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	<title>visfot.blog &#187; हाहाकार</title>
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		<title>समलैंगिकता के सवाल पर संघवाले चुप क्यों हैं?</title>
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		<pubDate>Tue, 07 Jul 2009 11:03:04 +0000</pubDate>
		<dc:creator>संजय तिवारी</dc:creator>
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		<description><![CDATA[दिल्ली हाईकोर्ट ने फैसला दिया कि समलैंगिक होना अपराध नहीं है. उसके इस फैसले के बाद पूरे देश में साफ तौर पर लोग तीन हिस्सों में बंट गये. एक वह जो इसका समर्थन कर रहा है. ऐसे लोगों की तादात बहुत थोड़ी लेकिन शक्तिशाली है. इसलिए सबसे ज्यादा इन्हीं लोगों की आवाज सुनाई दे रही [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p>दिल्ली हाईकोर्ट ने फैसला दिया कि समलैंगिक होना अपराध नहीं है. उसके इस फैसले के बाद पूरे देश में साफ तौर पर लोग तीन हिस्सों में बंट गये. एक वह जो इसका समर्थन कर रहा है. ऐसे लोगों की तादात बहुत थोड़ी लेकिन शक्तिशाली है. इसलिए सबसे ज्यादा इन्हीं लोगों की आवाज सुनाई दे रही है. दूसरे वह लोग जो इस मुद्दे का विरोध कर रहे हैं. इनकी संख्या बहुत अधिक है लेकिन ये लोग व्यवस्था और मीडिया के बहुत प्रभावी लोग नहीं है इसलिए इनकी आवाज सुनाई नहीं दे रही है. एक तीसरे प्रकार का वर्ग है जो हर मुद्दे की तरह इस मुद्दे पर पूरी तरह से उदासीन है.</p>
<p>इस मसले पर हाईकोर्ट के निर्णय के बाद अधिकांश राजनीतिक दल बोल रहे हैं. पक्ष में तो कोई नहीं है लेकिन सीपीएम जैसे कुछ राजनीतिक दलों के नेताओं ने प्रगतिवाद के नाम पर इसका समर्थन भी किया है तो यह कहते हुए समलैंगिक संबंध रखनेवालों को अपराधी करार नहीं दिया जाना चाहिए. लेकिन घोर आश्चर्य है कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ इस पूरे मसले पर पूरी तरह से चुप्पी साधे हुए है. संघ के लोग मानते हैं कि राष्ट्र की शुचिता और पवित्रता बनाये रखनी है तो परिवार व्यवस्था और विवाह व्यवस्था की शुद्धता को बनाकर रखना होगा. फिर भारत की परिवार व्यवस्था पर हमला करनेवाले इस सबसे घातक फैसले के बाद भी संघवाले चुप क्यों हैं?</p>
<p>केवल संघवाले ही चुप नहीं है. संघ की राजनीतिक ईकाई भाजपा भी इस मसले पर मौन साधे हुए है. संघ से जुड़े एक दो संगठनों के प्रमुखों ने कुछ टीवी चैनलों पर जाकर बात की लेकिन उनके पास भी विरोध का न तो कोई ठोस तर्क था और न बात कहने का आधार. वे बार-बार कुछ रटी रटाई बातों पर ही रपट्टा लगा रहे थे. लेकिन संघ के पास अब अपना एक प्रवक्ता होता है जो हर वक्त, अधिकांश मुद्दों पर संघ का दृष्टिकोण साफ करता रहता है. फिर समलैंगिकता के मुद्दे पर संघ क्यों नहीं बोल रहा है? भाजपा कोई बयान क्यों नहीं दे रही है? विश्व हिन्दू परिषद के लोग इस बारे में अपना कोई बयान क्यों नहीं दे रहे हैं?</p>
<p>कायदे से होना तो यह चाहिए था कि राष्ट्रवादी दल इस अति संवेदनशील मुद्दे पर हंगामा खड़ा कर देते. लेकिन लालू और मुलायम जैसे &#8220;सांप्रदायिक&#8221; और &#8220;अराष्ट्रवादी&#8221; लोग तो खुलकर बोल रहे हैं और कानून बनाने पर अंजाम भुगतने की धमकी दे रहे हैं लेकिन संघ और उससे जुड़े बड़े संगठन चुप्पी लगाकर बैठे हुए हैं. क्यों?</p>

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		<title>इस देश में कितने गे हैं?</title>
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		<pubDate>Fri, 03 Jul 2009 06:26:20 +0000</pubDate>
		<dc:creator>संजय तिवारी</dc:creator>
				<category><![CDATA[हाहाकार]]></category>

