
मुकेश अंबानी का आहार बहुत सीमित है. दो-तीन चपाती और कुछ गुजराती सब्जियां, दालें वगैरह. वे केवल शाकाहारी नहीं है बल्कि सात्विक शाकाहारी हैं. उनके घर में आज भी भोजन कोई शेफ नहीं पकाता. भोजन पकाने के लिए महराज हैं. कह सकते हैं कि उनकी शारीरिक भूख वैसी है जैसी किसी एक सामान्य कामकाजी व्यक्ति [...]
August 28, 2007 | Posted in
बात करामात |
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यह उन्हीं के लेख का शीर्षक है. इस लेख को लिखते हुए वे कहते हैं यह न अलंकरण है न अहंकार. अलंकरण और अहंकार से मुक्त अनुपम मिश्र का परिचय देना हो तो प्रख्यात पर्यावरणविद कहकर समेट दिया जाता है. उनके लिए यह परिचय मुझे हमेशा अधूरा लगता है. फिर हमें अपनी समझ की [...]
August 28, 2007 | Posted in
बात करामात |
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गोपाल कृष्ण कहते हैं पांडिचेरी में ऐसी भी बस्तियां हैं जहां तकनीकि और आधुनिकता का प्रवेश वर्जित है. कुछ इसी तरह के लोग बस्तर के अबूझमांड़ में रहते हैं. ये सब आधुनिकता से भागे हुए लोग हैं. आधुनिकतम् देशों और सभ्यताओं से स्वनिष्कासन पर जंगलों, कंदराओं में पहुंचे लोग जिंदगी से चाहते क्या हैं? 21वीं [...]
August 27, 2007 | Posted in
बात करामात |
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खुदरा व्यापार पर मेरी पिछली पोस्ट के बारे में रंजन भाई ने सवालों का गुलदस्ता भेजा है. उनके सवालों का मैं आभारी हूं क्योंकि इसी बहाने मैं उन सवालों का जवाब दे सकता हूं जो अक्सर कईयों के मन में उठते हैं. पहले रंजन के सवाल -
क्या रिटेल का व्यापार करना गुनाह है? गैर कानुनी [...]
August 23, 2007 | Posted in
बात करामात |
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यहां कुछ चित्र दे रहा हूं. कल लखनऊ में रिलांयस फ्रेश और स्पेंशर्स स्टोर के खिलाफ प्रदर्शनकारियों की तस्वीर है. पुलिस ने उनके साथ जो सलूक किया वह कई सवाल पैदा करता है. सरकार किसके लिए है? उद्योगपतियों के लिए या फिर आम आदमी के लिए? अगर आम आदमी और उद्योगपतियों के हित टकराएं तो [...]
August 23, 2007 | Posted in
बात करामात |
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