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	<title>visfot.blog &#187; भारतनामा</title>
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		<title>शिक्षा चाहिए, संस्कार नहीं</title>
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		<pubDate>Sun, 16 Nov 2008 14:56:48 +0000</pubDate>
		<dc:creator>संजय तिवारी</dc:creator>
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			<content:encoded><![CDATA[<p>भारतीय मानस पर लंबे आक्रमण का जो सबसे बुरा प्रभाव हुआ है वह यह कि हमारी शिक्षा हमारे संस्कार से अलग हो गयी है. शिक्षा अपने आप में कोई संस्कार नहीं बची है. शिक्षा भी उद्यम है जैसे जीवन के दूसरे सारे उद्यम. फैक्टरी में काम करने के लिए एक फैक्टरी ब्वाय चाहिए. आफिस में काम करने के िलए एक आफिस व्याय चाहिए. पदवी छोटी बड़ी हो सकती है, तनख्वाह कम ज्यादा हो सकती है लेकिन हालत सबकी आफिस ब्वाय वाली ही है. आप सबको एक ही तराजू पर तौल सकते हैं क्योंकि सब एक ही शिक्षा व्यवस्था से निकल कर बाहर आये हैं.</p>
<p>यह बड़ी भयानक एकरूपता है. यह एकरूपता आज हमारे लिए संकट का सबसे बड़ा स्रोत है. यह कहीं बाहर से नहीं आया है. यह हमारी शिक्षा व्यवस्था की देन है. अंग्रेज आये तो उन्होंने कहा कि तुम लोग तो जाहिल हो. पढ़ना-लिखना आता नहीं. चलो तुम्हें स्कूल ले चलते हैं. उन्होंने स्कूल बनाये. तकनीकि संस्थान बनाये. और लोगों को कहा कि अब पढ़ो इसमें. जैसे पशुओं को नांद में लगा देते है कि लो खाओ. जैसे पशुओं के गले में पगहा डालकर उसे नांद से बांध देते हैं तो उसके विकल्प के सारे रास्ते बंद हो जाते हैं वैसे ही आदमी की शिक्षा के साथ भी हुआ है. उसके सामने विकल्प ही नहीं है. वह उसे शिक्षा नहीं मान सकता जिसे वह अपने अंदर अनुभव कर रहा है. वह उसे शिक्षा मान रहा है जो उसे बाहर से बताया जा रहा है.</p>
<p>अंग्रेजों के जाने के बाद भारत सरकार ने उसी कार्यक्रम को दोगुने उत्साह से लागू किया. भूमंडलीकरण की शुरूआत हुई तो वैश्विक ताकतें भी उसमें भागीदार हो गयीं. शिक्षा उद्योग और व्यवसाय दोनों हो गयी. विकल्प तो पहले ही नहीं था. अब जो कुछ स्वरूप बन गया उसे हम लोग भी गलती से शिक्षा कहते हैं. केवल कहते ही नहीं है बल्कि उसे स्थापित करते हैं. कोई शहरी आदमी आदिवासी इलाकों में जाता है तो वहां शिक्षा देना शुरू करता है. वह यह मानता ही नहीं कि केवल अक्षर ज्ञान शिक्षा नहीं होती और केवल स्कूल की बिल्डिंग ही पाठशाला नहीं होती. जीवन का व्यवहार सबसे बड़ी शिक्षा है और प्रकृति सबसे बड़ी पाठशाला. इसलिए शहर से लोग जब गांवों में जाते हैं तो अपना कूड़ा ज्ञान साफ करने की बजाय वे वही कूड़ा ज्ञान सत्य सनातन जीवन जीनेवाले लोगों पर लादने लगते हैं.</p>
