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	<title>visfot.blog &#187; कंपनीराज</title>
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		<title>पत्रकार या स्टेनोग्राफर</title>
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		<pubDate>Mon, 21 Apr 2008 00:05:00 +0000</pubDate>
		<dc:creator>संजय तिवारी</dc:creator>
				<category><![CDATA[कारपोरेट मीडिया]]></category>
		<category><![CDATA[कंपनीराज]]></category>

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		<description><![CDATA[हमारे बिजनेस अखबार आयातित बुद्धि के प्रभाव में कंपनियों को रिपोर्ट करते समय निवेश पत्रकारिता का रूख अपनाते हैं. अखबारों और चैनलों में बिजनेस रिपोर्टिंग में हर रोज ऐसी खबरें होती हैं कि यह कंपनी यहां इतना निवेश करेगी. वह कंपनी वहां उतना निवेश करेगी. लेकिन कभी आपने यह भी सुना कि उस निवेश की [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p>हमारे बिजनेस अखबार आयातित बुद्धि के प्रभाव में कंपनियों को रिपोर्ट करते समय निवेश पत्रकारिता का रूख अपनाते हैं. अखबारों और चैनलों में बिजनेस रिपोर्टिंग में हर रोज ऐसी खबरें होती हैं कि यह कंपनी यहां इतना निवेश करेगी. वह कंपनी वहां उतना निवेश करेगी. लेकिन कभी आपने यह भी सुना कि उस निवेश की जरूरत वहां है कितनी? या फिर निवेश करने का प्रभाव होगा या दुष्प्रभाव. हमारे बिजनेस अखबार इसे पत्रकारिता नहीं मानते. वह जो निवेश कर रहा है उससे उसे फायदा कितना होगा और समाज-पर्यावरण को कितना नुकसान इसका कोई आंकलन कभी हमारे बिजनेस पत्रकार नहीं करते. भाई कुएं में बाल्टी डालने की खबरें देते हो लेकिन उसने वहां से कितना पानी उलीचा कभी यह खबर क्यों नहीं बनाते?</p>
<p>इसीलिए मैं इन पत्रकारों को कंपनी पत्रकार कहता हूं. पत्रकार भी क्यों कहें? पी साईंनाथ ठीक कहते हैं कि असल में ये लोग स्टेनोग्राफर हैं. जो कंपनियों से डिक्टेशन लेते हैं. इस डिक्टेशन के बदले उन्हें तनख्वाह के अलावा कुछ गिफ्ट-शिफ्ट भी मिल जाता है.</p>
<p>पत्रकारिता तो शायद ही कहीं बची हो. हिन्दी टीवी चैनलों ने अपनी औकात दिखा दी है और यह साबित कर दिया है कि हिन्दी लुच्चों और लफंगों की भाषा है इसलिए उनकी प्राथमिकता वही लोग हैं. बिजनेस अखबर और चैनल तो कंपनियों को रिपोर्ट करने को ही पत्रकारिता समझते हैं. लगता है फिर पश्चिम से कोई हवा आयेगी तो इन पत्रकारों की बुद्धि ठिकाने आयेगी इनकी अपनी कोई समझ तो बची नहीं है.</p>
<p>पत्रकारिता का एक मूलभूत सिद्धांत है कि वह खबर नहीं है जो आपके पास चलकर आती है. खबर वह है जिसके पास चलकर आप जाते हैं. और इस चलने-फिरने में भी एक बात नहीं भूलनी चाहिए आपका अंतिम लक्ष्य आम आदमी की भलाई, उसका हक-हित सुरक्षित करना है न कि कंपनियों और साम्राज्यवादी ताकतों का. लेकिन अव्वल तो पत्रकारों ने चलने-फिरने से ही तौबा कर लिया है. चलते-फिरते भी हैं तो वहीं जाते हैं जहां उन्हें ले जाया जाता है.</p>
<p>ज्यादा कुछ तो नहीं सिर्फ इतनी प्रार्थना करता हूं कि ऐसे स्टेनोग्राफरों से भगवान इस देश की रक्षा करें.</p>

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		<title>ग्रोथ उग्रवाद</title>
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		<pubDate>Sun, 20 Apr 2008 09:00:00 +0000</pubDate>
		<dc:creator>संजय तिवारी</dc:creator>
				<category><![CDATA[बात करामात]]></category>
		<category><![CDATA[कंपनीराज]]></category>
		<category><![CDATA[विकास]]></category>

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		<description><![CDATA[उग्रवाद के दो प्रकार हैं. आजकल हम जिसे उग्रवाद समझ रहे हैं वह प्रतिक्रिया में पैदा हुआ है. लेकिन असली उग्रवाद वह है जो प्रतिक्रिया के लिए प्रेरित करता है. इस उग्रवाद को पिछले 200-300 सालों से व्यापार कहा जाने लगा है. आजकल पूरे भूमंडल पर इसी उग्रवाद का बोलबाला है.
इन ग्रोथ उग्रवादियों का अपना [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p>उग्रवाद के दो प्रकार हैं. आजकल हम जिसे उग्रवाद समझ रहे हैं वह प्रतिक्रिया में पैदा हुआ है. लेकिन असली उग्रवाद वह है जो प्रतिक्रिया के लिए प्रेरित करता है. इस उग्रवाद को पिछले 200-300 सालों से व्यापार कहा जाने लगा है. आजकल पूरे भूमंडल पर इसी उग्रवाद का बोलबाला है.</p>
<p>इन ग्रोथ उग्रवादियों का अपना ही विज्ञान है जो पश्चिम के साम्राज्यवादी ईसाई  विचारधारा का पालन-पोषण करता है. ये ग्रोथ उग्रवादी आपको दुनिया के हर हिस्से में मिल जाएंगे. सोमालिया में बंदूक बेचते हुए तो बांग्लादेश में कबाड़ के कारोबार से लोगों की जान लेते हुए या फिर थाईलैण्ड की पवित्र संस्कृति को नष्ट-भ्रष्ट करते हुए. व्यापार के नाम पर ये ग्रोथ उग्रवादी न केवल पर्यावरण का शोषण करते हैं बल्कि समाज, व्यक्ति, जीव और जीवन सबको संकट में डाले बैठे हैं. पहले आपको कहेंगे कि ग्रोथ रेट बढ़ाओ, जब आप अपना ग्रोथ रेट बढ़ा लेते हैं तो कहते हैं कि आपका पर्यवारण नष्ट हो रहा है. आप तो जाहिल हैं. आपको पर्यावरण के बारे में कुछ पता ही नहीं है.</p>
<p>अपने देश में भी बहुत सारे ग्रोथ उग्रवादी पैदा हो गये हैं. सरकार तो खैर घोषित तौर ग्रोथ उग्रवादियों की गोद में बैठी हुई है. बहुत सारे विचारक, पत्रकार, वैज्ञानिक, इंजीनियर और डाक्टर भी ग्रोथ उग्रवादियों की गिरफ्त में हैं. गिरफ्त में क्या वे खुद ही ग्रोथ उग्रवादी बन गये हैं. अपने पड़ोसी को लूटना हो लूट लो, पर्यावरण का नाश करना हो कर दो, पानी को विषैला बनाना हो बना दो, हवा को जहरीला बनाना है बना दो, बस किसी तरह ग्रोथ उग्रवादियों की लिस्ट में अपना नाम शामिल कराने की होड़ लगी हुई है.</p>
<p>फिर अगर अलकायदा, माओवादी, नक्सली, जेहादी पैदा होते हैं तो उन्हें उग्रवादी घोषित कर दो. उनके खिलाफ शसस्त्र संघर्ष करो इससे ज्यादा स्थाई और संपन्न बनानेवाला हथियार उद्योग का ग्रोथरेट बढ़ता है. बहुराष्ट्रीय कंपनियां और दुनियाभर के शेयर बाजार असल में ग्रोथ उग्रवाद के जनक हैं लेकिन तमाशा देखिए हम उन्हें विकास के दूत मान रहे हैं.</p>

