई नहीं थी क्योंकि [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p>आज मैं जब यहां खड़े होकर पीछे देखता हूं तो लगता है कि चार दशक पहले हम किस तरह सूचना के बैलगाड़ी युग में जी रहे थे. भारी भरकम कम्प्यूटर और लैपटाप को हम उन दिनों सूचना तकनीकि का औजार घोषित कर उसका महिमामंडन किया जाता था. महिमामंडन करने में कोई बुराई नहीं थी क्योंकि आज दुनिया जहां आकर खड़ी हो गयी है उसकी शुरूआत तो उन्हीं भोथरे हथियारों से हुई थी जिन्हें उस जमाने में क्रांति के औजार कहे जाते थे. लेकिन वह समय अब काफी पीछे छूट गया है. आज हम तकनीकि शब्द को वैसे ही नफरत करते हैं जैसे उस समय प्रेम करते थे. मानो प्रेम ने प्रतिक्रिया कर दी हो. लेकिन अब कुछ हो नहीं सकता. आज शायद ही कोई ऐसा व्यक्ति मिले जो यह कहे कि उसे तकनीकि से प्रेम है. नयी पीढ़ी के लड़कों में इसे लेकर सबसे अधिक विद्रोह दिखाई देता है. लेकिन वे भी कुछ कर नहीं सकते. जो है उसे तो स्वीकार करना ही होगा. उसी के साथ जीने की आदत डालनी होगी.</p>
<p>नौजवान कहते हैं कि वे मुक्त होकर जीना चाहते हैं. वे किसी भी प्रकार की तकनीकि को अपने जीवन पर अंकुश मानते हैं. आये दिन इस बारे में साइबर बहस होती है, एक ग्रह से दूसरे ग्रह तक लगातार बहस और आंदोलन चलते हैं कि तकनीकि के प्रभाव को कैसे कम किया जाए. उनका ऐसा करना जायज भी है. इक्कीसवीं सदी की शुरूआत में जिस तकनीकि को मुक्ति का माध्यम मानकर स्वीकार किया गया था आज वह तकनीकि गुलामी का सबसे बड़ा हथियार बन गयी है. मैंने पहले ही आपको बताया है कि कैसे मशीन और आदमी के बीच का अंतरसंबंध आदमी के लिए ही बहुत घातक साबित हो रहा है. हमारे पूरे शहर, देश और ग्रह तकनीकि के जरिए ही नियंत्रित किये जा रहे हैं. जिस शहर में मैं रहता हूं उस शहर की किसी भी सार्वजनिक सुविधा पर आदमी का नियंत्रण नहीं हैं. सारी सुविधा, उत्पादन और सुरक्षा पर मशीनों का नियंत्रण है. ऐसा नहीं है कि मशीनों ने कोई युद्ध करके कब्जा कर लिया है, यह तो क्रमिक रूप से हम खुद ही मशीनों पर निर्भर होते चले गये और आज जब अपने ऊपर निर्भर होना चाहते हैं तो वापस लौटने का कोई रास्ता दिखाई नहीं देता.</p>
<p>इक्कीसवीं सदी की शुरूआत में केवल पूंजी का ही केन्द्रीयकरण नहीं हुआ. मानव जीवन में सप्रयास तकनीकि की पैठ बनायी गयी और जीवन का केन्द्रीयकरण किया गया. विकेन्द्रित जीवन और विकेन्द्रित व्यवस्था को उस दौर के कुछ लोगों ने जानबूझकर गलत साबित करने की कोशिश की. उनका ऐसा करने का मकसद था. वे जानते थे कि अगर विकेन्द्रित जीवन को विखंडित नहीं किया जाएगा तो अधिपत्य स्थापित करने में बहुत मुश्किल होगी. मसलन उस दौर में गांवों से तेजी से पलायन करने वाली अर्थव्यवस्था को स्वीकार किया गया और उसे बढ़ावा दिया गया.  