
दिल्ली हाईकोर्ट ने फैसला दिया कि समलैंगिक होना अपराध नहीं है. उसके इस फैसले के बाद पूरे देश में साफ तौर पर लोग तीन हिस्सों में बंट गये. एक वह जो इसका समर्थन कर रहा है. ऐसे लोगों की तादात बहुत थोड़ी लेकिन शक्तिशाली है. इसलिए सबसे ज्यादा इन्हीं लोगों की आवाज सुनाई दे रही [...]
July 7, 2009 | Posted in
हाहाकार |
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निजी डायरी लेखन से अलग हटकर ब्लाग सार्वजनिक हित का माध्यम बने यह हिन्दी ब्लागिंग की सबसे बड़ी जरूरत है और काम भी. इसके सामाजिक और आर्थिक कारण हैं. आज भारत में अधकचरे भूमंडलीकरण का दौर है. कंपनियां अपना प्रभुत्व स्थापित कर रही हैं और लोगों को बताया जा रहा है कि विकास जैसा कोई [...]
June 19, 2008 | Posted in
कारपोरेट मीडिया |
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यह हिन्दी ब्लागरी का विस्फोट काल है. कोई साल भर पहले जिस शैशव अवस्था की बात हम लोग करते थे आज सालभर बाद वह शैशव किशोरावस्था में बदल चुका है. किशोरावस्था ही असल में जीवन का भी विस्फोटकाल होता है. यही वह उम्र होती है जब शरीर और मन में सबसे ज्यादा बदलाव होते हैं. [...]
June 19, 2008 | Posted in
बात करामात |
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मुझे लगता है राज ठाकरे किसी गंभीर मानसिक रोग से ग्रस्त हैं क्योंकि जिस तरह से वो जहर उगल रहे हैं वैसा कोई स्वस्थ आदमी तो नहीं कर सकता है। अपना राजनैतिक वजूद बनाने के लिए कोई इस स्तर तक कैसे जा सकता है। उनकी सभाओं में जुटने वाले लोगों को शायद पता नहीं है [...]
May 4, 2008 | Posted in
बात करामात |
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ऐसा लगता है कि अब यह मान लिया गया है कि “नैतिक शिक्षा” की बात करना दकियानूसी है और सार्वजनिक स्त्री-पुरुष सम्बन्धों में नैतिकता की बात करना बेवकूफ़ी। सरकारों की सोच है कि समाज को खुला छोड़ देना चाहिये और उस पर कोई बन्धन लागू नहीं करना चाहिये, ठीक वैसे ही जैसा कि सरकारों ने [...]
May 3, 2008 | Posted in
बात करामात |
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