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		<title>आईआईएम और आईआईटी ने भारत को बर्बाद किया है</title>
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		<pubDate>Sun, 13 Jan 2008 15:09:00 +0000</pubDate>
		<dc:creator>संजय तिवारी</dc:creator>
				<category><![CDATA[बात करामात]]></category>
		<category><![CDATA[कंपनीराज]]></category>

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		<description><![CDATA[मैं नहीं जानता यह कौन सज्जन हैं जिन्होंने मेरे पिछले पोस्ट पर ऐतराज जाहिर किया है और कहा है कि &#8220;It is really unfortunate to see that you are accusing IIT and IIMs. which on India feels proud.&#8221; वे मेरा ब्लाग पढ़ते हैं और मेरा ऐसा कहना उन्हें बुरा लगा है लेकिन अब मैं जो [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p><a href="http://bp2.blogger.com/_ae352Y7bWYQ/R4ox5WQFsdI/AAAAAAAAApA/EUTpanrScGk/s1600-h/iim%2520logo.jpg"><img style="float:left;cursor:hand;margin:0 10px 10px 0;" alt="" src="http://bp2.blogger.com/_ae352Y7bWYQ/R4ox5WQFsdI/AAAAAAAAApA/EUTpanrScGk/s200/iim%2520logo.jpg" border="0" /></a>मैं नहीं जानता यह कौन सज्जन हैं जिन्होंने मेरे <a href="http://visfot.blogspot.com/2008/01/blog-post_3726.html">पिछले पोस्ट </a>पर ऐतराज जाहिर किया है और कहा है कि &#8220;It is really unfortunate to see that you are accusing IIT and IIMs. which on India feels proud.&#8221; वे मेरा ब्लाग पढ़ते हैं और मेरा ऐसा कहना उन्हें बुरा लगा है लेकिन अब मैं जो कहूंगा उन्हें और भी बुरा लगेगा. मैं उनसे अग्रिम माफी मांगते हुए उन्हीं की बात से शुरू करना चाहूंगा कि भारत को बहुध्रुवीय और बहुआयामी विकास की प्रणाली चाहिए. इसका मतलब होता है कि हर एक को विकसित होने का मौका मिलना चाहिए.</p>
<div>
<div></div>
<div>भारतीय समाज या फिर कोई भी समाज जो एक क्रमिक प्रणाली से विकसित होता है वहां ऐसी बहुत सी धाराएं अपनेआप बह निकलती हैं जो समाज के हर वर्ग की जरूरतों को पूरा करती हैं. लेकिन संगठित मानसिकता के लोगों को यह सब बर्दास्त नहीं. पूरी दुनिया उनकी मुट्ठी में होनी चाहिए. आईआईटी और आईआईएम जैसे शिक्षा संस्थान भारत को गुलाम बनाने का काम करते हैं. ये संस्थान ऐसे मजदूर तैयार करते हैं जो विदेशी प्रणाली को देश पर काबिज होने में मदद करती हैं. जो लोग आईआईटी और आईआईएम पर बहुत गर्व करते हैं न तो उन्हें भारत के बारे में कुछ खास मालूम है और न ही इस संस्थानों की स्थापना के बारे में. </div>
<p>
<div></div>
<div>बहुत कम लोगों को पीएल-480 गेहूं के आयात के बारे में अब मालूम होगा. उन दिनों दिनमान में काम करनेवाले एक पत्रकार बताते हैं कि भारत सरकार डॉलर में भुगतान करने में सक्षम नहीं था. अमरीका ने कहा कि आप रूपये में भुगतान करना चाहते हैं हम बताते हैं कि आपको यह पैसा कहां लगाना चाहिए. फिर ऐसे बहुत से तकनीकि और व्यावसायिक संस्थानो में पैसा लगाया गया और अमरीका के मर्जी के हिसाब से उनकी रचना की गयी. आईआईटी और आईआईएम उसी पैसे से पैदा हुए हैं.</div>
<p>
<div></div>
<div>कितने IITns हैं जो देश के लिए काम करते हैं? सीधे तौर पर किसी को स्वार्थी कहना बुरा लगता ही है लेकिन IITns ने देश को अवसरविहीन करने के जितने रास्ते तैयार किये हैं उतने अंग्रेजों ने भी नहीं किये थे. बड़ी कंपनियों को कारीगर और ऊंचे दर्जे के मजदूर चाहिए तो वह आईआईटी ओर रूख करता है. अगर आप पैसा दे सकते हैं आईआईटीवाला आपके लिए कुछ भी काम करने को तैयार रहता है. अव्वल तो वह देश में रूकता नहीं रूकता भी है तो बड़ी कंपनियों के लिए काम करता है क्योंकि उसको इतना ज्यादा पैसा चाहिए जो छोटे उद्यमी दे ही नहीं सकते. विदेशी कंपनियों को अपने मुताबिक एक शिक्षण संस्थान मिल गया है जहां वे अपने किस्म के मजदूर तैयार कर सकते हैं. हां कुछ जुनूनी लोग यहां भी होते हैं लेकिन उनकी भी वही हालत होती है जो आमतौर पर किसी सच बोलनेवाले की होती है. </div>
<p>
<div></div>
<div>आईआईटी से भी ज्यादा खतरनाक शिक्षण संस्थान है आईआईएम. भारत में बाजार के रास्ते शोषण के जो हथियार विकसित किये जा रहे हैं उनमें सबसे ज्यादा योगदान आईआईएम वालों का ही है. जो लोग मेरी बात से असहमत हैं उन्हें कुछ साल इस विषय पर काम करना चाहिए. भारत को समझने की कोशिश करनी चाहिए. अपने धरातल पर खड़े होकर सोचना चाहिए. हमारा अपना क्या है, हमारी अपनी समझ क्या है, भारत क्या है और भारत में विकास की प्रणालियां कैसी हैं. अपने गुनिया को गाली देकर आप टाईवाले इंजीनियर का महिमामण्डन मत करिए. देश को बहुत कीमत चुकानी पड़ेगी. समाज और हर इंसान को इसकी बहुत कीमत चुकानी पड़ेगी. </div>
</div>

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		<title>दरिद्र और नकलची होकर भी हम &quot;इलिट&quot; की तरह क्यों व्यवहार करते हैं?</title>
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		<pubDate>Sat, 12 Jan 2008 15:38:00 +0000</pubDate>
		<dc:creator>संजय तिवारी</dc:creator>
				<category><![CDATA[बात करामात]]></category>
		<category><![CDATA[कंपनीराज]]></category>