उसी दौर में मशीनों को जानबूझकर हर कार्यक्षेत्र में दाखिल किया गया. बिजली जैसी मूलभूत सुविधा से लेकर संचार, स्वास्थ्य और दैनिक जरूरतों की दूसरी सभी जरूरतों को हमने मशीन के हाथों गिरवी रख दिया. हमारे घर, कार्यालय, सड़कें, गलियां, गाड़ियां सब जगह मशीनों का ही नियंत्रण है. हमारे बैंक एकाउण्ट, आर्थिक लेन-देन पर भी पूरी तरह से मशीनों का कब्जा है. मैं जानबूझकर कब्जा शब्द का प्रयोग कर रहा हूं क्योंकि अब ऐसा नहीं है कि इंसान मशीन का उपयोग करता है. मशीनें अब बैलगाड़ी युग में नहीं हैं. वे अपेक्षाकृत अधिक उन्नत अवस्था में हैं और उन्होंने अपनी बुद्धि विकसित कर ली है. अब वे अपने पासवर्ड बदलने से लेकर जरूरतों के निर्धारण तक का सारा फैसला खुद करती हैं. इसका सीधा असर इंसानों के ऊपर हो रहा है.</p>
<p>मसलन अब मेरी जरूरत एक क्रेडिट की है और वह क्रेडिट मेरे एकाउण्ट में मौजूद है तो भी वह क्रेडिट तब तक हासिल नहीं कर सकता जब तक कि मशीन इसकी अनुमति न दे. किसी नागरिक को एक क्रेडिट (यह इस समय की अंतराष्ट्रीय मुद्रा का नाम है) पाने के लिए उसके बहुत सारे पहलुओं की मशीन द्वारा जांच की जाती है. उसमें सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह है कि आपके इस एक क्रेडिट के भुगतान से अंततः पर्यावरण पर क्या प्रभाव पड़ेगा. अगर मेरे एक क्रेडिट के संभावित खर्च से पर्यावरण पर नकारात्मक प्रभाव पड़ने की संभावना दिखती है तो बैंक हमें वह एक क्रेडिट देने से मना कर देता है. बैंक कई सारे पहलुओं पर जांच करता है, हमारे खर्चे के पैटर्न की जांच करता है, हमारी नागरिकता और देश को अंतरराष्ट्रीय बिरादरी में मिले क्रेडिट की जांच करता है तथा देश के पर्यावरण खाते में उपलब्ध क्रेडिट तथा नागरिकों की कुल संख्या का अनुपात निकालकर उस दिन के साथ गणना करता है फिर वह तय करता है कि वह एक क्रेडिट मुझे मिल सकता है या नहीं. कई बार तो ऐसा होता है कि एक सिगरेट पीने के लिए तीन-तीन दिन का इंतजार करना पड़ता है क्योंकि मशीनों की गणना में अगर उस दिन वातावरण में कार्बन का उत्सर्जन मेरे एक सिगरेट पीने से निर्धारित सीमा से बढ़ता है तो वह मुझे सिगरेट का क्रेडिट नहीं देता है और हमें मजबूरन सिगरेट पीने के लिए वातावरण में उपलब्ध कार्बन उत्सर्जन के मानक को पूरा करने के लिए बाध्य होना पड़ता है. क्योंकि हम हम जिस देश में रहते हैं उसने पहले ही अंतरराष्ट्रीय बिरादरी में अपने हिस्से का क्रेडिट संप्रभु देशों को बेचकर आर्थिक सहायता हासिल कर ली है और अब हमारे हिस्से का क्रेडिट दुनिया के कुछ संप्रभु देश इस्तेमाल करते हैं. (जारी)</p>

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		<title>इंटरनेट मुक्ति का माध्यम है और यह मौत के बाद मिलेगी</title>
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		<pubDate>Fri, 13 Mar 2009 20:50:36 +0000</pubDate>
		<dc:creator>संजय तिवारी</dc:creator>
