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	<title>visfot.blog &#187; कटाक्ष</title>
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		<title>07 07 07 बनाम 700 चिट्ठाकार</title>
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		<pubDate>Sat, 07 Jul 2007 15:12:00 +0000</pubDate>
		<dc:creator>संजय तिवारी</dc:creator>
				<category><![CDATA[बात करामात]]></category>
		<category><![CDATA[कटाक्ष]]></category>

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		<description><![CDATA[सोचा था आज सात पोस्ट करूंगा और चिट्ठाजगत के धड़ाधड़ पोस्टिंग वाली लिस्ट में छाती फुलाकर  ऊपर खिसक जाऊंगा लेकिन तीन में ही हांफने लगा. अगर इस समय आप मेरे पास होते तो मेरी अंगुलियों को देखकर समझ जाते, बेचारी का शोषण हो रहा है. पहले पोस्ट में सोशल नेटवर्किंग थी. दूसरे में कलम [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p>सोचा था आज सात पोस्ट करूंगा और चिट्ठाजगत के धड़ाधड़ पोस्टिंग वाली लिस्ट में छाती फुलाकर  ऊपर खिसक जाऊंगा लेकिन तीन में ही हांफने लगा. अगर इस समय आप मेरे पास होते तो मेरी अंगुलियों को देखकर समझ जाते, बेचारी का शोषण हो रहा है. पहले पोस्ट में सोशल नेटवर्किंग थी. दूसरे में कलम घिसाई और यह तीसरी कटाक्ष. अब इस बात की कोई उम्मीद नहीं है कि इस तिथि-बार में मैं कोई नया इश्यू पैदा कर सकूंगा इसलिए बाकी के चार बाईसवीं सदी के 070707 में लिखकर पूरा करूंगा. चिंता क्यों करते हैं मिया, आप भी रहेंगे और हम भी. आपको क्या लगता है मैं पीछे हट जाऊंगा. नहीं जी सवाल ही नहीं पैदा होता. सात जन्मों तक नहीं छोड़ूगा.</p>
<p>सात मुझे प्रिय है क्योंकि सात के चक्कर में स्थायी भाव होता है. जिसने सात फेरे लिये वह सात जन्मों तक पीछा नहीं छुड़ा सकता.  वैसे सात नदी, सात पहाड़, सात लोक, सात समंदर, सात ऋषि, सात युग आदि की महिमा क्यों है आज तक मैं इसका भेदन नहीं कर पाया हूं. इतना अवश्य लगता है कि सात के साथ कोई मार्मिक महत्व जुड़ा हुआ है जो हमें कुछ संकेत कर रहा है. आपको कुछ जानकारी हो तो मेरी भी बढ़ा दीजिए, वरना खोजबीन तो चलती ही रहेगी.</p>
<p>अब जबकि थोड़ी ही देर में दुनिया के सात अजूबों का निर्णय कर लिया जाएगा, मैं उम्मीद करता हूं कि मुझे भी उन अजूबों में आप देख सकेंगे. अगर सात में न दिखूं तो आठवें पायदान पर झांक लिजीयेगा. बिल्लू की इज्जत का सवाल है. चिट्ठाजगत की ताजा गणना के अनुसार सात सौ ब्लागर हैं जो सक्रिय हैं और धड़ाधड़ पोस्टें लिख रहे हैं (वैसे 100 में 80 तो आरसी मिश्रा अकेले लिख रहे हैं. खबर है कि आरसी मिश्रा ने पोस्टिंग करने का कोई अनूठा नुख्सा विकसित कर लिया है. इसमें दो संभावनाएं है. या तो और लोग आर सी मिश्रा के लिए लिख रहे हैं या आर सी मिश्रा औरों के लिखे को अपना नामदान कर रहे हैं. अगर यह दोनों बातें नहीं है जरूर आरसी मिश्रा हिन्दी ब्लाग जगत के साईबोर्ग हैं.) </p>
<p>अगले साल जब 070708 वाला मामला हो तो सात-आठ हजार ब्लागर हों,  इसी कामना के साथ</p>
<p>कम से कम सात टिप्पड़ियों की बाट जोहता&#8230;.</p>
<p>बिल्लू, गयादीन और घुरहू के साथ<br />मैं &#8230;. &#8230;.. &#8230;&#8230;.</p>

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		<title>शिखरपुरूष ब्लागर का इंटरव्यू</title>
