
धर्मपाल के लेख “हमारे अज्ञानता की जड़े गहरी हैं” को अधूरा छोड़ते हुए मैं यह लेख दे रहा हूं. चंद्रभूषण ने यह सवाल उठाया है कि “पेशवाई राज्य में अछूतों के लिए गले में हांड़ी, हाथ में झाड़ू लेकर चलने का प्रावधान अंग्रेजों ने तो नहीं बनाया था। जिस महार रेजीमेंट ने 1857 में दुबारा [...]
September 2, 2007 | Posted in
बात करामात |
Read More »

समाज और राज्य की अलग-अलग भूमिका और इन दोनों के आपसी संबंध हमेशा दार्शनिक बहस का मुद्दा रहे हैं. इस विषय पर पश्चिमी चिंतन बहुत सीमित अनुभूतियों और अवधारणाओं पर टिका हुआ दिखता है. पश्चिमी दर्शन के मूल में या तो किसी समाज के किसी दूसरे द्वारा जीत लिये जाने का कोई ऐतिहासिक तथ्य होता [...]
August 31, 2007 | Posted in
बात करामात |
Read More »

विज्ञान और प्रौद्योगिकी
यह एक बहुप्रचारित मान्यता हो गयी है कि विज्ञान और प्रौद्योगिकी में हमारे पिछड़ने और ब्रिटेन के आगे होने के कारण हम ब्रिटेन से हार गये. क्या यथार्थ यही है? सत्य को एक ही कोण से क्यों देखें? सौभाग्य से कुछेक विद्वानों ने इस बारे में काम किया है और हमारे सामने तस्वीर [...]
August 19, 2007 | Posted in
बात करामात |
Read More »