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		<description><![CDATA[ब्लाग बनाना अब बहुत आसान काम है. वेबसाईट बनाना भी कोई मुश्किल काम नहीं है. हिन्दी में काम करना और लिखना भी बहुत आसान है. सब आसान है तो फिर मुश्किल क्या है? कोई शक नहीं कि अभी इंटरनेट का विस्तार अपनी शुरूआती अवस्था में है. कुल छह करोड़ उपभोक्ताओं की जमात में कितनी जमा [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p>ब्लाग बनाना अब बहुत आसान काम है. वेबसाईट बनाना भी कोई मुश्किल काम नहीं है. हिन्दी में काम करना और लिखना भी बहुत आसान है. सब आसान है तो फिर मुश्किल क्या है? कोई शक नहीं कि अभी इंटरनेट का विस्तार अपनी शुरूआती अवस्था में है. कुल छह करोड़ उपभोक्ताओं की जमात में कितनी जमा हमारी हिन्दी के पास हैं कहना मुश्किल है. फिर भी ज्यादा तो नहीं है. लेकिन इधर एक साल में छलांग बहुत ऊंची लग गयी है. यह छलांग दो तरह से लगी है.</p>
<p>लेखकों ने ब्लाग बनाने की परिपाटी शुरू कर दी है. हर लेखक का एक ब्लाग तो होना ही चाहिए. इसका फायदा यह है कि हिन्दी की सामग्री इंटरनेट पर बढ़ रही है और सामग्री पर घरानों का वर्चस्व टूट रहा है. अब आपको लिखने के लिए सिर्फ प्रतिभा और एक अदद ब्लाग चाहिए. पढ़ने वाले कहीं न कहीं से आ ही जाते हैं. कह सकते हैं कि लेखकों के लिए मुक्ति का रास्ता मिल गया है. थोड़े दिनों पहले तक मैं भी यही सोचता था. लेकिन अब बार बार मन में सवाल आता है कि यह मुक्ति का रास्ता क्या मौत से होकर गुजरता है?</p>
<p>सवाल यह है कि गूगल और लेखकों के बीच जो छोटे खिलाड़ी बच जाते हैं वे क्या करेंगे? सबके लिए गूगल होना संभव नहीं है. तो क्या हम उम्मीद करें कि इंटरनेट की दुनिया के मंझोले खिलाड़ी भी किसी दिन अपना ब्लाग लिखते नजर आयेंगे? शायद हां, शायद ना.</p>
<p>हां इसलिए क्योंकि भविष्य में मीडिया का स्वरूप पूरी तरह से बदल जाएगा. भविष्य में मीडिया के बिचौलिये गायब हो जाएंगे. मसलन, लालकृष्ण आडवाणी ने अपनी वेबसाईट बनाकर संकेत दे दिया कि वे मीडिया उद्योग में सीधे हस्तक्षेप कर रहे हैं. आज आडवाणी की वेबसाईट जिस प्रसिद्धि पर है वह चाहे तो विज्ञापनों से बेहतर कमाई कर सकती है. लेकिन क्या आडवाणी ने साईट बनाकर गलती की है? मुझे लगता है उन्होंने बहुत बड़ी गलती की है. क्योंकि जो काम एक पूरा समूह उनके लिए करता वह उन्होंने सीधे करना शुरू कर दिया तो समूह ने उनकी गतिविधियों से अपनी नजर फेर ली. अब वे भी एक पक्ष होकर रह गये हैं.</p>
<p>सीधे संवाद का यह नया जरिया इंटरनेट मुक्ति का अहसास कराता है. वह पहुंच को सीधे आपके हाथ में सौंप देता है. आप जिनके बीच जाना चाहते हैं वह आपके सामने आ जाता है. फिर दुनिया में कुछ बड़े मीडिया हाउस होंगे जिनका विस्तार और प्रभाव वैश्विक होगा. उन्हीं के प्रभाव और पहुंच में व्यक्तिगत लेखक ब्लाग या वेबसाईट बनाकर अपनी कला और समझ को लोगों के सामने रखेंगे. इसकी शुरूआत हो गयी है.</p>