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		<description><![CDATA[मैं अक्सर कंपनियों के खिलाफ लिखता और बोलता हूं. यह कोई भावावेग नहीं है, मैं पिछले दस सालों से कंपनियों के काम-काज के तरीकों को ही जानने समझने में लगा हूं. और जितना मैं इसको जानता गया मुझे लगने लगा कि भारत नयी तरह की मानसिक गुलामी का शिकार होता जा रहा है. यह नयी [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p>मैं अक्सर कंपनियों के खिलाफ लिखता और बोलता हूं. यह कोई भावावेग नहीं है, मैं पिछले दस सालों से कंपनियों के काम-काज के तरीकों को ही जानने समझने में लगा हूं. और जितना मैं इसको जानता गया मुझे लगने लगा कि भारत नयी तरह की मानसिक गुलामी का शिकार होता जा रहा है. यह नयी प्रकार की दासता है बहुत खतरनाक क्योंकि यहां आपके सामने कोई दुश्मन नहीं है. आप अपने ही दुश्मन हैं. आपकी अपनी ही बुद्धि फिर गयी है. अंग्रेजी में कहना हो तो कहेंगे आपके माईंड की कंडिशनिंग हो गयी है.</p>
<p>कारपोरेट कल्चर में कई शब्द हैं जिनका ठीक अर्थ आपको समझ में आ जाए तो आपको कंपनियों से नफरत हो जाएगी. जैसे उनकी शब्दावली में एक शब्द है- टैप द मार्केट. यानी जो कुछ सामने दिख रहा है उसको दबोच लो. इस दबोच लेने के लिए कंपनियां जो रणनीति अख्तियार करती हैं उसको कहा जाता है मार्केटिंग प्लानिंग और एक्सक्यूजन. कंपनियों की नजर में किसी भी वस्तु, व्यक्ति का तब तक कोई अस्तित्व नहीं है जब तक कि उस व्यक्ति और वस्तु के साथ कंपनियों का फायदा न जुड़ जाए. मान लीजिए आप रीठे से अपना बाल धो लेते हैं तो आप पिछड़े हुए प्राणी हैं. लेकिन आप रीठेवाले शैंपू से बाल धोते हैं तो आप विकसित जीव हो जाते हैं. क्योंकि यह शैंपू कोई कंपनी बनाती है इस तरह अब आपकी जिंदगी में एक कंपनी का दखल हो गया.</p>
<p>इसलिए कंपनियों के प्रभाव से क्रांति लाने वाले दोस्त लोग सलाह दे रहे हैं चिंतन करो, विश्वास करो, ऐसे बाजार को गाली मत दो. मैं बाजार को कभी गाली नहीं देता लेकिन एक सवाल जरूर पूछता हूं आपका अस्तित्व बाजार के लिए है या आप बाजार के लिए जी रहे हैं. दुर्भाग्य से आज जिसे व्यवसाय कहा जाता है वह शातिर, धूर्त और बेईमान लोगों का कुनबा है जो व्यावसायिक प्लानिंग के नाम पर लोगों को लूटने, ठगने की योजनाएं बनाता है. मल्टी लेवल मार्केटिंग (MLM) इसका बहुत अच्छा उदाहरण है. मैं देखता हूं मार्केटिंग गुरू कहे जानेवाले लोग कितने संवेदनहीन होते हैं जो सुबह से शाम तक यही योजना बनाते रहते हैं भोली-भाली जनता जो अपने हिसाब से जी रही है उसको कैसे लूटा जाए.</p>
<p>असल में भारत को बर्बाद करने वाली दो संस्थाएं हैं. पहली है आईआईटी(IIT) और दूसरी है आईआईएम(IIM). यह मैं मानता ही हूं लेकिन जब आईआईएम के कुछ छात्र और आईआईटी के कुछ प्रोफेसरों ने मेरी बात से इत्तेफाक जाहिर किया तो मुझे लगा कि ऐसा सोचनेवाला मैं अकेला नहीं हूं. आईआईटी ने इस देश की तकनीकि को खत्म कर दिया और आईआईएम इस देश की बाजार व्यवस्था और मार्केटिंग को खत्म करके विदेशी मॉडल स्थापित कर रहा है. यह बहुत बड़ा झूठ है कि भारत की अपनी कोई बाजार व्यवस्था नहीं है. भारत जैसी उन्नत बाजार व्यवस्था दुनिया के कितनी देशों में होगी मुझे नहीं मालूम. इस विषय पर विस्तार से सोचने की जरूरत है. हमारी हीन भावना ने कभी हमें अपनी बाजार व्यवस्था की ओर ताकने ही नहीं दिया. फिर दोष भी इतने आ गये कि लगा इसे खत्म ही कर दो. लेकिन उसकी जगह जो नया रहा है वह क्या है?</p>
<p>वह उस शाहूकारी बाजार व्यवस्था से सौ गुना अधिक शोषक और दमनकारी व्यवस्था है. नयी बाजार व्यवस्था आपको ऐसा रक्त पिपासु बना देती है जो अपने ही लोगों का खून चूसकर ऐशो-आराम की चीजें इकट्ठा करता है. कंपनियां लोगों को जड़ और बुद्धिहीन बनाती हैं. मनुष्य के स्वाभाविक विकास को रोक देती हैं और आप ऐसी नाजायज और गैरजरूरी बातों में उलझ जाते हैं कि आपको पता ही नहीं चलता कि आपके होने का कुछ और मतलब भी हो सकता है. मानों आप कंपनियों के लिए जी रहे हैं. यही आपके जीने की सार्थकता है. सुना है यूरोप और अमरीका में दो सौ साल बाद अब जाकर होश आया है कि हमें मनुष्य होने का प्रमाण देना चाहिए. गाँधी शांति प्रतिष्ठान में एक अमरीकी मिला था. बड़ी देर बात करने के बाद उसने एक सवाल किया जिससे हम सब निरूत्तर हो गये<br />
. उसने कहा कि आपकी सारी बातें ठीक हैं. लेकिन यह बताईये जो समाज एक कमरे में सिमटकर बैठ गया हो उसको कुछ कहें भी तो कैसे? उसके पास आप पहुंच ही नहीं सकते. वह दिन भर टीवी देखता है. इंटरनेट पर घूमता है. और ये ऐसे माध्यम हैं जिनका उपयोग कंपनियां अपना प्रभाव बढ़ाने के लिए करती हैं.</p>
<p>असल में आज हम लोग जिस बाजार व्यवस्था में सम्मान खोज रहे हैं वह थोथी है और इस व्यवस्था के सहारे हम जितना सम्मान खोजेंगे पूंजीपति और बड़े पूंजीपति होते चले जाएंगे. यह बहुत शातिर मार्केटिंग तकनीकि है कि बाजार के सामान को आपकी हैसियत के साथ जोड़ दिया जाए. अब आपको सम्मानित महसूस करना है तो आपको बाजार को अमीर बनाना ही होगा. क्या हम ऐसा व्यवहार करने के योग्य हैं? विदेशी तकनीकि, पैसे, सोच, समझ और रणनीति के सहारे क्या हम इलिट होने का दिखावा भर नहीं कर रहे हैं? क्या उधार के पैसे और नकल के ज्ञान से सचमुच कोई व्यक्ति संपन्न अनुभव कर सकता है?</p>

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		<title>दातुन करना पिछड़ापन है तो ब्रश करना?</title>
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		<pubDate>Tue, 18 Dec 2007 05:09:00 +0000</pubDate>
		<dc:creator>संजय तिवारी</dc:creator>
				<category><![CDATA[बात करामात]]></category>
		<category><![CDATA[कंपनीराज]]></category>

