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	<title>visfot.blog &#187; बात करामात</title>
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		<title>भाजपा नेताओं का मक्काः झंडेवालान</title>
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		<pubDate>Fri, 28 Aug 2009 22:45:58 +0000</pubDate>
		<dc:creator>संजय तिवारी</dc:creator>
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		<description><![CDATA[संघ का दिल्ली कार्यालय राजनीतिक गतिविधियों का गहरा अड्डा बन चुका है. जब से केन्द्र में अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार आयी संघ कार्यालय पर लाल बत्तियों की आवाजाही बढ़ गयी. इसका असर यह हुआ कि रानी झांसी रोड पर इस लंबे चौड़े भूखण्ड पर सरगर्मियां बढ़ गयी हैं. पिछले दस सालों से यहां सुरक्षाकर्मी [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p>संघ का दिल्ली कार्यालय राजनीतिक गतिविधियों का गहरा अड्डा बन चुका है. जब से केन्द्र में अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार आयी संघ कार्यालय पर लाल बत्तियों की आवाजाही बढ़ गयी. इसका असर यह हुआ कि रानी झांसी रोड पर इस लंबे चौड़े भूखण्ड पर सरगर्मियां बढ़ गयी हैं. पिछले दस सालों से यहां सुरक्षाकर्मी भी तैनात हैं जो स्वयंसेवकों की डंडा सुरक्षा से अलग बाकायदा मेटल डिटेक्टर लगाकर जांच पड़ताल करते हैं. शुरूआत में थोड़ा विरोध जरूर हुआ था लेकिन बाद में संघ के स्वयंसेवक भी इस सुरक्षा के अभ्यस्त हो गये.</p>
<p>इसी संघ कार्यालय पर शुक्रवार को मोहनराव भागवत ने प्रेस कांफ्रेस आयोजित की. जो प्रेस रिलीज बांटी गयी या फिर जो कुछ शुरूआत में उन्होंने कहा उसमें से एक लाईन भी कहीं खबर नहीं बनी. बनती भी क्यों किसी संघ के विकास से देश की मुख्यधारा को क्या लेना लादना है? जब बात शुरू हुई तो घूम-फिरकर हर कोई संघ भाजपा संबंधों पर पूछता और मोहनराव भागवत बड़ी चालाकी से उत्तर देने से बच जाते. लगभग एक घण्टे की प्रेस कांफ्रेस में उन्होंने एक ही बात काम की कही कि संघ में जो तय हुआ है भाजपा को वही अमल में लाना होगा. अब क्या तय हुआ है और भाजपा को क्या अमल में लाना है यह तो संघ जाने और भाजपा वाले जानें लेकिन भाजपाईयों के इस मक्का से समय समय पर चुपचाप फतवे तो निकलते ही रहते हैं.</p>
<p>जब तक वाजपेयी प्रभावी रहे उन्होने इस मक्का को मक्के की रोटी का भाव भी नहीं दिया. खुद वाजपेयी कभी संघ कार्यालय नहीं आये और जब भी संघ भाजपा के बीच बात करनी हुई तो संघ के सरसंघचालक को ही घर बुला लिया. इसके कूटनीतिक संकेत विजय वाले थे. वाजपेयी के छह साल के शासनकाल में संघ कभी उनके खिलाफ मुखर नहीं हुआ लेकिन जब यही चाल आडवाणी ने खेलनी शुरू की तो उनको बहुत भारी पड़ गया. वाजपेयी की ही तर्ज पर आडवाणी ने उन्हीं सुधीन्द्र कुलकर्णी और कुछ अन्य नेताओं को साथ मिलाकर अपना गुट बनाना चाहा तो मक्का ने फतवा जारी कर दिया कि अब आप रास्ता छोड़ दें.</p>
<p>भाजपा के लोग लाख कहें कि संघ उनकी राजनीति में सिर्फ मार्गदर्शक की भूमिका में रहता है या फिर संघ लाख कहे कि वह भाजपा को सिर्फ सलाह देता है, लेकिन सच्चाई यह है कि भाजपा फुल टाईम संघ का पेड राजनीतिक वर्कर है तो संघ फुल टाईम सिर्फ भाजपा के कामकाज के बारे में ही सोचता रहता है. संघ में अब शायद ही कोई कार्यकर्ता हो जो भाजपा में दखल देना अपना अधिकार न समझता हो. जैसे ऋषिकेश के सन्यासी की कीमत तब होती है जब उसे कोई एक विदेशी भक्त मिल जाता है वैसे ही संघ में उस कार्यकर्ता की अहमियत अपने आप बढ़ जाती है जिसके आगे पीछे भाजपा के नेता टहलते हों. इसका सबसे बड़ा प्रमाण खुद भागवत की प्रेस कांफ्रेस है जिसमें सैकड़ों पत्रकार, दर्जनों टीवी चैनल के लोग सिर्फ इसलिए ही तो आये क्योंकि वे भाजपा के बारे में कुछ बोलेंगे.</p>
<p>खैर, जब तक भाजपा है तब तक इस मक्का की अहमियत खत्म नहीं होगी. यह हर भाजपाई जानता है.</p>

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		<title>पीने का पानी</title>
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		<pubDate>Thu, 27 Aug 2009 12:44:20 +0000</pubDate>
		<dc:creator>संजय तिवारी</dc:creator>