<p>अगर ऐसा होता है तो यह किसके लिए फायदेमंद और किसके लिए नुकसानदेह होगा? हिन्दी में ही अगले दस साल में एक करोड़ वेबसाईट बनने की पूरी संभावना है. कोई आठ-दस करोड़ ब्लाग भी बन जाएंगे. तो? उसके बाद मीडिया का जो नया स्वरूप उभरेगा क्या उसमें नये तरह के बिचौलियों का जन्म नहीं होगा? क्या भविष्य में ग्रुप और समूह प्रासंगिक नहीं रहेंगे? क्या एक बड़े सर्च इंजन और निजी ब्लाग वेबसाईट के बीच किसी दूसरे के लिए कोई जगह नहीं होगी? संभावना का सूत्र यहीं छिपा हुआ है. पता नहीं क्या होगा यह तो अभी से नहीं कहा जा सकता. लेकिन व्यक्तिगत स्तर पर अगर इंटरनेट मुक्ति का मार्ग है तो यह मौत के बाद ही मिलेगी. जो सफल होना चाहते हैं उन्हें समूह के स्तर पर सोचना होगा. अन्यथा जिस काम को आप अपने लिए आधार बना सकते थे वह मुफ्त में बह जाएगा. फिलहाल तो इंटरनेट उत्साही (जैसे मैं खुद) लोगों के लिए मुक्ति का रास्ता दिखाता नजर आता है लेकिन ऐसा लगता है धन किसी न किसी दिन यहां भी भारी पड़ जाएगा और उत्साह दुम दबाकर निकल लेगा. फिर, वही दुनिया होगी और बिचौलिए एक बार पूंजी के सहारे अपना वर्चस्व कामय कर लेंगे.</p>
<p>तो क्या जो क्षणिक मुक्ति का उत्सव मना रहे हैं वह उनका मौत महोत्सव है? या फिर नये मीडिया घरानों का उभार हो रहा है? सोच रहा हूं, किसी नतीजे पर नहीं पहुंचा हूं. कहीं पहुंचा तो आपसे बाटूंगा जरूर.</p>

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		<title>संतोषः परमो लाभः सत्संगः परमा गतिः</title>
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		<pubDate>Sat, 26 Apr 2008 02:13:00 +0000</pubDate>
		<dc:creator>संजय तिवारी</dc:creator>
				<category><![CDATA[दुनिया मेरे आगे]]></category>
		<category><![CDATA[दरिया लहर समाय]]></category>

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		<description><![CDATA[योगवशिष्ठ मेरा प्रिय ग्रंथ है. वैसे ही जैसे रामचरित मानस, कबीर के दोहे या फिर सुखमनी साहिब.  श्रीमद्भगवगीता बहुत बौद्धिक ग्रंन्थ है. मैं पढ़ता जरूर हूं लेकिन उस अपनेपन के साथ नहीं जैसे रामचरितमानस या फिर सुखमनी साहिब को. श्रीमद्भगवतगीता में बुद्धि विलास और तार्किक विश्लेषण ज्यादा है. गीता में भाव का सिरे से [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p>योगवशिष्ठ मेरा प्रिय ग्रंथ है. वैसे ही जैसे रामचरित मानस, कबीर के दोहे या फिर सुखमनी साहिब.  श्रीमद्भगवगीता बहुत बौद्धिक ग्रंन्थ है. मैं पढ़ता जरूर हूं लेकिन उस अपनेपन के साथ नहीं जैसे रामचरितमानस या फिर सुखमनी साहिब को. श्रीमद्भगवतगीता में बुद्धि विलास और तार्किक विश्लेषण ज्यादा है. गीता में भाव का सिरे से ही अभाव है.  अब क्योंकि मैं खुद बुद्धिवादी नहीं हूं इसलिए भी हो सकता है कि गीता में मेरी कोई खास रूचि न हो.</p>
<p>योगवशिष्ठ भाव के साथ सत्य का बहुत तार्किक विश्लेषण करता है. तर्क और भाव दोनों एक साथ योगवशिष्ठ में ही संभव है. और ग्रंथों में यह कहां-कहां है मुझे नहीं मालूम. लेकिन तुलनात्मकरूप से योगवशिष्ठ भगवद्गीता से प्रिय है. क्योंकि यह तर्कबुद्धि का युग है और बहुत सारे बाबाओं ने सत्य को कहने के लिए भगवद्गीता को ही सहारा बनाया इसलिए हमलोग उस ग्रंथ के बारे में ज्यादा जानते हैं.  अब तो लोग हिन्दुओं के पवित्र ग्रंथ के बारे में बताना हो तो श्रीमद्भगवतगीता का नाम वैसे ही लेते हैं जैसे ईसाई बाईबिल या फिर मुसलमान के लिए कुरान का नाम लिया जाता है.  हिन्दुओं ने भी गीता को अपना प्रतिनिधि ग्रंथ मान लिया है.</p>