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		<description><![CDATA[सालभर पहले की बात है. कोलगेट-पामोलिव कंपनी के आला अधिकारी तमिलनाडु के एक गांव का दौरा करने गये थे. यह उस सर्वेक्षण का हिस्सा था जिसमें इस बात की जांच चल रही थी कि कंपनी के कोलगेट ब्राण्ड का देश में कितना प्रभाव हुआ है. गांव में कई बुजुर्गों के दांतों की जांच की गयी. [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p><a href="http://bp1.blogger.com/_ae352Y7bWYQ/R2djU2QFsMI/AAAAAAAAAmE/UdOFyRErPZw/s1600-h/colgate.jpg"><span style="font-size:130%;"><img style="float:right;cursor:hand;margin:0 0 10px 10px;" alt="" src="http://bp1.blogger.com/_ae352Y7bWYQ/R2djU2QFsMI/AAAAAAAAAmE/UdOFyRErPZw/s200/colgate.jpg" border="0" /></span></a><span style="font-size:130%;">सालभर पहले की बात है. कोलगेट-पामोलिव कंपनी के आला अधिकारी तमिलनाडु के एक गांव का दौरा करने गये थे. यह उस सर्वेक्षण का हिस्सा था जिसमें इस बात की जांच चल रही थी कि कंपनी के कोलगेट ब्राण्ड का देश में कितना प्रभाव हुआ है. गांव में कई बुजुर्गों के दांतों की जांच की गयी. बुजुर्गों के दांत दुरूस्त निकले. वे चना-मटर जैसी ठोस चीजें भी खा रहे थे और गन्ना भी चूस रहे थे लेकिन उन्होंने कभी ब्रश नहीं किया था. ब्रश करना तो दूर उन्होंने कभी कोलगेट का नाम भी नहीं सुना था. अधिकारी वापस चेन्नई लौट आये. कई दिनों तक इसी बात पर बहस होती रही कि बिना कोलगेट के भी दांत स्वस्थ रह सकते हैं क्या?<br /></span><br /><span style="font-size:130%;">कोलगेट 200 साल पुरानी कंपनी है और इसकी शुरूआत विलियम कोलगेट ने न्यूयार्क में की थी. आज मल्टीब्राण्ड बन चुकी यह कंपनी शुरूआती दिनों में मोमबत्ती और साबुन बनाती थी. अकेले भारत में यह 9500 मिलियन रूपये का कारोबार कर रही है. पिछले 70 सालों से वह देश में व्यापार कर रही है और आज देश के 35 लाख दुकानों पर सीधी अपनी पहुंच रखती है. यह सब उसकी इस रणनीति का परिणाम है कि हर मुंह में कोलगेट का ब्रश घुसना चाहिए. बहुत हद तक वे इस रणनीति में सफल भी हैं. लेकिन यह सफलता केवल कोलगेट की रणनीति और व्यावसायिक चातुर्य की वजह से नहीं आयी है. इसके लिए उन बहुत सारे लोगों ने ज्ञात-अज्ञात रूप से मदद की है जो आधुनिकता के पैरोकार हैं. आप जानना चाहते हैं कैसे?</span><br /><span style="font-size:130%;">सबसे पहले बात करते हैं फिल्मों की. ज्यादातर हालीवुड की नकल करनेवाली हमारी हमारी फिल्म इंडस्ट्री ने यह बात हमारे दिमाग में घुसा दी कि गंवई का मतलब होता है दातुन करना. अब हमारे अवचेतन मन में यह बैठ गया है कि दातुन करनेवाला आदमी तो गंवई और पिछड़ा होता है. इसी तरह हजारो-लाखों बार देखे गये विज्ञापनों से हमने यह मान लिया है कि दांत के <a href="http://visfot.blogspot.com/2007/12/blog-post_15.html">विशेषज्ञ</a> लोग कहते हैं कि कोलगेट करने से दांत मजबूत होता है. बिना किसी वैज्ञानिक उपकरण के हम उन कीटाणुओं को भी देख सकते हैं कि इनका स्वरूप कैसा होता है. यह सब एक मनोवैज्ञानिक आक्रमण है जिसमें आखिरकार हम पराजित हो जाते हैं. और मान लेते हैं कि हमें अपने दिन की शुरूआत राम नाम से नहीं बल्कि कोलगेट से करनी चाहिए. </span></p>
<p><span style="font-size:130%;">लेकिन आखिरकार हम क्या करते हैं? सुबह-सुबह उस प्लास्टिक को चबाते हैं जो निसंदेहरूप से खतरनाक होता ही है. इस प्लास्टिक के टुकड़े जिसे ब्रश कहा जाता है, पर पेस्ट का कुछ हिस्सा लगा दिया जाता है. पेस्ट बनाने के लिए आमतौर पर कैल्शियम डाई फास्फेट के लिए मरे हुए जानवरों की हड्डियों का चूरा, आपको आदत लग जाए इसके लिए आर्सेनिक नामक रसायन और झागवाला बनाने के लिए डिटर्जेन्ट मिलाया जाता है. थोड़ी मात्रा में निकिल और सीसा भी मिलाया जाता है जिससे यह तापमान रोधी हो जाए और गर्मी में पिघले नहीं और सर्दी में जमे नहीं. </span><br /><span style="font-size:130%;"></span><br /><span style="font-size:130%;">आप ही बताईये मूर्ख कौन बन रहा है? पिछड़ा हुआ कौन है? वह जो दातुन करता है या फिर वह जो सुबह-सुबह बाथरूम में ब्रश रगड़ता है? </span><br />var OB_platformType = 1; var OB_demoMode = false;var OB_langJS =&#8217;http://widgets.outbrain.com/lang_hi.js&#8217;;<br />उपयोगी लिंक<br /><a href="http://hgdp.blogspot.com/2007/12/blog-post_19.html">दांतो की देखभाल, हल्दी के साथ अन्य वनस्पतियां</a></p>

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		<title>स्वाभिमानी समाज की शब्दावली में कर्ज शब्द नहीं होता</title>
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		<pubDate>Sun, 16 Dec 2007 07:09:00 +0000</pubDate>
		<dc:creator>संजय तिवारी</dc:creator>
				<category><![CDATA[बात करामात]]></category>
		<category><![CDATA[कंपनीराज]]></category>
		<category><![CDATA[समाज]]></category>