<p>आजकल इधर फिर स्कूलों के सामने भीड़ लग रही है. तीन-तीन साल के बच्चों को भार की लादे लोग स्कूलों में फार्म लेने के लिए लाईन लगाये खड़े हैं. बच्चों को कहीं अच्छे स्कूल में डाल देना चाहते हैं. तीन-चार साल की उम्र में शिक्षा का बोझ? इस पागलपन को क्या कहें? मैंने यह सवाल बहुत सारे लोगों से किया. सबके पास कोई जवाब नहीं है. लेकिन क्योंकि दूसरा भी यही कर रहा है इसलिए वे भी यही करेंगे. जमाने में पीछे नहीं रहना है. जमाने के साथ चलने की होड़ में अपना ही साथ छोड़ रहे हैं. जो उम्र बच्चों में संस्कार देने की होती है वह उनकी स्कूल में बीतती है. मास्टर साहब और स्कूल स्टाफ के दिखावटी पूर्ण व्यवहार के बीच. वह बच्चा क्या सीखेगा? वह अंदर से कितना मजबूत होगा? उसमें संस्कार का कौन सा बीज अंकुरित होगा? वह जीवन में कितना दुख झेलेगा इसका अंदाज है क्या आपको? लेकिन यह सब बातें सोचे कौन? सबको शिक्षा चाहिए, ऐसी शिक्षा जो रोजगार दे सके.</p>
<p>हम कितने मक्कार लोग हैं कि शिक्षा को रोजी-रोटी से जोड़कर बैठ गये बस. रोजी-रोटी का माध्यम शिक्षा नहीं रही है इस देश में कभी. शिक्षा सीधे संस्कार से जुड़ती थी और आपको निखरने का पूरा मौका मिलता था. एक उम्र के बाद आप स्वतंत्र होते थे कि अपने लिए रोजगार का चुनाव कर सकें. फिर जातीय समूहों के बीच रोजगार गारंटी योजना अपने आप ही निहित है इसके लिए किसी नरेगा वगैरह की जरूरत नहीं थी. आज तो हमारी शिक्षा प्रणाली गुलाम पैदा करने की प्रणाली हो गयी है. शिक्षित गुलाम. जब पूरी पढ़ाई कर लेते हैं तब समझ में आता है कि समय तो बर्बाद गया. शिक्षा तो मिली ही नहीं. जो मिला वह तो जानकारियां है. और जो जानकारी होती है वह कई बार काम की होती है और कई बार नहीं होती है.</p>

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		<title>भाषा नहीं नस्ल</title>
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		<pubDate>Thu, 17 Jan 2008 00:36:00 +0000</pubDate>
		<dc:creator>संजय तिवारी</dc:creator>
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		<category><![CDATA[अजब-गजब]]></category>

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		<description><![CDATA[अंग्रेजों ने भारतीयों का वर्गीकरण इस तरह किया कि वे आर्य होने का दावा भी नहीं कर सके. बताया गया कि आर्य जो मध्य एशिया से होकर भारत आये, अब कुछ ब्राह्मण और क्षत्रिय जातियों के रूप में ही शेष हैं. इसका मतलब यह हुआ कि ब्राह्मणों और क्षत्रियों में भी कुछ ही आर्य हैं. [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<div>अंग्रेजों ने भारतीयों का वर्गीकरण इस तरह किया कि वे आर्य होने का दावा भी नहीं कर सके. बताया गया कि आर्य जो मध्य एशिया से होकर भारत आये, अब कुछ ब्राह्मण और क्षत्रिय जातियों के रूप में ही शेष हैं. इसका मतलब यह हुआ कि ब्राह्मणों और क्षत्रियों में भी कुछ ही आर्य हैं. दरअसल इस धारणा के पीछे कोई पुख्ता तथ्य नहीं है कि कि नस्लवाद जर्मनी की देन है. नात्सी दर्शन के आरंभिक उद्गारों से बहुत पहले अंग्रेज इतिहासकारों, समाजशास्त्रियों और लेखकों ने मानव विकास और विश्व इतिहास को नस्लवादी चश्मे से देखने की शुरूआत कर दी थी. राबर्ट नाक्स उन्नीसवीं सदी के एक ब्रिटानी वैज्ञानिक थे.</div>