<p>जबकि यह धारणा ही गलत है कि कभी मनुष्य  का कोई प्रतिनिधि ग्रंथ हो सकता है.  असल में तो किताबें भी बाधा ही होती हैं. किताब कुछ संकेत करती हैं और हम किताब पकड़कर बैठ जाते हैं. यह किताबों के साथ सबसे बड़ी बाधा है. फिर किताब पढ़नेवाला सूक्ष्म अहंकार में चला जाता है कि मैंने यह किताब पढ़ी है. क्यों पढ़ा, किताब क्या कहती है यह तो भूल ही गये किताब याद रह गयी. और बुरे में बुरा यह कि उन बातों से प्रयोग ही नहीं किये जिन प्रयोगों के कारण किसी किताब का जन्म होता है.</p>
<p>किताबी ज्ञान बंधन होता है. वह जो सोचा क्या वह लिखा गया? क्या उसे उसके भावों के अनुसार शब्द मिल सके जो उन भावों का प्रतिनिधित्व कर सकें जब आप वह किताब पढ़ें तो. इसलिए मुझे सुखमनी साहिब, कबीर, दादू, बुल्लेशाह ज्यादा प्रिय लगते हैं. वे जो कहते हैं वे बुद्धिवादी तर्क नहीं होते. वह तो रसायनवर्षा करते हैं. यहां होने की बात नहीं करनी है. यहां होना ही है. तर्कों के आडंबर से समझदारी नहीं बनानी है. समझ ही हो जाना है.</p>
<p>इसलिए योगवशिष्ठ मुझे प्रिय है. कल रात में यह श्लोक बहुत प्रिय लगा जिसका मैं यहा उल्लेख कर रहा हूं. वशिष्ठ जी राम से कहते हैं-</p>
<p>संतोषः परमो लाभः सत्संगः परमा गतिः<br />विचारः परमं ज्ञानं शमो हि परमं सुखम्।।</p>
<p>असल धन या लाभ है संतोष. उस समय आप उच्चतर अवस्था में होते हैं जब आप सत्संग में होते हैं. सदविचार ही परम ज्ञान है इंद्रियभोगों से अनासक्ति परम सुख. इसमें संतोष, सत्संग, सदविचार के साथ-साथ जो क्रांतिकारी बात कही गयी है वह यह कि इंद्रियभोगों से अनासक्ति ही परमसुख है.  मैं इस निष्कर्ष पर पहुंचता हूं वह धन न कमाएं जो संतोष तक न पहुंचाता हो, उन लोगों की संगति न करें परमगति में बाधा बनते हों, वैसे विचारों का साथ छोड़ देना चाहिए जो सत्य के मार्ग में बाधा बनते हों और उन इंद्रियभोग कल्पनाओं से मुक्ति पा लेनी चाहिए जिन्हें अभी तक हम सुख समझते रहे हैं. तभी परम लाभ, परमगति, परमज्ञान और परम सुख को उपलब्ध हो सकेंगे.</p>

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		<title>आत्मा का प्रकृति के साथ महासंभोग</title>
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		<pubDate>Wed, 09 Apr 2008 23:59:00 +0000</pubDate>
		<dc:creator>संजय तिवारी</dc:creator>
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		<category><![CDATA[दरिया लहर समाय]]></category>