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		<description><![CDATA[मध्य प्रदेश का बड़वानी जिला अपने प्रसिद्ध जैन तीर्थ के लिए जाना जाता है. इसी बड़वानी जिले में मुख्यालय से 35 किलोमीटर दूर एक छोटा सा गांव है अजंदी. कुल 100 परिवारों का गांव हैं. पाटीदार समाज के लोगों की बहुलता है. भारत के भूमण्डलीकण के 15 सालों की उपलब्धि की चर्चा हम लोग करते [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p><a href="http://bp3.blogger.com/_ae352Y7bWYQ/R2TflGQFsKI/AAAAAAAAAl0/dKt6eFVyWos/s1600-h/f1a0a64b10ceb3.jpg"><img style="float:left;cursor:hand;margin:0 10px 10px 0;" alt="" src="http://bp3.blogger.com/_ae352Y7bWYQ/R2TflGQFsKI/AAAAAAAAAl0/dKt6eFVyWos/s200/f1a0a64b10ceb3.jpg" border="0" /></a>मध्य प्रदेश का बड़वानी जिला अपने <a href="http://www.jainteerth.com/teerth/bawangaja.asp">प्रसिद्ध जैन तीर्थ </a>के लिए जाना जाता है. इसी बड़वानी जिले में मुख्यालय से 35 किलोमीटर दूर एक छोटा सा गांव है अजंदी. कुल 100 परिवारों का गांव हैं. पाटीदार समाज के लोगों की बहुलता है. भारत के भूमण्डलीकण के 15 सालों की उपलब्धि की चर्चा हम लोग करते हैं लेकिन कभी बड़वानी जैसे प्रयोगों की ओर नहीं ताकते जो केवल विकास ही नहीं बल्कि अपने आप में एक नया जीवन दर्शन सबके सामने रखते हैं. हो सकता है उन्होंने भारत सरकार के भारत निर्माण के बारे में न सुना हो लेकिन 100 परिवारों के इस समूह ने जो कर दिखाया है वह इस बात की ओर संकेत है कि भारतीय समाज की समृद्धि के बीज शायद भूगर्भ में आज भी शेष हैं जिससे रह-रह कर पौध निकल आती है.
<div></div>
<p>
<div>10 साल पहले यहां के लोगों ने आपस में मिलकर तय किया कि वे गांव और समाज के विकास के लिए मिलजुल कुछ करेंगे. तय किया गया कि हम जो कुछ पैदा करते हैं उसका सौंवा हिस्सा समाज के नाम पर निकालकर अलग रखेंगे. मुख्य रूप से यहां गेहूं, कपास, सोयाबीन और मिर्च की खेती होती है. व्यक्तिगत रूप से अलग किया गया यह सौंवा हिस्सा धीरे-धीरे एक जगह जमा होने लगा. सालभर में जो कुछ जमा होता उसके लिए एक कोश बना दिया गया. धन हो तो विकार उसके साथ चला ही आता है. यह विकार न पनपे इसलिए कोष भगवान राम के नाम पर तैयार किया गया. अब निजी जीवन का यह सौंवा हिस्सा किसी व्यक्ति का नहीं बल्कि सबका है. और जो सबका होता है उसका मालिक तो कोई अलौकिक शक्ति ही होती है. इंसान तो सिर्फ ट्रष्टी होता है. </div>
<p>
<div></div>
<div>दस सालों में इस कोष से मंदिर का जीर्णोद्धार ही नहीं किया गया एक सार्वजनिक धर्मशाला बनवायी गयी जिसका उपयोग पूरा गांव और जरूरत होने पर आस-पास के लोग भी करते हैं. अब तक 35 लाख रूपये से भी अधिक कोष में इकट्ठा हो चुका है. अब उसी मालिक का भव्य मंदिर बनाया जा रहा है जिसकी प्रेरणा से यह कार्य शुरू हुआ. आज यह गांव 35 लाख की मिल्कियतवाला गांव है जो साझा संपत्ति है. गांव के बड़े-बुजुर्ग इस कोष का उपयोग करने के रास्ते बताते हैं. जहां व्यवसाय नहीं बल्कि जरूरतों का ध्यान रखा जाता है. लेकिन सबसे चौंकानेवाली और प्रेरक बात है इनके द्वारा किया जा रहा धन का पुनर्वितरण. यह पैसा कर्ज के रूप में बंटता है लेकिन वैसे नहीं जैसी कर्ज की हमारी अवधारणा बन चुकी है.</div>
<p>
<div></div>
<div>2001 से 2004 के बीच मध्य प्रदेश के अधिकांश हिस्सों में सूखा पड़ा. यहां भी सूखा पड़ा. पाटीदार समाज ने तय किया कि कर्ज पर ब्याज चार प्रतिशत नहीं बल्कि दो प्रतिशत लिया जाएगा. चार सालों तक यही व्यवस्था चली. स्थिति बेहतर हुई तो पुनः कर्ज पर व्याज बढ़ाकर चार प्रतिशत कर दिया गया. इसके लिए न प्लानिंग कमीशन की मंजूरी लेने की जरूरत थी और न ही प्रेसवालों को बयान जारी करना पड़ा कि हम ऐसा कर रहे हैं. उनका समाज, उनकी जरूरतें और उनके ही द्वारा बनाये गये रास्ते. जब आप अपने लिए ही काम कर रहे हों तो किसी और को बताने की जरूरत ही क्या है?</div>
<p>
<div></div>
<div>यह गांव उनके लिए भी एक उदाहरण है जो यह मानते हैं कि बिना कर्ज की व्यवस्था को मजबूत बनाए देश का विकास नहीं हो सकता. योजनाएं तो प्लानिंग कमीशन को ही बनानी चाहिए. सरकार को और जवाबदेह होना चाहिए और वित्तिय कंपनियों को ज्यादा से ज्यादा कर्ज बांटना चाहिए. एक लाख किसान मर गये उसके मूल में एक ही बात थी कि उन्होंने बड़ी वित्तीय कंपनियों से कर्ज लेकर खेती में निवेश किया और फसल ठीक नहीं होने पर सारा नुकसान उन्हें ही उठाना पड़ा. वित्तीय कंपनियों ने कर्ज दिया था इसलिए उन्हें वापस चाहिए ही था. उन्होंने दबाव बनाना शुरू किया तो आत्महत्याओं का ऐसा सिलसिला शुरू हुआ जो अभ<br />
ी भी जारी है. सरकार ने राहत के नाम पर सिर्फ इतना किया है कि कुछ इलाकों में कर्ज वसूली पर थोड़े वक्त के लिए रोक लगा दिया था. कुछ जगहों पर ब्याज माफ कर दिया था और वित्तीय कंपनियों को जो पैसा देना था वह सरकार ने खुद जमा कर दिया. </div>
<div></div>
<p>
<div>वित्तीय कंपनियों को ब्याज का पैसा सरकार से मिल गया और मूल जस का तस बना हुआ है जिसे किसी न किसी दिन उस किसान के वंशजों को चुकाना ही पड़ेगा. तो विकास के इस खेल में सबसे ज्यादा फायदे में कौन रहा? जाहिर सी बात है कंपनियों को सबसे अधिक फायदा हुआ. उनके मूल धन पर उगाही जारी है. सरकारी इंडेक्स में हमारी जीडीपी में दशमल कुछ प्रतिशत का इजाफा हो गया होगा क्योंकि कंपनियों का सारा एकाउंट आडिट होता है. इसलिए सरकार ने जो क्षतिपूर्ति की वह एक तरह का व्यवसाय हो गया. क्योंकि यह व्यवसाय आडिटेड है इसलिए यह हमारी जीडीपी में जुड़ गया होगा. सरकार भी खुश हो जाती है कि आखिरकार जीते-जी न सही मरकर ही किसानों ने उसके विकास इंडेक्स में कुछ इजाफा कर दिया. </div>
<p>
<div></div>
<div>बड़वानी के पाटीदार हमें रास्ता दिखा रहे हैं कि असल में किसी भी सभ्य और स्वाभिमानी समाज की शब्दावली में कर्ज शब्द नहीं होना चाहिए. स्वाभिमानी समाज में दूसरे की जरूरतों को पूरा करने के लिए जो शब्द संजोकर रखा गया है वह है मदद. समाज का कोई हिस्सा कमजोर हो जाए तो उसे मदद करके उबार लिया जाता है कर्ज देकर दबाया नहीं जाता. इसीलिए एक अघोषित व्यवस्था हर तरह के समाज में होती थी कि अपनी कमाई का एक निश्चित हिस्सा आप समाज के लिए खर्च करेंगे. अब पढ़े-लिखे लोग तो कर्ज लेने का गणित सीख गये हैं, जो अभी भी पढ़ाई के प्रभाव से दूर हैं वे बड़वानी के पाटीदारों की तरह ही खुद से अपने उत्थान की सीढ़ियां बनाते हैं. उन्हें किसी कर्ज देनेवाली सरकार और बैंक की आवश्यकता नहीं होती.</div>

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		<title>विशेषज्ञ का मतलब होता है कुएं का मेंढ़क</title>
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		<pubDate>Sat, 15 Dec 2007 06:29:00 +0000</pubDate>
		<dc:creator>संजय तिवारी</dc:creator>
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		<category><![CDATA[कंपनीराज]]></category>