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		<description><![CDATA[गे संबंधों को जायज ठहराने के बाद दिल्ली हाईकोर्ट के बाहर का नजारा देखने लायक था. घोषित गे एक दूसरे से गले मिल रहे थे. पत्रकार उनको कवर कर रहे थे और ऐसे बहुत सारे वकील कैमरे में अपना चेहरा पहुंचाने के लिए आस पास मंडरा रहे थे. लेकिन यह सब बहुत देर नहीं चला. [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p>गे संबंधों को जायज ठहराने के बाद दिल्ली हाईकोर्ट के बाहर का नजारा देखने लायक था. घोषित गे एक दूसरे से गले मिल रहे थे. पत्रकार उनको कवर कर रहे थे और ऐसे बहुत सारे वकील कैमरे में अपना चेहरा पहुंचाने के लिए आस पास मंडरा रहे थे. लेकिन यह सब बहुत देर नहीं चला. नाज फाउण्डेशन से जुड़े लोग थोड़ी ही देर में वहां से चले गये. सेलिब्रेशन किसी फाईवस्टार होटल की ओर बढ़ गया. पीछे रह गये कुछ पत्रकार और वकील. पत्रकारों में ढेर सारी लड़कियां थीं और लड़के तो थे ही.</p>
<p>पत्रकारों की आपस में बातचीत मजेदार थी. जिस एक फैसले पर पत्रकारों को बिफरकर विरोध करना चाहिए था वे मजे ले रहे थे. शाम को उनमें से कई पत्रकारों टीवी पर खबर पढ़ते हुए देखा तो पता चला कि अच्छा यह उस चैनल का पत्रकार है. महुआ टीवी चैनल के पत्रकार ने पीटीसी करने के लिए &#8220;आज दिल्ली हाईकोर्ट ने&#8221; इसी शब्द को कम से कम 80 बार रिकार्ड किया और फिर टेक हुआ. कोई हाईकोर्ट के दरवाजे से आगे बढ़ते हुए पीटीसी रिकार्ड कर रहा था एनडीटीवी की एक महिला पत्रकार ने जिस अंदाज में पीटीसी किया उससे लगा कि फैसला उसके लिए भी हुआ है. इसलिए उसने मटकते हुए मस्त अंदाज में पीटीसी किया. टीवी में वह कैसा दिखा, मालूम नहीं लेकिन सामने तो बहुत गजब लग रहा था.</p>
<p>पत्रकारों को यह भी नहीं मालूम था कि हाईकोर्ट ने किस धारा के तहत गे संबंधों को जायज ठहराया था. ज्यादातार पत्रकार संविधान की धारा 14 ए का उल्लेख कर रहे थे. जबकि दिल्ली हाईकोर्ट ने संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत गे संबंधों को मान्यता दी है. लेकिन पत्रकारों को न इससे मतलब है कि किस धारा या अनुच्छेद के तहत फैसला दिया गया न ही उनको इससे मतलब है कि इस फैसले का सामाजिक असर क्या होगा.  उन्हें मतलब था तो सिर्फ इससे कि इस &#8220;शानदार&#8221; घटना पर एक चमकदार बाइट कैसे बन सकती है.</p>
<p>लेकिन एक आश्चर्यजनक बात दिखी कि वकीलों में बहुत सारे ऐसे लोग थे जो इस फैसले का विरोध कर रहे थे. एक वकील ने तो उन जजों पर गे होने का संदेह व्यक्त कर दिया जिन्होंने यह फैसला दिया है. अच्छा लगा कि वकील कम से कम अदालत के दरवाजे के बाहर तो सच्चे मन से बात करते हैं.</p>
<p>फैसले के बाद एक सवाल तो मन मे आया वह यह कि इस देश में कितने गे हैं? अपुष्ट आंकड़ा है कि देश की 1/6 आबादी गे या लेसिबियन हैं. अब सवाल यह है कि क्या यही रेशियो पत्रकारों में भी है? इस पूरे घटनाक्रम में देश की मीडिया ने रोल निभाया है उससे तो यही लगता है कि पत्रकारों में यह रेशियो इससे भी कही अधिक है. और हां, देर शाम आदि गोदरेज ने इस घटना का समर्थन करके साबित कर दिया कि देश के कारपोरेट घरानों में गे और लेसिबियन भरे पड़े हैं. अब क्या कहें? सवाल उठायें भी तो किस किस पर?</p>

