
हर साल 15 अगस्त और 26 जनवरी को एक बेचैनी से दो चार होता हूं. वह बेचैनी है हम 15 अगस्त और 26 जनवरी को सरकारी तौर पर इतना महत्व क्यों देते हैं? क्या हम सचमुच एक शासनतंत्र की व्यवस्था को राष्ट्रीय पर्व मान लें और सत्ता हस्तांतरण को अपनी आजादी मान ढ़िढोरा पीटें कि [...]
August 14, 2007 | Posted in
बात करामात |
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हे भगवान, मेरी एक ही प्रार्थना है कि भारत को कभी अमरीका मत बनने देना. भारत-भारत ही रहे इसीमें भारतवासियों का ही नहीं दुनिया का भी कल्याण है. जैसे गांधी जी कहते थे स्वतंत्रता की लड़ाई भारत की अकेली नहीं है. यह सभ्यता की लड़ाई है. एक तरफ उपनिवेशवादी सभ्यता है तो दूसरी तरफ उपनिवेशवाद [...]
August 6, 2007 | Posted in
बात करामात |
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मैथिली जी के बारे में रवि रतलामी ने जो कुछ लिखा उससे कई सवाल पैदा हो जाते हैं. मैथिली गुप्त ही क्यों? क्या जिसने जीवन में पैसा नहीं कमाया उसका जीना बेकार है? और अंट-शंट तरीके से जिसने पैसा कमा लिया वह महान आदमी हो गया? आज बाजार और दुकान को स्थापित सत्य बतानेवाले लोग [...]
July 16, 2007 | Posted in
बात करामात |
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कुल-गोत्र के सवाल पर मैंने जो कुछ लिखा उसपर जिन्होंने प्रशंसा की उनका धन्यवाद. जिन्होंने आलोचना से सचेत किया उनका भी धन्यवाद और जो तटस्थ रहे, उनके बारे में समय लिखेगा उनका भी इतिहास की तर्ज पर मैं कोई टिप्पणी नहीं करूंगा. इस मसले पर मैं इष्टदेव और देवाशीष की उन टिप्पड़ियों से सहमत हूं [...]
July 4, 2007 | Posted in
बात करामात |
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सबसे पहले मैं अपना परिचय देता हूं-नाम – संजयजाति- तिवारी (तिवारी में भी “मणि” तिवारी)वर्ण- ब्राह्मण (सरयूपारीण)धर्म- सनातन (वैष्णव)गोत्र – शांडिल्य
इतने के बाद भी एक आखिरी सवाल लोग और पूछते हैं, तीन के ब्राह्मण हो या तेरह के? तो मैं आपको बता दूं कि मुझे यह बताया गया है कि मैं तीन का ब्राह्मण हूं. [...]
July 3, 2007 | Posted in
बात करामात |
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