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		<pubDate>Fri, 06 Jul 2007 05:31:00 +0000</pubDate>
		<dc:creator>संजय तिवारी</dc:creator>
				<category><![CDATA[बात करामात]]></category>
		<category><![CDATA[कटाक्ष]]></category>

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		<description><![CDATA[यह अखबार-मैगजीन की नौकरी भी जो न करवाये वाली भिन्नाहट के साथ मैं दफ्तर से निकला. कैमरा, रिकार्डर आदि मेरे झोले में था ही. कल तो काल को समर्पित है वाले दिव्यज्ञान से ओत-प्रोत और इस ज्ञान की तह में छिपी खुन्नस के वशीभूत सोचा ब्लागर से बातचीत आज ही निपटा दें. और थोड़ी देर [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p>यह अखबार-मैगजीन की नौकरी भी जो न करवाये वाली भिन्नाहट के साथ मैं दफ्तर से निकला. कैमरा, रिकार्डर आदि मेरे झोले में था ही. कल तो काल को समर्पित है वाले दिव्यज्ञान से ओत-प्रोत और इस ज्ञान की तह में छिपी खुन्नस के वशीभूत सोचा ब्लागर से बातचीत आज ही निपटा दें. और थोड़ी देर में मैं ब्लागर गयादीन के साथ था. उनका परिचय देने में कल आ सकता है जो कि पहले ही काल को समर्पित है, इसलिए पेशे-खिदमत है एक ब्लागर से सीधी बातचीत&#8230;..(बातचीत को एडिट नहीं किया है, वो हमारे पत्रिकावालों और आपकी सिरदर्दी है.)</p>
<p><span style="color:#009900;">सवाल-</span> आप कब से ब्लाग लिख रहे हैं?<br /><span style="color:#009900;">जवाब-</span> महोदय, आप अपनी वाणी शुद्ध कर लें, मैं ब्लाग नहीं लिखता, चिट्ठे लिखता हूं.</p>
<p><span style="color:#009900;">सवाल -</span> वही, हुए तो ब्लागर ही न.<br /><span style="color:#009900;">जवाब-</span> महोदय, आप इस दुनिया को नहीं जानते. इसलिए दूसरी बार मैं आपको अभयदान देता हूं. आगे से ध्यान रखिये मैं चिट्ठा लिखता हूं और चिट्ठाजगत में सम्मानित चिट्ठाकार की हैसियत रखता हूं.</p>
<p><span style="color:#009900;">सवाल-</span> लेकिन आपने बताया नहीं, आप लिख कब से रहे हैं?<br /><span style="color:#009900;">जवाब-</span> कुछ लोग भले ही पहले चिट्ठाकार होने का दावा करें, लेकिन यथार्थ यह है कि मैं चिट्ठाजगत का आदिपुरूष हूं. मैं 1999 से चिट्ठे लिख रहा हूं, जब से ब्लागर का आविष्कार हुआ है.</p>
<p><span style="color:#009900;">सवाल-</span> तब तो इंटरनेट पर हिन्दी दूर की कौड़ी होती थी. आप कैसे लिख लेते थे?<br /><span style="color:#009900;">जवाब-</span> आपका चिट्ठाज्ञान उत्तम है. अपने अगले चिट्ठे में मैं आपके चिट्ठाज्ञान का उल्लेख करूंगा. जहां तक मेरे लिखने का सवाल है तब मैं रोमन में लिखा करता था.</p>
<p><span style="color:#009900;">सवाल-</span> ऐसे में तो लोगों को पढ़ने-समझने में बहुत दिक्कत आती होगी?<br /><span style="color:#009900;">जवाब -</span> (उनके चेहरे के हाव-भाव से साफ था कि वे मन ही मन पुनः मेरे चिट्ठाज्ञान की तारीफ कर रहे हैं) देखिए जैसा मैंने आपको बताया मैं पहला चिट्ठाकार था इसलिए लिखने से लेकर पढ़ने तक सारी जिम्मेदारी मैं अकेले ही उठाता था. पांच सालों तक यही क्रम चलता रहा. जहां तक समझने का सवाल है, तो कोई क्या समझता है इसकी चिंता न तब थी न अब है.</p>