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		<description><![CDATA[पीने का पानी. इस एक शब्द में क्या अतिश्योक्ति है? अगर कोई आपसे पूछे कि इस एक शब्द में आपत्तिजनक क्या है तो आप क्या कहेंगे? निश्चित रूप से इसमें आपत्तिजनक कुछ भी नहीं है. पानी होता ही है पीने के लिए. फिर इसमें आपत्तिजनक क्या हो सकता है? फिर भी वह आपसे पूछे कि [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p>पीने का पानी. इस एक शब्द में क्या अतिश्योक्ति है? अगर कोई आपसे पूछे कि इस एक शब्द में आपत्तिजनक क्या है तो आप क्या कहेंगे? निश्चित रूप से इसमें आपत्तिजनक कुछ भी नहीं है. पानी होता ही है पीने के लिए. फिर इसमें आपत्तिजनक क्या हो सकता है? फिर भी वह आपसे पूछे कि नहीं इसमें कुछ आपत्तिजनक है तो फिर आप क्या कहेंगे?</p>
<p>पीने का पानी और नहाने का पानी, कपड़ा धोने का पानी और शौचालय का पानी, गाड़ी धोने का पानी और बगिया सींचने का पानी ये सब पानी अलग अलग हो गये हैं. लेकिन क्या पानी अलग अलग हो सकता है? पानी तो सिर्फ पानी ही होता है फिर वह अलग अलग कैसे हो गया?</p>
<p>पानी से पानी का यह अलगाव मनुष्य के विकासनामा से आया है. दुनियाभर में औद्योगिक उत्पादन की जो सोच पिछले ढाई तीन सौ सालों से काम कर रही है उसका परिणाम है कि पंच महाभूत यानी पर्यावरण के पांच अनिवार्य तत्व बुरी तरह से प्रभावित हुए हैं. पानी, हवा और धरती तीनों ही प्रदूषित हुए हैं. अग्नि और आकाश की बात इसमें इसलिए नहीं जोड़ रहे हैं क्योकिं इनका प्रयोजन भौतिक नहीं बल्कि अधिभौतिक है. प्रदूषण तो आकाश तत्व में भी आया है लेकिन इसके प्रदूषण का लेबल नापने का हमारे पास कोई यंत्र नहीं है. रही बात अग्नि की तो वह प्रदूषित हो नहीं सकती क्योंकि वह समस्त प्रकार के दोषों का निवारण करती है. अपने यंत्रों से हम पानी, हवा और धरती के प्रदूषण को नाप सकते हैं इसलिए इन तीनों की ही बात करते हैं.</p>
<p>दो कौड़ी की औद्योगिक सोच होते हुए भी उसने पूरी दुिनया को ऐसा गिरफ्त में लिया हुआ है कि कोई इसके खिलाफ बोलकर पिछड़ा होना नहीं चाहता. इसी औद्योगिक सोच ने धरती, पानी और हवा की हवा निकाल दी है. धरती तेजी से बंजर हो रही है, पानी तेजी से प्रदूषित हो रहा है और हवा तेजी से प्रदूषित हो रही है. फिर भी पागलपन देखिए कि कोई भी औद्योगीकरण के इस रास्ते से पीछे नहीं हटना चाहता. पानी का बंटवारा भी इसी औद्योगिक सोच का परिणाम है.</p>
<p>परंपरागत समाज में प्राकृतिक पदार्थ का बंटवारा नहीं किया जाता. वह सबके लिए समान रूप से और पूरी पवित्रता में उपलब्ध होता है. दुिनया में जो लोग भाईचारा कायम करने की कोशिश कर रहे हैं अगर वे दुनिया के प्राकृतिक संसाधनों की पवित्रता और समान उपलब्धता सुनिश्चित कर सकें तो इस दुनिया से वैमनस्य अपने आप खत्म हो जाएगा. अगर सबके लिए समान रूप से प्राकृतिक संसाधन उपलब्ध होगा तो भला झगड़ा किस बात का है?</p>
<p>अपने यहां भी पानी का बंटवारा तो करते हैं लेकिन वह बंटवारा दूषित और स्वच्छ का बंटवारा नहीं है. वह बंटवारा शीतल और उष्ण का हो सकता है, वह बंटवारा मीठे और खारे का हो सकता है, वह बंटवारा अम्लीय और क्षारे का हो सकता है लेकिन दूषित और स्वच्छ पानी का बंटवारा तो कहीं है ही नहीं. मसलन देश में कुल 49 तरह की बयार (हवा) बहती है लेकिन उसमें भी कोई बंटवारा नहीं है बल्कि मौसम को समझने की कला छिपी हुई है.</p>
<p>अब सोचिए, पीने का पानी शब्द में क्या आपत्तिजनक है?</p>

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		<title>फिर अविनाश डाल पर</title>
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		<pubDate>Sat, 28 Mar 2009 12:40:54 +0000</pubDate>
		<dc:creator>संजय तिवारी</dc:creator>
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		<description><![CDATA[हिन्दी ब्लाग मोहल्ला के माडरेटर अविनाश दिल्ली लौट आये हैं. अविनाश से अपना परिचय ज्यादा पुराना नहीं है. जब ब्लाग जगत में आया तो मोहल्ला ब्लाग ने आकर्षित किया था. इसका कारण यह था कि शुरूआती दिनों में ही स्तरीय सामग्री का ब्लाग लगा. उसकी वैचारिक बाध्यता अलग लेकिन सामग्री का चयन उम्दा होता था. [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p>हिन्दी ब्लाग मोहल्ला के माडरेटर अविनाश दिल्ली लौट आये हैं. अविनाश से अपना परिचय ज्यादा पुराना नहीं है. जब ब्लाग जगत में आया तो मोहल्ला ब्लाग ने आकर्षित किया था. इसका कारण यह था कि शुरूआती दिनों में ही स्तरीय सामग्री का ब्लाग लगा. उसकी वैचारिक बाध्यता अलग लेकिन सामग्री का चयन उम्दा होता था. फिर अविनाश से मुलाकात हुई ब्लागवाणी चलानेवाले मैथिली जी के आफिस में. साफ बोलनेवाले आदमी लगे. थोड़ा आकर्षण बढ़ा. फिर एक दो बार हमारे दफ्तर में उनसे मुलाकात हुई.</p>