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		<description><![CDATA[विद्वान होने के लिए बहुत सारे लोग 33 करोड़ देवी-देवता को मिथक साबित करके भारत और भारतीयता का मजाक उड़ाते हैं. लेकिन शायद ही किसी विद्वान ने इसके बारे में समझने की कोशिश की हो कि समाज में ऐसे प्रतीक आखिर गढ़े क्यों जाते हैं? आखिर वह कौन सी समझ है जो समाज को शासन [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p>विद्वान होने के लिए बहुत सारे लोग 33 करोड़ देवी-देवता को मिथक साबित करके भारत और भारतीयता का मजाक उड़ाते हैं. लेकिन शायद ही किसी विद्वान ने इसके बारे में समझने की कोशिश की हो कि समाज में ऐसे प्रतीक आखिर गढ़े क्यों जाते हैं? आखिर वह कौन सी समझ है जो समाज को शासन के तंत्र में नहीं बांधती बल्कि धर्म के अनुशासन में रहने को प्रेरित करती हैं. यह समझ में आये तो यह भी समझ में आयेगा कि भारत में जो धर्म प्रतीक गढ़े गये हैं वे किसी सिद्ध के दर्शन का परिणाम हैं. वे कुछ संकेत कर रहे हैं जो बुद्धि की पकड़ के बाहर है. इसलिए श्रद्धा और विश्वास की परंपरा साथ में जोड़ दी गयी है.</p>
<p>असल में भारत और भारतीयता दोनों ही गूंगे का गुड़ हैं. यह सीधे समझ में आती है. और आप जीने लगते हैं किसी परिभाषा वगैरह की बहुत जरूरत होती नहीं है. तर्क की तो बिल्कुल नहीं. जो करे, वह मरे.</p>
<p>शिवलिंग के बारे में थोड़ा बोलता हूं. शिवलिंग सृष्टि के उद्भव का संकेत है. सूत्र है. योनि में लिंग की स्थापना कोई पोर्नोग्राफिक उत्तेजना पैदा करने के लिए नहीं है. आप ध्यान से शिवलिंग देखिए. वह योनी में स्थापित होता है. कह सकते हैं वह महामैथुन है. आत्मा का प्रकृति के साथ महासंभोग. यह महासंभोग केवल बाहर नहीं है. यह हमारे अंदर भी है. तंत्र में इसे आंतरिक मैथुन कहा गया है.</p>
<p>असल में हम सबके दो भाव हैं. स्त्रीभाव भी और पुरूषभाव भी. हर स्त्री थोड़ी मात्रा में पुरूष होती है और हर पुरूष थोड़ी मात्रा में स्त्री होता है. यह कहने की बात नहीं है. यह सब समझते हैं. आप अपने आप को देखेंगे तो समझ में आ ही जाता है. ये दो भाव दो ध्रुव बनाते हैं. इन दोनों ध्रुवों का जो मध्यमिलन होता है वह हुआ मैथुन. जहां दोनों ध्रुव आकर टूट जाते हैं. एक दूसरे में इस तरह समाहित हो जाते हैं कि द्रष्टा बन जाते हैं. दोनों नहीं रहते. एक ही रहता है. जब मिलते हैं तभी समझ में आता है कि कभी दो थे ही नहीं.</p>
<p>शिवलिंग का संकेत इसी ओर है. प्रकृति और हम कभी दो है हीं नहीं. इसलिए पंचमहाभूत का सिद्धांत कहता है कि स्थूल में पांच तत्व मिलकर इस शरीर की रचना करते हैं जिनका आत्मा से संयोग होता है तो जीव हो जाता है. वियोग हुआ तो मर्त्य हो जाता है. तुलसीदास ने इन पंचमहाभूत के बारे में बड़ी सरलता से रामचरित मानस में लिखा हैः क्षिति,जल,पावक, गगन समीरा।पंच रचित यह अधम शरीरा।।</p>
<p>लेकिन शिवलिंग पर यह सांप क्यों है भला? मैं तो कुछ नहीं कहता लेकिन आप थोड़ा भारतीय जीवन दर्शन में व्याप्त माया के सिद्धांत के बारे में सोचिए. और यह भी सोचिए कि काल को सांप से क्यों परिभाषित किया गया है? फिर इन दो बातों को मिला दीजिए. इसके बाद जो पूरी तस्वीर बनती है वह यह कि प्रकृति और आत्मा के संयोग से सृष्टि (जीवन) का अस्तित्व आता है जिसे मायारूपी काल घेरकर बैठा रहता है.</p>