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		<description><![CDATA[जिस दबड़े(Cabin) में बैठकर मैं काम करता हूं वहां एक वाक्य लिख रखा है- &#8220;जो अपने मुताबिक जीवन जी रहा है, वही सफल है.&#8221; सफलता नापने का यह मेरा अपना पैमाना है. क्योंकि मैं आपकी नजर में सफल नहीं होना चाहता. मैं अपनी नजर में सफल होना चाहता हूं. अपनी नजर में ऊंचा उठना चाहता [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p><a href="http://bp3.blogger.com/_ae352Y7bWYQ/R2N-lWQFsJI/AAAAAAAAAls/2GLGf-3ofiU/s1600-h/light_dharma.jpg"><img style="float:right;cursor:hand;margin:0 0 10px 10px;" alt="" src="http://bp3.blogger.com/_ae352Y7bWYQ/R2N-lWQFsJI/AAAAAAAAAls/2GLGf-3ofiU/s200/light_dharma.jpg" border="0" /></a>जिस दबड़े(Cabin) में बैठकर मैं काम करता हूं वहां एक वाक्य लिख रखा है- &#8220;जो अपने मुताबिक जीवन जी रहा है, वही सफल है.&#8221; सफलता नापने का यह मेरा अपना पैमाना है. क्योंकि मैं आपकी नजर में सफल नहीं होना चाहता. मैं अपनी नजर में सफल होना चाहता हूं. अपनी नजर में ऊंचा उठना चाहता हूं. आप मेरे बारे में क्या सोचते हैं इससे मुझे ज्यादा फर्क नहीं पड़ता. खुद के बारे में मेरी कैसी धारणा है, इससे मुझे फर्क पड़ता है.</p>
<p>मैं देखता हूं लोग दूसरों की नजर में बड़ा बनना चाहते हैं. हर कोई चाहता है कि दूसरा कोई उसे बड़ा माने. व्यक्ति चाहे जैसा हो, चाहता यही है कि उसका व्यक्तित्व बहुत अच्छा हो. हमारे बहुत से संस्थान व्यक्तित्व विकास (Personality Devlopment) के नाम पर पैसा पीटते हैं. और हमें यह झूठ पढ़ाते हैं कि आपको कैसे हंसना चाहिए, कैसे बोलना चाहिए, कैसे उठना चाहिए, कैसे बैठना चाहिए. आपके मन में भले ही किसी के लिए अंदर से गुस्सा भरा हो लेकिन ऊपर से आप हंसते हुए ही बात करिए. अगर आप थोड़ा आधुनिक जीवन जीते हैं तो ऐसी नकली हंसी आपको सब-ओर दिख जाती होगी. फिर भी बात यहीं तक हो तो ठीक है. लेकिन एक बार हम व्यक्ति और व्यक्तित्व में फर्क करना सीख जाते हैं तो अपने ही अंदर इतने विभाजन पैदा कर लेते हैं कि मूल ही खो जाता है.<br />यह विभाजन हमें पेशेवर बनाती है और यह पेशेवराना अंदाज हमें विशेषज्ञता की ओर ले जाता है. अगर कोई केन्द्र को पकड़ ले और कहे कि वह विशेषज्ञ है तो बात समझ में आ सकती है. लेकिन संकट है. जिसको केन्द्र मिल जाता है वह यह समझ जाता है कि आप विशेषज्ञ हो ही नहीं सकते. किस बात के विशेषज्ञ? जो है ही नहीं उसका विशेषज्ञ कोई कैसे हो सकता है? लेकि यहां तो केन्द्र की भी बात नहीं है. जो थोड़ा-बहुत जान जाता है वह अपने आप को विशेषज्ञ घोषित कर देता है. परिधि पर मंडरानेवाले जीव ही अक्सर अपने आप को विशेषज्ञ घोषित करते हैं झोलाछाप डॉक्टर की तरह.
<div style="font-weight:normal;float:right;padding-bottom:7px;width:200px;line-height:normal;font-variant:normal;"><span style="color:#2c00d5;">&#8220;विशेषज्ञता हमें अल्पज्ञ बनाती है. हमें सीमित करती है. हमारा दमन करती है और हमारे अंदर एक ऐसा झूठा अहंकार भर देती है जिसके आगोश में हम प्रतिपल घुटकर मरते रहते हैं.&#8221;</span></div>
<p>विशेषज्ञता हमें अल्पज्ञ बनाती है. हमें सीमित करती है. हमारा दमन करती है और हमारे अंदर एक ऐसा झूठा अहंकार भर देती है जिसके आगोश में हम प्रतिपल घुटकर मरते रहते हैं. यह अंत इसलिए शुरू हो जाता है क्योंकि हमारा सीखना बंद हो जाता है. आप अपने आस-पास देखिए हर समय सबकुछ बदल रहा है. एक क्षण पहले जो था वह अगले क्षण नहीं होता है. कल जो था वह आज नहीं है, और आज जो है वह कल नहीं रहेगा. हम स्वयं हम नहीं रहते. हमारे विचार वही नहीं रहते. वे तो क्षण-क्षण बदलते रहते हैं. कल हम जिसे ठीक मानते थे, आज उन्हीं में हमें खोट नजर आने लगा है. कल मैं जिसे अच्छा इंसान समझते थे आज वह हमें धोखेबाज लगता है. हमारी चेतना के हर तल पर नित परिवर्तन होता रहता है.<br />ऐसे में कोई विशेषज्ञ हो जाए तो क्या कहना चाहिए? मैं तो मानता हूं विशेषज्ञ का एक अर्थ होता है जड़ता. ठहर जाना. और अपने आप को एक हिस्से में समेट लेना. जो लोग विशेषज्ञ होते हैं उनका उपयोग दूसरे लोग भले ही कर लेते हों लेकिन वे खुद कभी खुलकर नहीं जी पाते. ऐसा करते हुए उनकी विशेषज्ञता आड़े आती है.</p>
<p>जीवन तो पूर्णता है. थोड़ी-बहुत जानकारी रखकर विशेषज्ञा का ढोल पीटने से अच्छा है कि हम जीवन को पूर्णता में देखें. हमारे हर प्रकार के ज्ञान का एक ही स्रोत है. स्रोत से नाता ठीक बना रहे तो विशेषज्ञता की जरूरत नहीं होगी. पेट पालने के लिए हम सबको कुछ न कुछ करना ही होता है. कोई डाक्टर बन जाता है, कोई इंजीनियर, कोई वकील तो कोई कुछ और. यह सब करते ह</p>

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		<title>हमारे भविष्य का &quot;ब्ल्यूप्रिंट&quot;</title>
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		<pubDate>Wed, 12 Dec 2007 14:25:00 +0000</pubDate>
		<dc:creator>संजय तिवारी</dc:creator>
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		<category><![CDATA[कंपनीराज]]></category>
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		<description><![CDATA[आज एक बार फिर पाण्डेय जी ने मेरे इस लेख पर सवाल उठाया है कि हमारे भविष्य का क्या ब्ल्यूप्रिंट होना चाहिए? अगर इसको विकास नहीं कहते तो विकास किसको कहोगे? यह बहुत अच्छा विषय है. मैं अपनी ओर से कुछ कहूं इससे अच्छा होगा बहुत सारे ब्लागर इस बहस में शामिल हों. आपके हिसाब [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p>आज एक बार फिर <a href="http://www.blogger.com/profile/05293412290435900116">पाण्डेय जी </a>ने मेरे <a href="http://visfot.blogspot.com/2007/12/blog-post_12.html">इस लेख </a>पर सवाल उठाया है कि हमारे भविष्य का क्या ब्ल्यूप्रिंट होना चाहिए? अगर इसको विकास नहीं कहते तो विकास किसको कहोगे? यह बहुत अच्छा विषय है. मैं अपनी ओर से कुछ कहूं इससे अच्छा होगा बहुत सारे ब्लागर इस बहस में शामिल हों. आपके हिसाब से भारत के भविष्य का क्या ब्ल्यू-प्रिंट होना चाहिए, इस पर एक बहस चलाएं.  मैं भी इस बहस में शामिल हूं.</p>