<p>यह वही समय था जब वे एनडीटीवी में थे. इसके बाद वे भास्कर गये. मैंने पूछा क्या हुआ तो उन्होंने कहा कि पदोन्नति संतोषजनक नहीं है इसलिए भास्कर जा रहे हैं, भोपाल. जब यह सब बात हुई तब तक उनके ब्लाग पर कुछ ऐतिहासिक विवाद हो चुके थे और बहुत सारे लोग उनके ब्लाग की गली छोड़कर जा चुके थे. क्योंकि मेरी कोई खास गिनती नहीं है इसलिए मेरे जाने का मोहल्ला पर कोई असर नहीं पड़ा. अविनाश से बात होती रही. मैं उन्हें समझता रहा, वे भी मुझे समझते रहे होंगे. खैर, वे भोपाल गये तो सिलसिला भी खत्म हो गया.</p>
<p>लेकिन अचानक एक दिन पता चला कि वे दिल्ली लौट आये हैं और चौथी दुनिया ने उन्हें अपने यहां रख लिया है. भोपाल में किसी लड़की के साथ जोर-जबर्दस्ती करने के आरोप में उन्हें भास्कर समूह ने अपने यहां से निकाल दिया था. मुझे खास तो पता नहीं है लेकिन दोनों तरह की बातें सुनने में आयी. एक, उनके खिलाफ षण्यंत्र हुआ और दूसरा नहीं अविनाश ने गलती की थी. जो भी हो कयास लगाने से ज्यादा कोई इस मामले में पक्के तौर पर कुछ कह नहीं सकता.</p>
<p>लेकिन चौथी दुनिया में अविनाश की खबर सुनी तो थोड़ा चौंका. थोड़ा चौंका ही नहीं सन्न रह गया. जिन्होंने मुझे यह बताया मैंने उनसे तो कुछ नहीं कहा लेकिन मुझे पता नहीं क्यों अच्छा नहीं लगा. ऐसा शायद इसलिए क्योंकि संयोग से चौथी दुनिया से थोड़ा मैं भी जुड़ा था और उसकी पत्रकारिता के बारे में एक-दो बार लिखा भी था. संतोष भारतीय से हुई मुलाकात में ऐसा लगा था कि वे पत्रकारिता में नया प्रयोग करने की जद्दोजहद कर रहे हैं. उनके साथ जुड़ा लेकिन मेरा स्वतंत्र स्वभाव और उनकी संस्थागत मजबूरियां दोनों के बीच कोई तालमेल नहीं बैठा. उनकी हर ईमानदार कोशिश मेरे स्वतंत्र स्वभाव के आड़े आ गयी. उन्होंने मुझे कहा कि तुम हर प्रकार से मेरे साथ जुड़ सकते हो लेकिन शायद नियति को हमारा जुड़ना मंजूर नहीं था और अबकी मेरा स्वास्थ्य ऐसा बिगड़ा कि एक बार फिर उनके साथ नहीं जुड़ पाये. खैर, मेरा जुड़ना न जुड़ना कोई मायने नहीं रखता.</p>
<p>लेकिन अविनाश चौथी दुनिया चले गये हैं यह सुनकर मुझे थोड़ी पीड़ा इसलिए भी हो रही है कि संतोष भारतीय ने मुझसे जो बातें कहीं थी कम से कम अविनाश उन बातों की कसौटी पर कहीं से खरे नहीं उतरते. एनडीटीवी और दैनिक भास्कर जैसे व्यावसायिक संस्थानों के साथ भी उनके संबंध मधुर नहीं रहे फिर संतोष भारतीय तो बड़ी नैतिक टाईप की पत्रकारिता करने की बात कर रहे थे. फिर उनको ले-देकर अविनाश का ही नाम क्यों मिला? इस सवाल का जवाब मेरे पास नहीं है. मैं उनके इस निर्णय पर सवाल भी नहीं उठा रहा हूं और मैं यह भी नहीं चाहता कि अविनाश बेरोजगार ही घूमते रहें. लेकिन चौथी दुनिया में अविनाश कौन सी पत्रकारिता करेंगे यह सोचता हूं अपने उस लिखे पर शर्म आती है जो मैंने चौथी दुनिया के बारे में कभी लिखा था.</p>
<p>जैसे व्यावसायिक कामों के लिए व्यावसायिक लोगों की जरूरत होती है वैसे ही नैतिक कामों के लिए नैतिक लोगों की जरूरत होती है. अविनाश प्रिंट की पत्रकारिता करने में सक्षम व्यक्ति हैं. हो सकता है कि संतोष भारतीय ने अपनी किसी मजबूरी के चलते उन्हें अपने साथ लिया हो लेकिन क्या अब भी संतोष भारतीय पत्रकारिता के दर्शन पर उतनी ही बेबाकी से बात कर पायेंगे जैसा उन्होंने पहली मुलाकात में की थी. मुझे लगता है कि अगर वे नैतिक आदमी हैं तो जरूर उन्हें थोड़ी झिझक होगी. नहीं तो दुनिया है, यहां सब कुछ चलता है.</p>
<p>अभी इतना ही, जरूरी हुआ तो कुछ और बातें भी लिखेंगे.</p>

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		<title>अभिव्यक्ति की चरम अवस्था</title>
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		<pubDate>Sat, 21 Mar 2009 08:20:24 +0000</pubDate>
		<dc:creator>संजय तिवारी</dc:creator>
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		<description><![CDATA[अभिव्यक्ति की चरम अवस्था क्या होती है? वह कितनी स्थूल या फिर कितनी सूक्ष्म होती है? आपको जानकर आश्चर्य होगा कि अभिव्यक्ति का चरम मौन होता है. अभिव्यक्ति का हर प्रकार चरम पर पहुंचकर मौन धारण कर लेता है. ध्वनि का सिद्धांत भी यही कहता है. जब हमारी ग्रहण क्षमता से ऊंचा शोर होता है [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p>अभिव्यक्ति की चरम अवस्था क्या होती है? वह कितनी स्थूल या फिर कितनी सूक्ष्म होती है? आपको जानकर आश्चर्य होगा कि अभिव्यक्ति का चरम मौन होता है. अभिव्यक्ति का हर प्रकार चरम पर पहुंचकर मौन धारण कर लेता है. ध्वनि का सिद्धांत भी यही कहता है. जब हमारी ग्रहण क्षमता से ऊंचा शोर होता है तो हमें सुनाई नहीं देता. यह प्रकृति की व्यवस्था है.</p>