<p>तो अगली बार आप किसी शिवलिंग को शीश झुकाएं तो इस बात का ख्याल रखें कि आपकी श्रद्धा अंधी नहीं है. असल में आप सबसे परिष्कृत विज्ञान को समझने की कोशिश कर रहे हैं. बस.</p>

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		<pubDate>Fri, 18 Jan 2008 23:37:00 +0000</pubDate>
		<dc:creator>संजय तिवारी</dc:creator>
				<category><![CDATA[दुनिया मेरे आगे]]></category>
		<category><![CDATA[रिपोर्ट]]></category>

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			<content:encoded><![CDATA[<p>यह आपकी भावनाओं के उद्दीपन के लिए किसी कहानीकार द्वारा लिखा गया कोई वाक्य नहीं है. यह पिंटू का इकबालिया बयान है और बुंदेलखण्ड की भयावह हकीकत भी. जब पिंटू से यह बातचीत हो रही थी उसी समय मायावती अपने जन्मदिन पर भारी-भरकम केक काट रही थीं. भरे पेट उन्होंने एक भारी-भरकम ऐलान भी कर दिया था कि बुंदेलखण्ड को एक अलग राज्य बनाया जाएगा लेकिन पिंटू को इन बातों से मतलब होना भी नहीं चाहिए, और है भी नहीं. उसे नहीं पता कि दिल्ली में कोई सरकार होती है जो कुछ योजनाएं वगैरह भी बनाती रहती है. उसे तो बस इतना ही पता है भैया दिल्ली गया है पैसा भेजेगा तो खाने का कुछ इंतजाम हो जाएगा.
<p style="border-top:#ff041c 7px solid;font-weight:bold;font-size:13pt;float:right;padding-bottom:7px;width:200px;line-height:120%;padding-top:7px;border-bottom:#ff041c 7px solid;text-align:center;margin:10px;">शाम होते ही वह भयभीत होने लगता है, क्योंकि ठंड से बचने के लिए उसके पास न ऊनी कपड़े हैं और न ही रजाई. जाड़े से निपटने के लिए उसने अरहर के डंठियों और भूसी पर बोरा बिछाकर बिस्तर तैयार कर लिया है.ऊपर से पालिथीन ओढ़ लेता है. जाड़ा कम लगे इसलिए उसने पोलीथीन में कपड़े ठूस रखे हैं. फिर भी बात बनती नहीं. पिंटू बताता है&#8221; जाड़ा बहुत लगता है लेकिन ओढ़ने के लिए रजाई नहीं है.&#8221;</p>
<p>उरई से राठ की तरफ निकलते ही भूखे-सूखे बुंदेलखण्ड की भयावह तस्वीर सामने आ जाती है. भूख, भुखमरी, खुदकुशी और पलायन यही यहां का यथार्थ है. महोबा स्टेशन पर जाईए और पता करिए तो आपको पता चलेगा कि पिछले महीने दूसरे दर्जे के डेढ़ लाख टिकट बिके हैं और वे सारे दिल्ली के हैं. यही हाल झांसी और उरई का है. अंदाजन हर महीने एक लाख किसान शहरों की ओर पलायन कर रहे हैं.</p>
<p>राठ से आगे बढ़ने पर जहां पिंटू मिला था उसी मोहाना गांव में उपेन्द्र मिला. आज वह स्कूल नहीं गया था इसलिए खाने को कुछ नहीं मिला. उसने बताया &#8220;सुबह से सिर्फ दो बिलावा (तिल के लड्डू) खाने को मिला है. स्कूल में आज छुट्टी है नहीं तो आधी रोटी मिल जाती. वहां कभी-कभी चावल और सब्जी भी मिलती है.&#8221; यह पूछने पर कि क्या उसका पेट भरता है वह इंकार में सिर हिला देता है. गांव के ज्यादातर घरों में स्थाई रूप से ताला लग गया है. जिगनी गांव की आबादी वैसे तो पांच हजार है लेकिन इस गांव में अब केवल बारह सौ लोग ही बचे हैं. लगातार लोग पलायन कर रहे हैं क्योंकि इंद्रदेव की नाराजगी और ठेकेदारों की वसूली दोनों ही उन्हें इसके लिए मजबूर कर रही है.</p>