<div>लेकिन उनकी असली भूमिका मानव इतिहास को नस्लवादी आधार देने में है. इसी अवधारणा में एंग्लो-सेक्सन जाति को ऊंचा स्थान दिया गया है. उनके अनुसार &#8220;मानव इतिहास में नस्ल ही सबकुछ है.&#8221; एंग्लों-सेक्सन के बारे में वे कहते हैं कि उन्हें इस पृथ्वी पर एकमात्र शुद्ध जाति माना जा सकता है. इस शुद्ध जाति के अस्तित्व को बचाये रखने के लिए वे नुख्सा सुझाते हैं कि &#8220;जिस तरह हम यहां (आष्ट्रेलिया में) गायों को मारते हैं उसी तरह बेफिक्र होकर स्थानीय लोगों को मारा जा सकता है. इस तरह धीरे-धीरे इनकी आबादी कम हो जाएगी.&#8221; नाक्स की इस सोच को चार्ल्स किंग्सले और थामस कार्लाईल जैसे लेखकों का भी समर्थन मिलता है. किंग्सले ईसाई-राजतंत्र और साम्राज्य का समर्थन करते हैं तो कार्लाईल निग्रो को मनुष्य केवल इसलिए मानते हैं क्योंकि उसके पास भी आत्मा है. अन्यथा उसे जीने का भी हक नहीं है.इस तरह नस्ली अवधारणा को स्थापित करने से यह बात अपने आप स्थापित हो जाती है कि किसी विशेष नस्ल की शारीरिक और बौद्धिक क्षमता के बिना सभ्यता का विकास नहीं हो सकता. यानि मास्टर रेस की जर्मन अवधारणा केवल जर्मन आविष्कार नहीं थी. उसके लिए अंग्रेज पहले ही पृष्ठभूमि तैयार कर चुके थे. अब केवल यह तय करना था कि यह मास्टर रेस आयी कहां से?आर्य शब्द अंग्रेजों और जर्मनों को उपयुक्त लगा लेकिन जहां के साहित्य से वह शब्द आया था उसे आर्यों का मूल देश बताना खतरनाक था. जर्मनों को इससे कोई खास फर्क इसलिए नहीं पड़ता था क्योंकि वे पहले ही बाईबिल में संशोधन चाहते थे. लेकिन अंग्रेजों के लिए यह जीवन-मरण का प्रश्न था. हम पहले देख चुके हैं कि &#8220;काकेसस&#8221; पर्वतों का सुझाव पहले ही दिया गया था. इसीसे भारोपीय जातियों का नाम काकेसियन भी चल पड़ा था. यह भी बताया गया कि वह शुद्ध आर्य नस्ल जार्जियन थी. यह विचार काफी समय तक यूरोपीय विद्वानों पर छाया रहा. एच क्लार्क लिखते हैं &#8211; &#8220;यह प्रमुख जाति पैलियो-जार्जियन भाषा बोलती थी.</div>
<div>इस नस्ल के लोग अब पुष्ट शारीरिक आकार के काकेसियन लोग हैं जो जार्जियन भाषा बोलते हैं.&#8221;भारत पर लिखनेवाले सभी पाश्चात्य इतिहासकारों के लिए अब यह निर्विवाद तथ्य बन गया था कि भारत पर आर्यों ने आक्रमण किया था. इन काकेसियन ने पहले भारत में अपना साम्राज्य स्थापित किया फिर फारस और मीडिया में. विलियम जोन्स ने आर्यों को भाषा के आधार पर स्थापित करना चाहा और मैक्समूलर ने भी यहीं से आरंभ किया. लेकिन अंग्रेजी सत्ता को स्थापित करने के लिए केवल भाषा का उपकरण पर्याप्त नहीं था. उसके लिए नस्ल का उपयोग आवश्यक था. आर्यों को एक नस्ल के रूप मे स्थापित करने का दबाव इतना बढ़ गया कि मैक्समूलर भी अपने तर्कों से डगमगाने लगे. उन्होंने कहा था &#8220;जब हम आर्यों की बात करते हैं तो हमारा आशय सिर्फ यह बताना होता है कि वे एक विशेष भाषा बोलते थे. जहां तक उनकी अन्य पहचान का सवाल है तो उसमें न हमारा कोई आग्रह है और न संकेत, जब तक कि हमें दूसरे स्रोतों से स्पष्ट प्रमाण नहीं मिल जाते.&#8221;लेकिन इसके बावजूद उन्होंने आर्य और अनार्य का विभाजन किया.यह स्थापित किया गया कि ए<br />