<p>फिर चरम की अभिव्यक्ति तक हम जाते भी नहीं है. क्रोध और गुस्से का चरम है मौत. विनाश. हमें किसी दिन इतना गुस्सा आये कि हमारे दिमाग की नसें सुन्न हो जाएं, हृदय की धड़कने इतनी तेज हो जाएं कि रक्त वाहिनियों से खून फटकर बाहर निकल जाए. इतना गुस्सा आये तो शायद हम कह सकते हैं कि हम गुस्से के चरम तक पहुंचे हैं. क्या हमने कभी ऐसा गुस्सा किया है कि हमें मौत आ जाए?  अगर ऐसा गुस्सा नहीं किया है तो हमने क्रोध की चरम अभिव्यक्ति को नहीं जाना है. बाकी जो है वह बीच की बात है. सेफ्टी वाल्व. थोड़ा सा गुस्सा कर लिया और मन का विकार बाहर निकल गया. और सामान्य हो गये. </p>
<p>इसलिए हमें यह समझना चाहिए कि हम किस प्रकार से अपने आप को अभिव्यक्त कर रहे हैं. अभिव्यक्ति के दो प्रकार हैं. स्थूल और सूक्ष्म. स्थूल अभिव्यक्ति के लिए इंद्रिय सहयोग की जरूरत होती है. बोलने के लिए वाणी चाहिए. संकेत के लिए शरीर चाहिए. लेकिन इस स्थूल अभिव्यक्ति का आखिरी केन्द्र मानव का चेतन शरीर होता है. अगर स्थूल या भौतिक शरीर का चेतन शरीर से संपर्क कट जाए तो स्थूल अभिव्यक्ति बंद हो जाती है. इसलिए स्थूल का सूक्ष्म से संपर्क ही हमें अभिव्यक्ति और अनुभव देता है. लेकिन बिना स्थूल के अगर अभिव्यक्ति और अनुभव दोनों हो जाए तो?</p>
<p>भारत के दृष्टिकोण से देखें तो यह सिद्धि है. साधना मार्ग से इस अवस्था तक पहुंचा जा सकता है आप इस सिद्धि को प्राप्त कर सकते हैं कि बिना स्थूल की मदद से अभिव्यक्ति और अनुभव दोनों को धारण कर सकते हैं. लेकिन अभी यह केवल सिद्धि है. ऐसी क्षमता पाने के बाद कोई सिद्ध तो हो सकता है लेकिन समाधि नहीं मिलती. समाधि वह अवस्था है जब सूक्ष्म की अभिव्यक्ति भी शून्य हो जाती है. जब विचार आते ही नहीं. संकट यह है कि जब तक विचार आयेंगे हमें अभिव्यक्ति का कोई न कोई माध्यम तलाशना होगा या विकसित करना होगा. यूरोपीय नजरिये से देखें तो यह यात्रा वैज्ञानिक उपकरणों के सहारे भी की जा सकती है. </p>
<p>जब से दुनिया में परंपरागत समाज को पिछड़ा बताने का षण्यंत्र रचा गया है तबसे स्थूल के प्रमाण को ही सही मानने का चलन शुरू हुआ है. यह एक षण्यंत्र है लेकिन इसके परे जाकर अपनी बात समझाना भी मुश्किल है. अब अभिव्यक्ति का कोई भी तरीका हो किसी न किसी दिन उसे चरम पर तो पहुंचना ही होता है. स्थूल विज्ञान भी धीरे-धीरे अपने चरम की ओर बढ़ रहा है. यह जितना आगे जाएगा उतना सूक्ष्म होता जाएगा. अगर केवल कम्युनिकेशन के वैज्ञानिक माध्यमों को देखें तो यह लगातार स्थूल से सूक्ष्म की ओर बढ़ रहा है. अगले दस बीस सालों में हम वहां होंगे जहां विचार करने मात्र से संदेश दे सकेंगे. हमारे सोचने और आप तक संदेश पहुंचने के बीच में जो डिवाईस हम इस्तेमाल करेंगे वह इतनी सूक्ष्म हो जाएगी कि हमारे शरीर के किसी हिस्से में फिट हो जाएगी और हमारे दिमाग के साथ तालमेल करते हुए अपना काम करेगी. </p>
<p>अभी तो सूचना प्रौद्योगिकी के बैलगाड़ी युग में जी रहे हैं.  इस बैलगाड़ी युग में हम संचार के लिए जिन उपकरणों का सहारा ले रहे हैं वे जटिल और जुगाड़ युक्त हैं. वे बहुत स्पष्ट और शत-प्रतिशत निश्चित परिणाम देनेवाले नहीं हैं. यह विकास क्रम आनेवाले १००-२०० वर्षों में हमें वहां लाकर खड़ा करेगा जहां भारत दो-तीन हजार साल पहले था. आज भी आध्यात्म मार्ग से उस अवस्था में पहुंचा जा सकता है लेकिन हर आदमी से आध्यात्मिक और आतंरकि शक्ति के सहारे जीवन जीने की कल्पना नहीं की जा सकती. स्थूल मार्ग ही श्रेष्ठ होता है. आम जन को उपकरण तो चाहिए. विज्ञान की प्रगति हमें उसे ओर ले जा रही है. लेकिन फिलहाल इस विज्ञान और हमारे बीच में माया का बड़ा वर्ग हिस्सेदार है इसलिए विज्ञान भी अशुद्ध हो गया है. न जाने कितनी अवैज्ञानिक बातों को विज्ञान बताक हमारे सामने परोस दिया जाता है. अगर विज्ञान शुद्ध हो तो वह आध्यात्म का आनंद देता है. विज्ञान अपने चरम पर आध्यात्म है और आध्यात्म को बिना विज्ञान के हासिल नहीं किया जा सकता. </p>
