
क्षुद्र चेतना के लोग अगर अच्छे काम करते हैं तो अच्छे काम अहंकार पैदा करते हैं. यह अहंकार इतना सूक्ष्म और घातक होता है कि बुरे कामों से भी विषैला हो जाता है. इसलिए अच्छे काम का अहंकार करनेवाले अकेले पड़ जाते हैं. ऐसे लोग समाज का ज्यादा नुकसान करते हैं. यह बहुत मुश्किल होता [...]
April 27, 2008 | Posted in
बात करामात |
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योगवशिष्ठ मेरा प्रिय ग्रंथ है. वैसे ही जैसे रामचरित मानस, कबीर के दोहे या फिर सुखमनी साहिब. श्रीमद्भगवगीता बहुत बौद्धिक ग्रंन्थ है. मैं पढ़ता जरूर हूं लेकिन उस अपनेपन के साथ नहीं जैसे रामचरितमानस या फिर सुखमनी साहिब को. श्रीमद्भगवतगीता में बुद्धि विलास और तार्किक विश्लेषण ज्यादा है. गीता में भाव का सिरे से [...]
April 26, 2008 | Posted in
दुनिया मेरे आगे |
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किसी भाषा से आप क्या उम्मीद करते हैं? यह कि वह आपको कवि बना दे या फिर चूतिया? हिन्दी इन्हीं दो विधाओं की भाषा बनकर रह गयी है. प्रकाशनों के बड़े तबके ने कवि पैदा किये. कवियों की राजनीति पैदा की और साहित्य की कोंपले फोड़ते रहे. कोंपले फूटी न फूटी लोगों के सिर जरूर [...]
April 24, 2008 | Posted in
कारपोरेट मीडिया |
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क्योंकि मैंने स्क्रीनशाट नहीं रखा इसलिए औधिया जी के लेख पर हेडिंग कैसे बदल गयी इस पर बात करने का कोई मतलब नहीं रह जाता. ऐसी गलढिढाई हो तो क्या बात करना. लेकिन कोई घोस्ट बस्टर टिप्पणी कर गये हैं कि “आप अतिवादिता के शिकार दिखते हैं इस पोस्ट में. अवधिया जी का आलेख सुंदर [...]
April 23, 2008 | Posted in
बात करामात |
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आज ज्ञानदत्त पाण्डेय जी के ब्लाग पर पंकज औधिया जी का एक भाषण है. वैसे ही जैसे हर हफ्ते होता है. लेख तो परंपरा वगैरह की बात करता है लेकिन हेडिंग बहुत तकलीफ देनेवाली लगी. कोशिश की वहीं टिप्पणी करूं लेकिन सफल न हो सका.
हेडिंग लगी है – विकास में भी वृक्षों को मौका मिलना [...]
April 23, 2008 | Posted in
बात करामात |
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