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	<title>visfot.blog &#187; ईसाई मिशनरी</title>
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		<title>अब कामिक्स के जरिए ईसाईयत का प्रचार</title>
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		<pubDate>Sat, 21 Jun 2008 11:12:34 +0000</pubDate>
		<dc:creator>संजय तिवारी</dc:creator>
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		<category><![CDATA[ईसाई मिशनरी]]></category>

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			<content:encoded><![CDATA[<p>उत्तर प्रदेश में कामिक्स के जरिए ईसाईयत का प्रचार किया जा रहा है. ईसाई संगठन गास्पेल मिशन आफ इण्डिया द्वारा हाल में ही एक कामिक्स प्रकाशित किया गया था जिसका नाम है सर्वश्रेष्ठ उपहार. इस सर्वश्रेष्ठ उपहार नामक कामिक्स में कहानी के जरिए बाईबिल की जानकारी दी गयी है. कहानी के मुख्य पात्र विशाल व वैशाली नाम के दो बच्चे हैं. बच्चों का यह चरित्र आपस में बातचीत करते हुए कामिक्स में कई बार कहता है कि उन्हें यीशू पर भरोसा है और वे चाहते हैं कि &#8220;यीशू उनका प्रभु हो जाए.&#8221;</p>
<p>गास्पेल मिशन आफ इण्डिया के इस अभियान पर प्रदेश के हिन्दू संगठनों और मुस्लिम उलेमाओं दोनों ने गंभीर आपत्ति जताई है. उनका आरोप है कि यह पुस्तक देश के हिन्दू, मुस्लिम बच्चों को धर्म परिवर्तन के लिए उकसा रही है. संगठनों ने राज्य सरकार से इस कामिक्स पर तत्काल प्रतिबंध लगाने की मांग की है. उलेमाओं और हिन्दू संगठनों ने मुख्यमंत्री मायावती से सरकारी परिसर में धर्म परिवर्तन से जुड़े साहित्य को वितरित किये जाने की जांच कराने की भी मांग की है.</p>
<p>ज्ञात हो कि गास्पेल मिशन आफ इंडिया संगठन ने आपरेशन क्रिसमस चाईल्ड नाम से एक अभियान शुरू किया है. इसके तहत ही यह &#8220;सर्वश्रेष्ठ उपहार&#8221; बच्चों में मुफ्त बांटी जा रही है. बुधवार को एक यूरोपीयन महिला के साथ गास्पेल के कुछ कार्यकर्ता लखनऊ चिड़ियाघर के आस-पास यह पुस्तक बांट रहे थे जिसकी जानकारी फैलने पर विरोध शुरू हो गया.</p>

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		<title>ईसाई हूं, अब आरक्षण भी दो</title>
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		<pubDate>Mon, 04 Jun 2007 10:28:00 +0000</pubDate>
		<dc:creator>संजय तिवारी</dc:creator>
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		<category><![CDATA[ईसाई मिशनरी]]></category>
		<category><![CDATA[रिपोर्ट]]></category>