<p>इसलिए अभिव्यक्ति का चरम तो वह होगा जब हम संप्रेषण के लिए वाह्य उपकरणों पर अपनी निर्भरता पूरी तरह से खत्म कर देंगे. हो सकता है उस दिन हमें समझ में आये कि पीढ़ियों तक हमने अपने ज्ञान का कैसा अनादर किया है. संप्रेषण के स्थूल माध्यमों की चमक में लोग इतने चकाचौंध हो गये हैं कि फिलहाल तो इस बारे में लोग सोच भी नहीं रहे हैं.</p>

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		<title>विस्फोट.कॉम को चाहिए निहंग पत्रकार</title>
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		<pubDate>Tue, 03 Feb 2009 17:58:14 +0000</pubDate>
		<dc:creator>संजय तिवारी</dc:creator>
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		<description><![CDATA[चौदहवीं लोकसभा के संग्राम का बिगुल बजने ही वाला है. चुनाव आयुक्तों के विवाद के बीच चुनाव कराने की सरगर्मी शुरू हो गयी है. लेकिन सवाल यह है कि इस आम चुनाव में वेब और वेब पत्रकारों की क्या भूमिका होगी? विस्फोट.कॉम इस आम चुनाव में डिजिटलट मीडिया के जरिए लड़ने की योजना बना चुका [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p>चौदहवीं लोकसभा के संग्राम का बिगुल बजने ही वाला है. चुनाव आयुक्तों के विवाद के बीच चुनाव कराने की सरगर्मी शुरू हो गयी है. लेकिन सवाल यह है कि इस आम चुनाव में वेब और वेब पत्रकारों की क्या भूमिका होगी? विस्फोट.कॉम इस आम चुनाव में डिजिटलट मीडिया के जरिए लड़ने की योजना बना चुका है. इसी के मद्देनजर विस्फोट.कॉम ने महासंग्राम-2009 नाम से एक पोर्टल लांच कर दिया है जो केवल चुनाव की रिपोर्टिंग करेगा. <img class="alignright size-medium wp-image-486" title="cat1_newsfea" src="http://visfot.com/blog/wp-content/uploads/2009/02/cat1_newsfea-300x153.jpg" alt="cat1_newsfea" width="300" height="153" /></p>
<p>जो मुक्त या ट्रेनी पत्रकार इस चुनाव में कुछ अलग तरह की रिपोर्टिंग करना चाहते हैं उनके लिए विस्फोट.कॉम एक बेहतर मंच प्रदान कर सकता है. <a href="http://www.visfot.com/news/" target="_blank">महासंग्राम-2009</a> पर जो भी खबरें या रपटें प्रकाशित होंगी उसका उचित पारिश्रमिक भी दिया जाएगा. बशर्तें खबरें एक ईमानदार पत्रकार और जिम्मेदार नागरिक के तौर पर ही लिखी गयी हों और उनका कोई निहित स्वार्थ न हो.  </p>
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<p>या फोन करिए- 09312440606</p>
<p><strong>फोटो भी भेजिए</strong></p>
<p>अगर आपके इलाके में कोई ऐसी गतिविधि या रैली होती है जो राष्ट्रीय महत्व का होता है. या फिर लोकतंत्र की अलग सूरत और सीरत दिखाती कोई फोटो आपके पास हो तो आप हमें भेजिए. प्रकाशित फोटो को पारिश्रमिक दिया जाएगा.  फोटो हमें visfot@gmail.com</p>

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		<title>मैं तो कुछ नहीं बोलूंगा</title>
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		<pubDate>Mon, 15 Dec 2008 08:50:32 +0000</pubDate>
		<dc:creator>संजय तिवारी</dc:creator>
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		<description><![CDATA[एन्ड्रू और जो कह रहे हैं कि खुशी सस्टेनबल होनी चाहिए. कैसे? अपने आस-पास उपजा अन्न खाओ. बड़ी खुशी मिलती है. फासिल फ्यूल (पेट्रोल आदि) के कारण ऐसी सुविधा मिल गयी है कि आदमी अपने आस-पास का अन्न खाना भूल ही गया है.  The fact that fast food and ready meals have gone up in [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p>एन्ड्रू और जो कह रहे हैं कि खुशी सस्टेनबल होनी चाहिए. कैसे? अपने आस-पास उपजा अन्न खाओ. बड़ी खुशी मिलती है. फासिल फ्यूल (पेट्रोल आदि) के कारण ऐसी सुविधा मिल गयी है कि आदमी अपने आस-पास का अन्न खाना भूल ही गया है.  The fact that fast food and ready meals have gone up in price now that they reflect their full ecological costs, has seen a revival of home cooking. कौन सुनेगा यहां अपने देश में इनकी बात. यहां तो अभी मैकडोनाल्ड जाकर बीमारी खरीदने की होड़ लगी हुई है. होड़ इस बात की लगी हुई है कि आधुनिक हो जाने के नाम पर कौन कितनी बीमारी खरीद लाता है.</p>
<p>अपने आस-पास के माहौल को समझो. खरीदारी भी करनी है तो शापिंग माल में मत जाओ. अपने आस-पास के दुकानदार से खरीदो. लेखक द्वय लिखते हैं- Computer connections aside, there are plenty of benefits in the new sense of community that has evolved from the revival of local shops (where the shopkeepers actually remember who you are) and the way that residential streets and town centers have become people-friendly.</p>