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		<title>हर काम कमाई के लिए नहीं होता</title>
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		<pubDate>Tue, 08 Apr 2008 01:40:00 +0000</pubDate>
		<dc:creator>संजय तिवारी</dc:creator>
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		<category><![CDATA[बात करामात]]></category>

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		<description><![CDATA[लोग चर्चा करते हैं कि अगर तकनीकि का विस्तार इसी तरह जारी रहा तो आनेवाले समय में आदमी तकनीकि का गुलाम हो जाएगा. वह समय कब आयेगा पता नहीं लेकिन आज का समय तो यह है ही कि ज्यादातर सभ्य लोग पैसे के गुलाम हो गये हैं. असभ्यों की बात कौन करे. विज्ञान,तकनीकि, उद्योग, जीवन, [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p>लोग चर्चा करते हैं कि अगर तकनीकि का विस्तार इसी तरह जारी रहा तो आनेवाले समय में आदमी तकनीकि का गुलाम हो जाएगा. वह समय कब आयेगा पता नहीं लेकिन आज का समय तो यह है ही कि ज्यादातर सभ्य लोग पैसे के गुलाम हो गये हैं. असभ्यों की बात कौन करे. विज्ञान,तकनीकि, उद्योग, जीवन, मरण, संबंध, विच्छेद, सबकुछ पैसे के अधिपत्य में जा चुका है. पैसा दनदनाता हुआ घूम रहा है और हम है कि उसके आगे लाचार हुए जाते हैं.</p>
<p>धन और द्रव्य का भेद ही खत्म हो गया है. अब द्रव्य ही धन हो गया है. ऐसे में कुछ लोगों को द्रव्य की लालसा छोड़कर धन की साधना करनी होगी. धन क्या होता है यह समझना होगा और वह द्रव्य से कैसे भिन्न होता है यह भी जानना होगा.</p>
<p>धन शास्वत होता है. आजकल स्थूल रूप में बहुत कांट-छांट करके उसे प्राकृतिक संसाधन कहा जाता है लेकिन धन की परिधि बहुत विशाल है. मान-सम्मान भी धन है और बेटा-बेटी भी. विश्वास का रिश्ता भी धन है और अपने प्रति किसी का निश्चल प्रेम भी धन है. मां की ममता धन है तो प्रेयसी की मनुहार भी धन है. भाई का समर्पण धन है तो पड़ोसी की सदिच्छा भी धन है. शुद्ध हवा और पानी भी धन है तो पवित्र मिट्टी का कोमल स्पर्श भी धन है. कागज के नोट और लोहे तांबे के सिक्के तो धन कदापि नहीं हो सकते.</p>
<p>लेकिन बाजार की ताकत और मूर्खों की मंडली ने पैसे की ताकत को ऐसे स्थापित कर दिया है कि हम धन और द्रव्य का भेद ही भूल चुके हैं. यह भूल और भ्रम मिटे तो दुनिया दिखाई दे. इंसान होना समझ में आये और यह भी समझ में आये कि पिण्ड का ब्रह्माण्ड से क्या रिश्ता है? हमारे होने का दूसरे के लिए क्या अर्थ है हमारे होने के लिए दूसरे का होना कितना जरूरी है?</p>
<p>पैसा न हारा तो सब हार जाएंगे. सत्य हारेगा नहीं लेकिन कुछ काल के लिए नेपथ्य में अवश्य चला जाएगा. सत्य का नेपथ्य में जाना आखिरकार हमें ही नुकसान पहुंचाएगा. एक सुंदर दुनिया से बेदखल ही चले जाएंगे हम सब. अगर प्रकृति की संपूर्णता को समझना है और इसकी वास्तविक खूबसूरती को देखना है तो पैसे को किनारे कर दीजिए. कुछ काम ऐसा भी करिए जिनका कोई आर्थिक प्रयोजन न हो. जो सिर्फ काम हो. आप देखेंगे कि आप उस वक्त सबसे ज्यादा अपने साथ होते हैं जब आप पैसे के लिए काम नहीं करते.</p>
<p>उस अपनेपन में ज्यादा समय रहने की कोशिश करनी चाहिए. पैसा तो बाजार और सरकार द्वारा शोषण के लिए खड़ा किया गया वर्चुअल स्टेट है. उसका वास्तविकता से कुछ लेना देना नहीं है.  अपनी उस सनातन समझ की ओर लौट जाईये जो आपकी मूल अभिव्यक्ति है. नहीं जा सकते तो आप अपने होने से ही मरहूम रह जाएंगे. सच बोलता हूं.</p>

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