
ब्लाग पर पोस्ट लिखने से पहले भी जिन्दगी होती है और एग्रीगेटर से हटने के बाद भी चलती रहती है. मेरे विचारों का आधार इतना कमजोर नहीं कि किसी एग्रीगेटर की बैशाखी खोजनी पड़े. न ही मुझे इस बात की कोई ललक है कि लोग मुझे पढ़ें ही, जाने ही और मेरी बातों को माने [...]
May 6, 2008 | Posted in
बात करामात |
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अमित सागर का ईमेल आया तो बात थोड़ी शायराना थी. मैंने सोचा फिर देख लेंगे. दोबारा देखा. तो कोई तारतम्य न बैठता था कि आखिर कौन हैं ये और कहना क्या चाहते हैं? आखिरी पैरे में बात पकड़ में आयी कि उन्होंने मेरी कोई टिप्पणी पढ़ी है और उन बातों ने उनको प्रभावित किया है.
पहली [...]
May 5, 2008 | Posted in Uncategorized |
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मुझे लगता है राज ठाकरे किसी गंभीर मानसिक रोग से ग्रस्त हैं क्योंकि जिस तरह से वो जहर उगल रहे हैं वैसा कोई स्वस्थ आदमी तो नहीं कर सकता है। अपना राजनैतिक वजूद बनाने के लिए कोई इस स्तर तक कैसे जा सकता है। उनकी सभाओं में जुटने वाले लोगों को शायद पता नहीं है [...]
May 4, 2008 | Posted in
बात करामात |
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ऐसा लगता है कि अब यह मान लिया गया है कि “नैतिक शिक्षा” की बात करना दकियानूसी है और सार्वजनिक स्त्री-पुरुष सम्बन्धों में नैतिकता की बात करना बेवकूफ़ी। सरकारों की सोच है कि समाज को खुला छोड़ देना चाहिये और उस पर कोई बन्धन लागू नहीं करना चाहिये, ठीक वैसे ही जैसा कि सरकारों ने [...]
May 3, 2008 | Posted in
बात करामात |
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हम थे वो(हिन्दी) थी, वो थी हम थे
हम थे वो थी और समा रंगीन
समझ गए न
जाते थे जापान (तकनीक की मक्का), पहूँच गए चीन,
समझ गए न,
याने याने गड़बड़ होना ही था.
ओ मन्नू (चीनी) तेरा हुआ, अब मेरा क्या होगा।
गुड़गाँवा जाना हुआ, बाज़ार घूमते एक रेड़ी पर नज़र पड़ी, भीड़ थी मानो कुछ मुफ्त मिल [...]
May 2, 2008 | Posted in
बात करामात |
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