<p>अगर अमेरिका की इस मंदी में खुशी के इन तलाशते कारणों को समझें तो कितनी बड़ी संपत्ति हम लोग बर्बाद करने पर उतारू हो गये हैं. शापिंग माल क्यों होना चाहिए? शापिंग माल के कारण जो ये दोनों लेखक अमेरिका के हैं. वहां की यस मैगजीन में लिखते हैं. ये लेखक कह रहे हैं कि आपने बाजार की जो नयी समझ बना ली है उसे भूलिए. लोकल हो जाईये. अपने आस-पास देखिए. कम्युनिटी वगैरह बनाने के इंटरनेटी पंगों से बाज आईये. आपके आस-पास भी एक समाज है. एक बाजार है. उसके महत्व को समझिए.</p>
<p>अमेरिका ने मंदी की मार खाकर यही सीखा है. सामान खरीदने में खुशी नहीं है. नये तरह के बाजार बढ़ाने में खुशी नहीं है. खुशी कहीं और है.</p>
<p>अब क्या कहें. अमेरिका को छोड़िए अपने देश के पागलपन को देखकर मैं तो कुछ बोलूंगा ही नहीं.</p>

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		<title>मैंने वोट&#8217;दान&#8217; कर दिया</title>
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		<pubDate>Sat, 29 Nov 2008 12:18:25 +0000</pubDate>
		<dc:creator>संजय तिवारी</dc:creator>
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			<content:encoded><![CDATA[<p><a href="http://visfot.com/blog/wp-content/uploads/2008/11/sanjay_t.jpg"><img class="alignright size-medium wp-image-450" title="sanjay_t" src="http://visfot.com/blog/wp-content/uploads/2008/11/sanjay_t-300x207.jpg" alt="" width="300" height="207" /></a>और क्या कहें? मतदान जरा शिष्ट शब्द है. थोड़ा विशिष्ट लगता है लेकिन वोटदान में क्या बुराई है? थोड़ा असहज लगता है लेकिन दोनों का अर्थ तो एक ही है. आपको कुछ देकर आना है. और देने का नियम यह है कि आप दान करने के बाद कुछ भी अपेक्षा मत करिए. दान करने के बाद अगर आप अपेक्षा करते हैं तो आपका दान खण्डित हो जाता है. मुश्किल तब शुरू होती है जब हमें सिखाया जाता है कि आप अपने जन-प्रतिनिधि से अपेक्षा करिए क्योंकि आपने वोटदान किया है. अब एक ओर अपनी शास्वत समझ कि दान करने के बाद कुछ अपेक्षा नहीं करनी चाहिए और दूसरी ओर यह शिक्षा कि अपने जनप्रतिनिधि से अपने कामों के लिए अपेक्षा रखिए, विरोधाभाषी बात है. फिर दान के साथ एक और समझ काम करती है कि आप दान गुप्त रखिए. इसलिए किसी को बताने की जरूरत नहीं है. आज भी भारत में ऐसे करोड़ों मतदाता हैं जो किसी कीमत पर यह नहीं बताते कि उन्होंने अपना मत किसे दान किया है. यह मेरा पक्का अनुभव है इसलिए जब टीवी चैनलों पर एक्जिट पोल देखता हूं तो समझना मुश्किल लगता है कि यह सच कैसे हो सकता है? पार्टियों के खुले समर्थकों को छोड़ दें तो शायद ही कोई होगा जो ईमानदारी से यह बताता हो कि उसने किसे मतदान किया है?</p>
<p>लेकिन इस बार दिल्ली में मैंने पहली बार मतदान किया है. आठ साल से यहां हूं और इस साल में यहां के नागरिकों में शामिल हो गया हूं. एक तरह से सरकारी मान्यता के साथ दिल्ली का निवासी हो गया हूं. मेरे इलाके जंगपुरा (निर्वाचन क्षेत्र-४१) से विधायक पद के लिए दो प्रमुख उम्मीदवार मैदान में हैं. नये परिसीमन के बाद यह इलाका पंजाबी समुदाय के प्रभुत्व में आ गया है इसलिए कांग्रेस और भाजपा दोनों ने ही सिख उम्मीदवार मैदान में उतारे हैं. </p>
<p>मेरे सामने मुश्किल यह थी मैं क्यों मतदान करने जाऊं? भाजपा के उम्मीदवार अकाली दल के सिरसा को देखकर लगता नहीं कि उसे सेवा का स भी पता होगा. करोड़ों-अरबों का व्यापार है और वोक्सवैगन की मंहगी एसयूवी में उसने अपना सारा चुनाव प्रचार किया. यही हाल कांग्रेस के प्रत्याशी का है लेकिन गनीमत है कि वह व्यापारी नहीं बल्कि राजनीतिज्ञ है. लेकिन उसने भी अपना चुनाव प्रचार ठेंठ गुण्डई वाले अंदाज में किया. घर-घर भले ही न गया हो लेकिन गली-गली यात्राएं तो उन्होंने की ही. इसलिए इन दोनों में ही अपनी कोई रूचि नहीं थी. किसी पार्टी में कोई आस्था नहीं है. सब एक जैसे लगते हैं. इस ढांचे से कोई सार्थक नतीजा निकल सकता है यह भी उम्मीद नहीं है.</p>