<p><span style="color:#009900;">सवाल-</span> फिर पांच साल बाद क्या हुआ?<br /><span style="color:#009900;">जवाब -</span> फिर यहां लोग आने लगे. इंटरनेट पर हिन्दी लिखने की छुटपुट तकनीकि भी आ गयी थी. अतः मैंने भी रोमन शब्दों का प्रयोग बंद कर दिया.</p>
<p><span style="color:#009900;">सवाल-</span> उस ब्लाग को तो सहेजकर रखा होगा. क्या एक बार उसे देख सकते हैं?<br /><span style="color:#009900;">जवाब-</span> बीत गयी सो बात गयी. आज में जीना सीखो मित्र. कल मैंने हिन्दी के लिए क्या किया था आज उसका परिणाम दिख रहा है. अब कहां रोमन के पीछे पड़ते हो.<br />(मैं समझ गया उनका चिट्ठा इतिहास संदिग्ध है. बहलहाल यह जाहिर न करते हुए कि मैं उन्हें समझने लगा हूं, मैंने बातचीत जारी रखी.)</p>
<p><span style="color:#009900;">सवाल-</span> इस पूरे दौर में उतार-चढ़ाव भी खूब आये होंगे?<br /><span style="color:#009900;">जवाब -</span> (थोड़ी देर के लिए वे मौन हो गये. मानों उनके ऊपर विंध्याचल पर्वत गिर पड़ा हो और उन्हें समझ में न आ रहा हो कि इस भार से मुक्ति कैसे मिले. फिर भी वे बोले) चढ़ाव कम, उतार ज्यादा देखे हैं मैंने. तब भी एक-एक टिप्पड़ी की बाट जोहते दिन कटते थे आज भी परिस्थितियां कमोबेश वैसी ही हैं. फिर भी मैंने हिम्मत नहीं हारी है. जननी होने का दुख तो उठाना ही पड़ता है.</p>
<p>(तभी दरवाजे पर कोई आहट सुन उनकी बांछे खिल गयीं. उनके सखा घुरहू थे. बताने की जरूरत नहीं कि उनका पाठक वाला टानिक घुरहू लेकर चलते हैं. कोई पढ़े न पढ़े घुरहू को पढ़ाने में वे कामयाब रहते हैं. मानों चिट्ठाजगत में गयादीन के बचे रहने का श्रेय घूरहू को निर्विवाद रूप से हासिल है.)</p>
<p><span style="color:#009900;">सवाल -</span> आप चिट्ठाजगत को आज कहां पाते हैं?<br /><span style="color:#009900;">जवाब-</span> यह चिट्ठाकारिता का शैशवकाल है. अभी तो इसके </p>

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		<title>तो बिल्लू को राष्ट्रपति बना दो</title>
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		<pubDate>Fri, 29 Jun 2007 17:29:00 +0000</pubDate>
		<dc:creator>संजय तिवारी</dc:creator>
				<category><![CDATA[बात करामात]]></category>
		<category><![CDATA[कटाक्ष]]></category>

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		<description><![CDATA[राष्ट्रपति कौन हो इसकी बहस अपने ब्लागर भैये भी चला रहे हैं. यह स्वस्थ लोकतंत्र की निशानी है. गयादीन ने घुरहू को सूचित किया. जाहिर है जिस बात पर ब्लागरों का ध्यान चला जाता है वह अपने-आप समसामयिक हो जाती है. लोग थोड़े भले हों लेकिन बहस स्तरीय से द्विस्तरीय, बहुस्तरीय होते हुए निम्नस्तरीय भी [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p>राष्ट्रपति कौन हो इसकी बहस अपने <a href="http://chaukhamba.blogspot.com/">ब्लागर भैये</a> भी चला रहे हैं. यह स्वस्थ लोकतंत्र की निशानी है. गयादीन ने घुरहू को सूचित किया. जाहिर है जिस बात पर ब्लागरों का ध्यान चला जाता है वह अपने-आप समसामयिक हो जाती है. लोग थोड़े भले हों लेकिन बहस स्तरीय से द्विस्तरीय, बहुस्तरीय होते हुए निम्नस्तरीय भी हो सकती है. दुनिया में यह कहावत भले ही न चलती हो अकेला चना भाड़ नहीं फोड़ सकता लेकिन यहां अकेला चना भाड़ को ऊपर से नीचे तक फोड़ देता है. क्यों जी गलत बात बोल रहा हूं, गयादीन ने घूरहू को पुनः अपनी टिप्पड़ी के लिए प्रेरित किया.