क शक्तिशाली गौरवर्णीय जाति भारत में बाहर से आयी. लेकिन कहां से? यह महत्वपूर्ण नहीं है क्योंकि आर्यों को एक शक्तिशाली आदिम नस्ल बतानेवालों को भी नहीं मालूम. अभी तक पंद्रह स्थानों को आर्यों की जन्मस्थली बताया जा चुका है जिसमें एशिया माइनर, मध्य एशिया, दक्षिणी रूस, उत्तरी जर्मनी, हंगरी आदि शामिल हैं. फिर भी वे आये बाहर से और जब वे भारत में आये तो यहां कम से कम दो उन्नत सभ्यताएं थीं. एक को द्रविण सभ्यता कहते थे और दूसरे को सिन्धु घाटी सभ्यता. और क्योंकि आर्यों का पहला टकराव सिंधुघाटी वाली सभ्यता के लोगों से हुआ इसलिए उन्होंने मूल सभ्यताओं को कुचल डाला. लेकिन समस्या इतने से ही नहीं सुलझती थी. अंग्रेजों के लिए हड़प्पा की खोज ने एक बड़ी समस्या पैदा कर दी. अब तक तो यही कहा जा रहा था कि श्रेष्ठ मानवजाति आर्यों ने दक्षिण और पूर्व की सभ्यताएं विकसित की. लेकिन वेदपूर्व के आर्यों की श्रेष्ठता को चुनौती देने कि लिए एक और जाति या नस्ल यहां उपस्थित थी. पहले दौर में वे मूल भारतीय माने गये लेकिन बाद में उन्हें भी बाहर से आया घोषित कर दिया गया.हड़प्पीय भाषा का विश्लेषण नहीं किया जा सका है फिर भी विद्वानों ने सिंधु घाटी क्षेत्र में प्राप्त खोपड़ियों आदि से निष्कर्ष निकालने का प्रयास किया कि वे शायद साइथियन थे जो आर्यों से पहले रूस की तराईयों से यहां आये थे. द्रविड़ो के लिए यह तर्क तो पहले ही दिया जा चुका था. राबर्ट काल्डवेल लिखते हैं &#8220;द्रविड़ो ने आर्यों, ग्रीकों-साइथियन और तुर्की-मंगोल जातियों की तरह उत्तर पश्चिम मार्ग से भारत में प्रवेश किया था. द्रविण साईथियाई हैं लेकिन उनमें बहुत प्राचीन काल में ही भारोपीय मिश्रण हुआ है.&#8221; इसके बाद भारतीय लोगों के नृवंशीय वर्गीकरण करने की प्रतिस्पर्धा आरंभ हो गयी. केवल आर्यों में ही अनेक नस्लें नहीं खोजी गयीं अपितु द्रविड़ो को भी आधा दर्जन नस्लों में बांटा गया. एचएच रिसले ने इस दिशा में काफी काम किया लेकिन उन्होंने इस काम के पीछे की मंशा भी कभी नहीं छिपाई. रिसले के ही समकालीन राबर्ट कास्ट ने लिखा है- &#8221; अब भारतीय जातियों और उपजातियों का गजेटियर बनाने की आवश्यकता है जिसमें ब्रिटिश इंडिया में रहनेवाली जातियों के मतभेदों को स्पष्ट किया जा सके. इसमें बहुत से लाभ हैं. जातियों की यह पंचायत एक अच्छे शासक के काम की वस्तु है. धर्म और भाषा का भेद भले ही कितना बड़ा हो जाति भेद से अधिक नहीं होते. मुझे यह जानकर खुशी होती है कि भारतीय जनजातियों का सर्वेक्षण होने की संभावना है. इसमें पुरानी रोमन कहावत ठीक बैठती है कि डिवाइड एट एम्परा (बांटो और शासन करो.)</div>

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