<p>लोकतंत्र का यह स्वरूप हमारे स्वभाव का नहीं है. अभी भी हमें यह एक काम लगता है और सरकार को वोट देने के लिए लोगों के बीच अभियान चलाना पड़ता है कि यह आपका अधिकार है और आपको इसका उपयोग करना चाहिए. साफ है लोगों के लिए वोटदान उत्साह, भागीदारी और जिम्मेदारी का विषय नहीं है बल्कि एक प्रकार का सरकारी काम नजर आता है जिसे कर देना चाहिए नहीं तो हो सकता है किसी प्रकार का कानून का उल्लंघन हो जाए. पिछले साठ सालों में इससे अधिक समझ नहीं विकसित हो पायी है. इस ढांचे को स्वीकार करने में शायद साठ साल और लगेंगे.</p>
<p>असल में इस निरूत्साह का एक कारण और है कि हमारे आस-पास का माहौल हमें जैसी शिक्षा देता है यह लोकतांत्रिक ढांचा बिल्कुल उसके उलट है. भारतीय समाज परिवार मूलक है जो अपनी जरूरतों के लिए किसी राज पर नहीं बल्कि समाज पर निर्भर रहता है. यह लोकतंत्र हमें पग-पग पर सिखाता है कि आपको अपनी हर जरूरत के लिए सरकार पर निर्भर रहना चाहिए. जबकि हमारे स्वभाव में यह बात है ही नहीं. हम लोग बिना सरकार के जीने के अभ्यस्त हैं. लेकिन सरकार है कि हमारी जिम्मेदारी लेने से बाज नहीं आ रही. फिर सरकार ने अपने और हमारे बीच अब बाजार को लाकर खड़ा कर दिया है. बात और बिगड़ गयी है. </p>
<p>खैर, मैंने तय किया कि मैं किसी पार्टी को वोट नहीं दूंगा. लेकिन वोट दूंगा. फिर मेरे वोट देने का आधार क्या होगा? मैंने तय किया मैं उसे अपना वोट दूंगा जो सबसे कमजोर प्रत्याशी होगा. इससे मैं मतदान का भागीदार हो जाऊंगा लेकिन मैं किसी पार्टी विशेष का हिस्सा नहीं होऊंगा. मैं मतदान केन्द्र पर गया और&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;.</p>

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		<title>रामसेतु के एक टुकड़े की कीमत</title>
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		<pubDate>Sun, 23 Nov 2008 18:44:20 +0000</pubDate>
		<dc:creator>संजय तिवारी</dc:creator>
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		<description><![CDATA[जो लोग जानते होंगे वे जानते होंगे कि राम मंदिर आंदोलन के दौरान विश्व हिन्दू परिषद ने राम मंदिर के ईंटों को प्रदर्शित करके करोड़ों रूपये इकट्ठा किये थे. वे पैसे कहां हैं कोई नहीं जानता. कोई पूछता भी नहीं है कि वे पैसे कहां हैं. एक बार लोगों ने सवाल उठाया था तो विहिप [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p>जो लोग जानते होंगे वे जानते होंगे कि राम मंदिर आंदोलन के दौरान विश्व हिन्दू परिषद ने राम मंदिर के ईंटों को प्रदर्शित करके करोड़ों रूपये इकट्ठा किये थे. वे पैसे कहां हैं कोई नहीं जानता. कोई पूछता भी नहीं है कि वे पैसे कहां हैं. एक बार लोगों ने सवाल उठाया था तो विहिप ने उस समय कहा था कि पैसा विभिन्न ट्रस्टों के माध्यम से (या फिर एक ही ट्रस्ट के पास) बैंक में जमा है. लेकिन यहां मैं राममंदिर में मिले चंदे का हिसाब नहीं करने जा रहा.</p>
<p>मैं तो एक ऐसी खबर की ओर आपका ध्यान आकर्षित करना चाहता हूं जो उन दिनों की याद दिला रही है जब राम मंदिर आंदोलन का दौर चल रहा था. जो लोग वहां ६ दिसंबर को मौजूद थे वे बताते हैं कि ऐसा पागलपन था कि लोग ईंट, माटी, गारा-चूना-पाथर जिसको जो मिला उठाकर ले भागा था. शायद ऐसा प्रतीक रूप में अपने साथ रखने के लिए किया होगा. अब यही हाल रामसेतु के पत्थरों का हो रहा है.</p>
<p>विहिप और विभिन्न हिन्दू संगठनों के आंदोलन के बाद इस ऐतिहासिक धरोहर के पत्थरों पर शामत आ गयी है. यहां आनेवाले सैलानी पौराणिक पुल के अवशेष से जो पत्थर निकालकर लाये जाते हैं उनको मंहगी कीमत पर खरीद लेते हैं. अब इसमें थोड़ी धोखाधड़ी भी होगी ही. जैसा कि आमतौर पर अपने देश में होता है किसी भी लकड़ी की माला को तुलसी की माला बताकर टिका देने में हम पहले से ही माहिर हैं. इसलिए यहां के स्थानीय दुकानदार मूंगा चट्टानो को भी रामसेतु का हिस्सा बताकर बेच ले रहे हैं. मूंगा चट्टानों की खासियत होती है कि वे नैसर्गिक रूप से तैरती हैं. इसलिए सहज ही यह विश्वास दिलाया जा सकता है कि ये रामसेतु के पत्थर हैं, और देखो कैसे पानी में तैर रहे हैं.</p>
<p>और इस रामसेतु के एक टुकड़े की कीमत? ५०० से १००० रूपया. सीता तीर्थम, राम तीर्थम, लक्ष्मण तीर्थम सब जगह ये रामसेतु के अवशेष बिक रहे हैं. क्या कहा? सरकार कहां है? अरे भाई अगर इस तरीके से ही लोग रामसेतु तोड़कर बेंच लेगें तो सरकार का काम भी हो जाएगा.</p>

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		<title>माईकल हुए मुसलमान</title>
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		<pubDate>Sat, 22 Nov 2008 18:15:07 +0000</pubDate>