<br />घूरहू उसी तरह शांत रहते हैं जिस तरह कूड़ा-करकट पड़ते-पड़ते कोई एक स्थान इतना शांत हो जाता है कि लोग उसे घूर की उपमा दे देते हैं. आमतौर गांव-देहातों में इस स्थान का उपयोग कम्पोस्ट खाद बनाने के लिए होता हैं. यह ज्ञात सत्य है कि कम्पोस्ट खाद से जमीन को जितनी उर्वराशक्ति मिलती है उतनी डाई-यूरिया से नहीं. लेकिन उस घूर की अपनी नियति क्या है? वह खुद दिन रात मक्खियों, कीट-पतंगों का अड्डा बना रहता है. फिर भी उसकी उदारता में कोई कमी नहीं आती. मानों वह साबित करने में लगा है कि अपने को मारकर दूसरों को जीवन देनेलाला घूरहू बन जाता है.<br />लेकिन इस विषय पर घूरहू शांत न रह सके. आंखे ऊठाईं, मानों किसी राकेट लांचर से राकेट ऊपर उठ रहा हो. मुखमुद्रा पर कुछ भावों को आने-जाने दिया. वैसे ही जैसे राकेट लांच करने के पहले एक कैमरेनुमा आंख दूर-दूर तक निशाने का जायजा लेती है. और फिर धड़ाम से आंखों को नीचे गिरा ठुड्ढी को गर्दन में ऐसे घुसा लिया कि अग्नि मिसाईल ने दगने से मना कर दिया. इसके दो मतलब हो सकते हैं. एक, या तो उन्होंने अभी सोचना शुरू नहीं किया, या फिर उन्हें गयादीन की पात्रता पर संदेह हो गया था. अपनी सलाह जिसे वे बहुमूल्य कोहिनूर से भी थोड़ा कीमती समझते हैं ऐसे ही किसी को भला क्यों दे दें.<br />गयादीन बातूनी हैं. जितनी तेजी से कोई विषय उठाते हैं उतनी ही जल्दी उसका गरारा करते हैं और उसी तेजी से उसका वमन भी कर देते हैं. फिर नया विषय, नया गरारा और वमन. दिन भर उनका यही क्रम चलता रहता है. ऐसे में घूरहू उनके प्रिय मित्र हैं तो इसका कारण समझ में आता है. गयादीन इस भाव में रहते हैं कि तीर खाली नहीं जा रहा. तीर पत्थर से टकराये तो क्या कहीं टकराता तो है. घूरहू के लिए यह सब मक्खी भिनभिनानेवाला प्रकरण है जिसे रोका नहीं जा सकता लेकिन जिससे प्रभावित होने की भी जरूरत नहीं है.</p>
<p><span style="color:#cc0000;">&#8220;तो अपने बिल्लू को राष्ट्रपति बना दो&#8221;</span></p>
<p>गयादीन फक्क पड़ गये. घूरहू ने अचानक कुछ कहा है. राकेट लांचर में वापस जा चुकी मिसाईल अचानक दग गयी थी.</p>
<p>पहले तो कुछ सूझा नहीं. कुछ देर घूरहू को ऐसे देखते रहे मानों परवेज मुशर्रफ ने वर्दी छोड़ने का ऐलान कर दिया हो. फिर थोड़ी जिज्ञासा और ढेर सारे आश्चर्य को एकसाथ मिलाकर पूछ लिया-<br /><span style="color:#cc0000;">&#8221; यह अपना बिल्लू कौन है?&#8221;</span></p>
<p>&#8220;वही अमेरिकवाला. बिल किलिंटन, पहले अमेरिका भी तो कितना अच्छा चला चुका है. तबियत का मस्त है और यहां आता-जाता भी रहता है. उसकी बीवी वहां प्रेसीडेन्ट बन जाएगी, बिल्लू यहां. सारा झंझट ही खत्म. हमारा अमेरिका से सच्चे अर्थों में धोती-साड़ी का साथ हो जाएगा. वैसे भी आज देश को चलाने के लिए सब तरफ विदेशी पैसा आ रहा है, विदेशी तकनीकि आ रही है, विदेशी कंपनियों के विदेशी मालिक आ रहे हैं तो फिर राष्ट्रपति वहां से क्यों नहीं आ सकता. जब अर्थव्यवस्था को ठीक करने के लिए उद्योग में विदेशी निवेश हो सकता है तो राजनीति में विदेशी निवेश क्यों नहीं किया जा सकता? &#8220;<br />इतना बोल घुरहू चुप हुए तो मातादीन की बोलती बंद. घूरहू की बात में नाजायज क्या है? मातादीन ने तय किया कि इस पवित्र विचार के साथ वे सोनिया माईनो गांधी से मिलेंगे. लेकिन उसके पहल</p>

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