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		<title>गरीबी रेखा के नीचे</title>
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		<pubDate>Wed, 12 Dec 2007 05:32:00 +0000</pubDate>
		<dc:creator>संजय तिवारी</dc:creator>
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		<category><![CDATA[कंपनीराज]]></category>
		<category><![CDATA[भारत]]></category>

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		<description><![CDATA[जब आप किसी समस्या का अति सरलीकरण करना चाहें तो एक रेखा खींच दीजिए. समस्या वाला हिस्सा अलग हो जाएगा. फिर आप केवल उस हिस्से पर केन्द्रित हो जाते हैं जहां समस्या है. अब आप टुकड़ों में समस्या सुलझाते चले जाईये. हो सकता है किसी दिन आपको संतोष हो जाए कि आपने समस्या को न [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p><a href="http://bp2.blogger.com/_ae352Y7bWYQ/R19-tULkm6I/AAAAAAAAAlc/xcZAGCbhMps/s1600-h/tribes1.jpg"><img style="float:right;cursor:hand;margin:0 0 10px 10px;" alt="" src="http://bp2.blogger.com/_ae352Y7bWYQ/R19-tULkm6I/AAAAAAAAAlc/xcZAGCbhMps/s200/tribes1.jpg" border="0" /></a><span style="font-size:130%;">जब आप किसी समस्या का अति सरलीकरण करना चाहें तो एक रेखा खींच दीजिए. समस्या वाला हिस्सा अलग हो जाएगा. फिर आप केवल उस हिस्से पर केन्द्रित हो जाते हैं जहां समस्या है. अब आप टुकड़ों में समस्या सुलझाते चले जाईये. हो सकता है किसी दिन आपको संतोष हो जाए कि आपने समस्या को न केवल पहचाना बल्कि उसका समाधान भी कर लिया. लेकिन ऐसी परिस्थितियों में हमेशा यह होता है कि मूल में समस्या अछूती रह जाती है और जिसे सुलझाने का आप दावा करते हैं वह उस हिस्से की समस्या होती है न कि मूल समस्या.<br /></span>
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<div><span style="font-size:130%;">फिर हम आप टुकड़ों में बंटें लोग तो हैं नहीं. हम सबका स्रोत तो एक ही है. इसलिए मूल में समस्या भी एक ही होनी चाहिए. यह तो हमारे बंटवारे की मानसिकता है जो समस्या को अलग-अलग करके देखती है. हम मानें न माने हम एक दूसरे से जुड़े हुए हैं. और यह पूरा पर्यावरण हमसे जुड़ा हुआ है. यह समग्र है. सर्वात्म में एकात्म है. फिर समस्याएं अलग-अलग कैसे हो सकती हैं? जब उद्गम का स्रोत एक, धरा एक तो समस्याएं अलग-अलग कैसे हो सकती हैं? आप तकलीफ में हों तो मुझे आराम कैसे आ सकता है? क्या केवल एक रेखा खींचकर संवेदनाओं और अनुभूतियों का बंटवारा हो सकता है? </span></div>
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<div><span style="font-size:130%;">मूल में तो हम ऐसे नहीं हैं. फिर भी हम रेखा खींच देते हैं. इन्हीं रेखाओं में एक रेखा है- गरीबी रेखा. हमारे समाज में एक ऐसी रेखा खिंच गयी है या खींच दी गयी है जो मनुष्य को दो हिस्सों में बांटता है. एक वह जो अमीर है दूसरा वह जो गरीब है. अमीर होने के लिए आपके पास क्या कुछ होना चाहिए इसकी भारतीय परिभाषा पर फिर कभी बात करेंगे लेकिन जो साधन संपन्न हैं वे अपने आप को अमीर मानते हैं. जिनके पास साधन नहीं है वे गरीब लोग हैं. अब अमीर होने के लिए जरूरी है कि गरीब उन साधनों को इकट्ठा करे जिससे वह अमीरों की श्रेणी में आ सके. </span></div>
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<div><span style="font-size:130%;">लेकिन जिसे हम गरीब कहते हैं क्या वे सचमुच गरीब हैं? या गरीब वे हैं जो अपनेआप को अमीर कहते हैं? अभावग्रस्त कौन है और भावपूर्ण कौन है? यूएनडीपी इन बातों पर कभी सोचता नहीं इसलिए ह्यूमन डेवलपमेन्ट इंडेक्स बनाते समय वह इस बात की गणना करता है कि कितने घरों में टीवी है, कितने घरों में अखबार पढ़ा जाता है, कितने घरों में फ्रीज है और कितने घरों गाड़ी है इत्यादि. कितने लोग अंग्रेजी दवाओं का कितना उपयोग करते हैं. अगर आप औसतन अंग्रेजी दवाओं का हजार रूपये मासिक उपयोग करते हैं तो WHO और यूएनडीपीUNDP दोनों की नजर में आपका स्वास्थ्य इंडेक्स बहुत अच्छा है. आप टीवी रखते हैं तो ही आप मनुष्य होने की श्रेणी में आते हैं. अन्यथा आपको पिछड़ा घोषित कर दिया जाता है. </span></div>
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<div><span style="font-size:130%;">यूएनडीपी या फिर अन्य अंतरराष्ट्रीय संस्थाएं जो नहीं बोलती वह यह कि ये सब इंडेक्सिंग के पीछे का हेतु क्या है? आप जितना ज्यादा उपभोग करते हैं उतना ही आप दुनियाभर की बड़ी कंपनियों के लिए व्यवसाय तैयार करते हैं. तो अगर आपको विकसित होना है तो आपको कंपनियों को अमीर बनाना चाहिए. यह काम यूएनडीपीUNDP के जिम्मे है कि वह दुनिया में ऐसा माहौल तैयार करे कि कंपनियों को व्यवसाय के लिए आधारभूमि विकसित हो. दुनियाभर की सरकारें उनको इस काम में मदद करती हैं. भारत सरकार भी उन्हीं के बताये दिशानिर्देशों पर सारी योजनाएं बनाती है. </span></div>
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<div><span style="font-size:130%;">गरीबी रेखा भी एक ऐसी ही विभाजन रेखा है जो यह बताती है कितने लोग कंपनियों के प्रभाव में आ गये हैं और कितनों को अभी आना है. हमारी पत्रकार बिरादरी, बुद्धिजीवी तबका और नीति-निर्माता चिल्ला-चिल्लाकर अपने आप को ही गाली देते ह<br />
ैं कि हम बहुत पिछड़े हुए हैं क्योंकि हम ह्यूमन इंडेक्स में बहुत नीचे हैं. हम तनिक भी इस बात का अंदाज नहीं होता कि हम किसे गाली दे रहे हैं और क्यों? क्या कोई आसमान में मुंह करके थूंकता है कि वह थूंक अपने ही मुंह पर वापस आ गिरे? लेकिन इस देश का पढ़ा-लिखा समाज इस बात का अभ्यस्त है. दुनिया की कंपनियों की लाबिंग करनेवाली संस्थाओं के कहने पर हम अपने ही लोगों को गाली देते हैं, उनको पिछड़ा बताते हैं और अपने ही मुंह पर थप्पड़ मारकर विद्वान बन जाते हैं. </span></div>
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<div><span style="font-size:130%;">जो अभावग्रस्त हैं उनको अभावग्रस्त कौन बनाता है? हम सब अपने ही लोगों को लूटते हैं और फिर गाली देते हैं कि हमारे देश में इतने गरीब हैं. गरीबी हटाने के नाम पर हम लूट की योजनाएं बनाते हैं और थोड़े और गरीब समाज में जोड़ देते हैं. खेती-बाड़ी अपने बूते हो तो विकास नहीं है. लेकिन आप कंपनियों की बनाई खाद, कंपनियों के बनाये उपकरण और कंपनियों के द्वारा बेचे जा रहे बीज का उपयोग करने लगें तो आप विकसित हो जाते हैं. लेकिन इस पूरी प्रक्रिया में होता यह है कि समाज का एक बड़ा हिस्से के हाथ से रोजी छिन जाती है. कारीगर गायब होने लगते हैं और मजदूर पैदा होने लगता है. उद्यमशीलता का नाश होने लगता है और व्यवसाय का बोलबाला हो जाता है. </span></div>
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<div><span style="font-size:130%;">इस देश में कोई गरीब नहीं है. जो गरीब दिखते हैं एक-दो पीढ़ी पहले तक वे समाज के किसी हिस्से की अनिवार्य जरूरत थे. अब हमने यूएनडीपी और न जाने कितनी विदेशी सलाहकार संस्थाओं के कहने पर ऐसी अर्थव्यस्था विकसित कर दी कि वे बेकार ही हो गये. हर कोई शहर की ओर भाग रहा है. गांव में जो रह गये वे भी अपने उद्यम से कट गये. अपने संस्कारों से मुक्त हो गये. अपने ज्ञान की धरोहर से अलग हो गये. अब तो हर किसी को टाई पहननी है. अंग्रेजी बोलनी है और लूटपाट के उस खेल में शामिल होना है जिसे व्यवसाय कहा जाता है. हम अपनी ही जड़ों से कट गये हैं फिर भी हमारी गलढिठाई देखिए कि हम चिल्लाकर कह रहे हैं कि विकास हो रहा है. </span></div>
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		<title>खाली पेट, भरीं पेटियां</title>
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		<pubDate>Tue, 16 Oct 2007 02:53:00 +0000</pubDate>
		<dc:creator>संजय तिवारी</dc:creator>
				<category><![CDATA[बात करामात]]></category>
		<category><![CDATA[कंपनीराज]]></category>
		<category><![CDATA[विकास]]></category>