		<dc:creator>संजय तिवारी</dc:creator>
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		<description><![CDATA[यह कोई नयी खबर नहीं है. माईकल जैक्सन ने इस्लाम धर्म कबूल कर लिया है. खबर तो यह है कि उन्होंने इस्लाम धर्म कबूल क्यों किया? यह कोई नयी अफवाह नहीं है कि माईकल जैक्शन इस्लाम धर्म कबूल कर सकते हैं. आमतौर पर जैसा होता है पश्चिम की सेलेब्रिटी बिना प्रोपोगण्डा किये कोई काम नहीं [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p>यह कोई नयी खबर नहीं है. माईकल जैक्सन ने इस्लाम धर्म कबूल कर लिया है. खबर तो यह है कि उन्होंने इस्लाम धर्म कबूल क्यों किया? यह कोई नयी अफवाह नहीं है कि माईकल जैक्शन इस्लाम धर्म कबूल कर सकते हैं. आमतौर पर जैसा होता है पश्चिम की सेलेब्रिटी बिना प्रोपोगण्डा किये कोई काम नहीं करती. माईकल ने भी मिकाईल बनने के लिए पर्याप्त प्रोपेगण्डा किया. एक इमाम ने उन्हें इस्लाम धर्म की पवित्र पुस्तक कुरान के सामने इस्लाम कबूल करवाया. </p>
<p>लेिकन&#8230;..लेकिन&#8230;..लेकिन&#8230;&#8230;. यह उनके इस्लाम प्रेस से अधिक उनकी तात्कालिक जरूरत है. बुधवार को लंदन की अदालत में उनकी पेशी होनी है. एक अरब शेख ने उनके ऊपर ४७ लाख पाउण्ड का दावा ठोंक रखा है. बुधवार की गवाही अहम है. उनके ऊपर शेख ने आरोप लगाया है कि पैसा लेकर उन्होंने एलबम बनाने से मना कर दिया. मिकाईल यानी अल्लाह के फरिश्तेवाला नाम धारण करने के बाद बुधवार को माईकल जैक्शन जब कोर्ट में होंगे तो अरब शेख का दिल क्या जरा भी नहीं पसीजेगा? क्या अपने ही धर्म भाई को वह लंबे समय तक कोर्ट में फंसाकर रख पायेगा? नहीं न. वैसे भी अरब शेख जिंदादिल और धर्म पर मर मिटनेवाले होते हैं. अगर उनके इस स्वभाव का अगर माईकल को फायदा मिल गया तो वह फायदा होगा ४७ लाख पाउण्ड का. अब ऐसे में इस्लाम धर्म को स्वीकार करने में आप ही बताईये क्या हर्जा है? </p>
<p>वैसे भी ५० साल की उम्र में एक पाप सिंगर मुसलमां हुआ तो क्या खाक मुसलमां हुआ? क्यों मिर्जा, क्या बोलते हो?</p>

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		<title>एक दिन में अदद १८ कमेन्ट</title>
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		<pubDate>Fri, 07 Nov 2008 17:41:28 +0000</pubDate>
		<dc:creator>संजय तिवारी</dc:creator>
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		<description><![CDATA[यह मेरे लिए व्यक्तिगत रूप से आश्चर्य और खुशी दोनों की बात है. क्या कोई एक व्यक्ति किसी एक साईट के ही विभिन्न लेखों पर १८ कमेन्ट एक ही दिन में कर सकता है? उम्मेद सिंह बैद साधक ने यह काम आज ७ नवंबर को विस्फोट पर किया है. मानों कोई आधा दिन लगाकर वे [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p>यह मेरे लिए व्यक्तिगत रूप से आश्चर्य और खुशी दोनों की बात है. क्या कोई एक व्यक्ति किसी एक साईट के ही विभिन्न लेखों पर १८ कमेन्ट एक ही दिन में कर सकता है? उम्मेद सिंह बैद साधक ने यह काम आज ७ नवंबर को विस्फोट पर किया है. मानों कोई आधा दिन लगाकर वे जितने अधिक से अधिक लेखों पर अपनी प्रतिक्रिया दे सकते थे उन्होंने दिया है. </p>
<p>उत्सुकतावश उनके ब्लाग http://www.ummeed.blogspot.com/ पर गया तो पाया कि वहां एक भी पोस्ट नहीं है. तब और आश्चर्य हुआ. मैं व्यक्तिगत रूप से मानता हूं कि कमेन्ट करके आप लेखक को न केवल उत्साहित करते हैं बल्कि उसके सही गलत होने का निर्धारण भी करते हैं. अगर आप ऐसा नहीं करते तो फिर वेब माध्यम के सार्थक होने का मतलब ही नहीं रह जाता है. फिर प्रिंट और वेब में फर्क ही क्या रह जाता है? वेब आपको यह मौका देता है कि आप त्वरित रूप से अपनी प्रतिक्रिया से लेखक को अवगत करा देते हैं. </p>
<p>विस्फोट पर तो यह और भी दुखदायी बात है. स्पैम रोकने के लिए मुझे मजबूरन कैप्चा इमेज लगाकर रखना पड़ा है. हर बार कमेन्ट करते समय वह कैप्चा इमेज भी भरनी होती है. ऐसे कठिन माहौल में भी साधक जी एक ही दिन में १८ टिप्पणियां बहुत उत्साहित कर रही हैं. और वह भी सारे के सारे कमेन्ट क्षणिकाओं के रूप में तुरंत लेख के हिसाब से लिखी गयी कविताएं है. गजब. हम साधक जी जैसे पाठकों के उत्साह की कद्र करते हैं और उन सभी पाठकों को एक बार फिर अपनी ओर से आभार जताते हैं जो अपनी सही गलत राय से कम से कम लेखक को अवगत तो कराते हैं.</p>

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