<p>कर्जों की वसूली के नाम पर खेत के खेत बंधक बनाए जा रहे हैं. सिकरी व्यास गांव में पूरे गांव की जमीन गिरवी है. रंजीत सिंह परिहार इसी गांव के निवासी हैं और 200 बीघे के काश्तकार हैं. दो सौ बीघे का काश्तकार यहां बड़ा जमींदार माना जाता है लेकिन उनकी हालत यह है कि कोई आ जाए तो चाय का जुगाड़ करना पड़ता है. दो सौ बीघे काश्तकार हैं और बड़े भाई नासिक में 2600 रूपये महीने पर मजदूरी करते हैं. भतीजा वाटर टैंकर का ड्राईवर है.</p>
<p>टिमरी गांव के शिवेन्द्र यादव ने कहा कि सब भगवान भरोसे है. पचास बीघा खेत है. पर फसल एक बीघे में भी नहीं होती. खेतों पर नजर डालें तो कहीं-कहीं पीले पड़ चुकी धान की फसलें नजर आती हैं जो महीना बीतने के साथ ही दम तोड़ देंगी. आखिर ऐसा क्या हो गया है बुंदेलखण्ड भूखे-सूखे का शिकार होता जा रहा है?</p>
<p><span style="font-size:130%;">यहां पानी नहीं है</span><br />गरीबी अचानक नहीं आती. आने के पहले वह पृष्ठभूमि तैयार करती है. यहां भी ऐसा ही हुआ है. वर्षों से धीरे-धीरे पानी ने यहां का साथ छोड़ दिया है और पिछले चार साल से तो अकाल ने स्थाई डेरा बसा लिया है. केवल आदमी के पेट ही रसातल में नहीं धंसे हैं धरती का पेट भी रसातल को जा पहुंचा है. पानी आदमी की पहुंच से बाहर हो गया है. बेतवा भी आंसू की मानिंद सिसकते हुए बह रही है. लेकिन सरकार मानती है कि यहां बाढ़ आ सकती है. इसलिए बाढ़ पूर्वानुमान मुश्तैदी से काम कर रहा है. उसके दफ्तर में आधा दर्जन<br />
 कर्मचारी हैं. प्रदेश सरकार का एक महकमा लघु सिचाईं विभाग अब बोरिंग करने नहीं होने देगा क्योंकि यह पैसे की बर्बादी होगी. आखिर कहां तक बोरिंग करें? पानी तो तलहटी में जा बैठा है.</p>
<p>सर्दियों का मौसम है और भूखे पेट सर्दी कुछ ज्यादा ही लगती है. पिंटू जाड़े को इन्ज्वाय करने की योजनाओं पर काम नहीं करता. वह तो शाम होते ही भयभीत होने लगता है, क्योंकि उसके पास न ऊनी कपड़े हैं और न ही रजाई. फिलहाल जाड़े से निपटने के लिए उसने जो इंतजाम किया है उससे बात बनती नहीं. अरहर के डंठियों और भूसी पर बोरा बिछाकर ऊपर से पालिथीन ओढ़ लेता है. जाड़ा कम लगे इसलिए उसने पोलीथीन में कपड़े ठूस रखे हैं. पिंटू बताता है&#8221; जाड़ा बहुत लगता है लेकिन ओढ़ने के लिए रजाई नहीं है.&#8221; विकास की हमारी बौद्धिक बहस के बीच फिलहाल पिंटू इस जाड़े में ठिठुरने को मजबूर है.
<div align="right"><strong>अंबरीश कुमार,</strong> बुंदेलखण्ड से</div>
<div align="right">(यह रिपोर्ट आज जनसत्ता में भी प्रकाशित हुई है.)</div>

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