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ईसाईयों ने भी आरक्षण पर अपना दावा ठोंक दिया है.जल्द ही चेन्नई में देशभर के ईसाई इकट्ठा होंगे और सरकार पर दबाव बनाने की कोशिश शुरू करेंगे कि उन्हें भी आरक्षण के दायरे में लाया जाए. इसकी तैयारी लंबे समय से चल रही थी. अक्टूबर 2004 में सर्वोच्च न्यायालय ने केन्द्र सरकार को आदेश दिया [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p><a href="http://bp3.blogger.com/_ae352Y7bWYQ/RmPsx7zj8nI/AAAAAAAAAGU/mUR3PmFO7sM/s1600-h/dalit%20youth.bmp"><img style="float:left;cursor:hand;margin:0 10px 10px 0;" src="http://bp3.blogger.com/_ae352Y7bWYQ/RmPsx7zj8nI/AAAAAAAAAGU/mUR3PmFO7sM/s200/dalit%2520youth.bmp" border="0" alt="" /></a><br />
ईसाईयों ने भी आरक्षण पर अपना दावा ठोंक दिया है.जल्द ही चेन्नई में देशभर के ईसाई इकट्ठा होंगे और सरकार पर दबाव बनाने की कोशिश शुरू करेंगे कि उन्हें भी आरक्षण के दायरे में लाया जाए. इसकी तैयारी लंबे समय से चल रही थी. अक्टूबर 2004 में सर्वोच्च न्यायालय ने केन्द्र सरकार को आदेश दिया था कि वह एक ऐसे आयोग का गठन करे जिससे यह पता चले कि देश में अल्पसंख्यकों की वास्तविक स्थिति कैसी है. इसी के बाद सरकार ने रंगनाथ मिश्रा आयोग का गठन किया था. इस आयोग ने अपनी सिफारिश प्रधानमंत्री को सौंप दी है. आयोग ने सिफारिश कर दी है संविधान में बदलाव कर देना चाहिए जो कि अभी जाति और पिछड़ेपन के नाम पर ही आरक्षण देता है. इस बदलाव के बाद ईसाई भी आरक्षण के दायरे में आ जाएंगे.<br />
21 मई को प्रधानमंत्री को सौंपी अपनी रिपोर्ट में आयोग ने बड़ी चालाकी से सिफारिश कर दी है कि ईसाईयों को भी अनुसूचित जाति के तहत आरक्षण का लाभ मिलना चाहिए. जुलाई में सरकार यह रिपोर्ट सुप्रीम कोर्ट को सौंप देगी उसके बाद सुप्रीम कोर्ट को निर्णय करना होगा कि ईसाईयों को दलितों के कोटे से आरक्षण मिलना चाहिये या नहीं.<br />
असल में ईसाई मिशनरियां लंबे समय से इस प्रयास में थीं कि हिन्दू से धर्म परिवर्तन करनेवाले ईसाईयों को भी आरक्षण का लाभ मिलना चाहिए. ऐसा इसलिए भी जरूरी था क्योकि आरक्षण की सुविधा के कारण देश में धर्म परिवर्तन में वह तेजी नहीं आ रही है जिसका प्रयास वेटिकन लगातार कर रहा है. सन 2001 में पोप ने अपनी भारत यात्रा के दौरान ही यह ऐलान कर दिया था कि ईसाईयत के लिहाज से इक्कीसवीं सदी एशिया के लिए है. मतलब साफ है कि वेटिकन और उसके सहायकों का पूरा जोर इस बात पर होगा कि एशिया और खासकर भारत में.<br />
<a href="http://bp2.blogger.com/_ae352Y7bWYQ/RmPttrzj8oI/AAAAAAAAAGc/2LelRpy5wDE/s1600-h/OFH_village_church.jpg"><img style="float:left;cursor:hand;margin:0 10px 10px 0;" src="http://bp2.blogger.com/_ae352Y7bWYQ/RmPttrzj8oI/AAAAAAAAAGc/2LelRpy5wDE/s200/OFH_village_church.jpg" border="0" alt="" /></a><br />
सब जानते हैं कि पिछड़े वर्ग की गरीबी का लाभ उठाकर ईसाई मिशनरियां धर्म परिवर्तन कर रही हैं. वे भारतीय जाति व्यवस्था को पानी पी पीकर गाली देते हैं. फिर ऐसे में अचानक इस तरह भारतीय जाति व्ववस्था के तहत आरक्षण की मांग करके वे क्या साबित करना चाहते हैं. फ्रैंकलिन थामस वे व्यक्ति हैं जिनकी याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने आयोग बनाने का आदेश दिया था. थॉमस बताते हैं कि देश में 2.34 करोड़ ईसाईयों में 1.80 करोड़ दलित हैं. अगर उनके बराबर के ही अन्य भाईयों को आरक्षण का लाभ मिला हुआ है तो दलित ईसाईयों को इसका लाभ क्यों नहीं मिलना चाहिए. इस तर्क के पीछे बड़ी चालाकी से यह बात छुपा ली जाती है कि ईसाईयों में तो जाति व्यवस्था होती नहीं तो फिर ये दलित ईसाई कहां से पैदा हो गये. हिन्दूओं के पिछड़ेपन का ही लाभ उठाकर तो बड़े पैमाने पर धर्म परिवर्तन किया जाता है. अगर धर्म परिवर्तन करने के बाद भी वे दलित और पिछड़े ही रह जाते हैं तो ईसाईयत और हिन्दू धर्म में फर्क क्या है?</p>

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