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		<description><![CDATA[आंकड़ो से भूख भले न मिटती हो फिर भी आंकड़े महत्वपूर्ण तो होते ही हैं. कई बार ये आंकड़े बुद्धि विलास के साधन हैं तो कई बार आंकड़े हमारे नकली चेहरों को आईना भी दिखाते हैं. आप देख सकते हैं कि सेंसेक्स 19 हजार छू गया है और इस छुअन में कई पूंजीपतियों की पेटियां [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p><a href="http://bp2.blogger.com/_ae352Y7bWYQ/RxRhijOCgEI/AAAAAAAAAbo/VIfzUqcpoF4/s1600-h/hunger04-06.jpg"><img style="float:left;cursor:hand;margin:0 10px 10px 0;" alt="" src="http://bp2.blogger.com/_ae352Y7bWYQ/RxRhijOCgEI/AAAAAAAAAbo/VIfzUqcpoF4/s200/hunger04-06.jpg" border="0" /></a>आंकड़ो से भूख भले न मिटती हो फिर भी आंकड़े महत्वपूर्ण तो होते ही हैं. कई बार ये आंकड़े बुद्धि विलास के साधन हैं तो कई बार आंकड़े हमारे नकली चेहरों को आईना भी दिखाते हैं. आप देख सकते हैं कि सेंसेक्स 19 हजार छू गया है और इस छुअन में कई पूंजीपतियों की पेटियां थोड़ी और वजनी हो गयी हैं लेकिन क्या इससे उन पच्चीस हजार लोगों की मौत रूक जाएगी जो रोजाना इसलिए काल के गाल में समा जाते हैं क्योंकि उनके पेट खाली हैं. यह दोनों आंकड़े ही हैं. सवाल है हमारी प्राथमिकता क्या होनी चाहिए? क्या हम आंकड़ों की विलासिता से अपने फटे में पैबंद लगाएं या फिर नये सिरे से सोचना शुरू करें ताकि भय पैदा करते आंकड़े कुछ अच्छे संकेत दें.</p>
<p>प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने एक-दो बार कहा है कि असमानता का बढ़ना खतरनाक है. इसी साल 24 मई को सीआईआई की एक बैठक में उन्होंने उद्योगपतियों से कहा था कि यह असमानता अच्छा संकेत नहीं है. यह प्रधानमंत्री की सदिच्छा है. और इसे केवल उनकी सदिच्छा ही मानना चाहिए. क्योंकि अमीरी और गरीबी के बीच संतुलन कभी सरकारी नीतियों से नहीं साधा जा सकता. जैसे अमीरी कोई व्यावसायिक व्यवस्था नहीं है वैसे ही गरीबी भी कोई सरकारी आंकड़ेबाजी का ही विषय नहीं है. अमीरी और गरीबी दोनों समाज और जीवनदर्शन का हिस्सा हैं. अमीर होना अच्छा है. लेकिन गरीबों की लाश पर अमीर होना अच्छा नहीं है.</p>
<p>पूंजीपति होने में कोई बुराई नहीं है. लेकिन दूसरों के हक अधिकार को सीमित कर पूंजी इकट्ठी करना अपने आप में बहुत बड़ी बुराई है. समाजवाद के पतन के साथ भारत में यह दौर तेजी से बढ़ा है. हालांकि अभी यह शुरूआती दौर में है और पूंजीपतियों ने अभी लाशों के ढेर लगाने शुरू ही किये हैं लेकिन ऐसे ही नीतियों पर काम होता रहा तो अमीरी और गरीबी के बीच का अंतर चार सौ प्रतिशत से बढकर चार हजार प्रतिशत और फिर चार लाख प्रतिशत भी हो सकता है. इस असमानता को प्रधानमंत्री सदिच्छा में दिये गये अपने एक भाषण से खत्म नहीं कर सकते.</p>
<p>असल में हमें अपने विकास के वर्तमान फार्मूले से निजात पानी होगी. असमानता और गरीबी इसके सिद्धांत में है. मैं नहीं जानता कि असुर कभी धरती पर रहे हों. लेकिन अगर रहे होंगे तो उनके काम करने का तरीका भी बिल्कुल वैसा ही रहा होगा जैसा आज कारपोरशन्स का दिखता है. अपनी अमरता के लिए ये कंपनियां कोई भी फार्मूला गढ़ सकती हैं और पैसे की ताकत से उसे विकास का अनिवार्य हिस्सा घोषित कर सकती हैं. कंपनियों और सरकार में बैठे कंपनियों के दलालों ने शब्दों के मायने बदल दिये हैं. विकास, आर्थिक सुधार, निवेश, ढांचागत विकास, मजबूत अर्थव्यवस्था आदि अच्छे शब्द हैं. लेकिन कंपनियों ने इन शब्दों के मायने बदल दिये हैं.</p>
<p>इन बदले हुए मायनों की धुंध से सच बाहर झांके भी तो कैसे? क्योंकि जो भी इनके खिलाफ बोलता है वह विकास के खिलाफ बोलनेवाला समझ लिया जाता है. ऐसे में प्रधानमंत्री भी असमानता के बढ़ते संकेतों को भले ही खतरनाक मान लें लेकिन उनकी इस सदिच्छा से गरीब का भाग्य नहीं बदल जाएगा. यह इस विकास का अनिवार्य हिस्सा है कि एक ओर जैसे-जैसे पेटियों का भार बढ़ेगा दूसरी ओर पेट का खालीपन बढ़ता चला जाएगा.</p>

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