
अनिल रघुराज की जायज चिंता पर बहुत सारे नाजायज तर्क हो सकते हैं. फिर भी अनुभव से यही समझ में आता है कि टैग का सबसे बेहतर फायदा तभी मिलता है जब आप कम से कम टैग का इस्तेमाल करते हैं और एक ही टैग को बार-बार अपनी पोस्टों में प्रयोग करते हैं. लेकिन जनता [...]
August 23, 2008 | Posted in
टेक्नालाजी के तीर |
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ब्लाग पर पोस्ट लिखने से पहले भी जिन्दगी होती है और एग्रीगेटर से हटने के बाद भी चलती रहती है. मेरे विचारों का आधार इतना कमजोर नहीं कि किसी एग्रीगेटर की बैशाखी खोजनी पड़े. न ही मुझे इस बात की कोई ललक है कि लोग मुझे पढ़ें ही, जाने ही और मेरी बातों को माने [...]
May 6, 2008 | Posted in
बात करामात |
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अगर किसी के पास कोई सुझाव हो कम्युनिटी ब्लाग को बेहतर बनाने का तो निसंकोच यहाँ दे ।
संजय तिवारी के ब्लॉग को तकरीबन रोज ही एक बार देख लेती हूँ । कुछ ना कुछ नया जरुर मिलता हैं अपनी ज्ञान वृद्धि के लिए । कल उनका ब्लॉग देखा तो पता लगा अब वह कम्युनिटी ब्लाग [...]
May 1, 2008 | Posted in
बात करामात |
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किसी भाषा से आप क्या उम्मीद करते हैं? यह कि वह आपको कवि बना दे या फिर चूतिया? हिन्दी इन्हीं दो विधाओं की भाषा बनकर रह गयी है. प्रकाशनों के बड़े तबके ने कवि पैदा किये. कवियों की राजनीति पैदा की और साहित्य की कोंपले फोड़ते रहे. कोंपले फूटी न फूटी लोगों के सिर जरूर [...]
April 24, 2008 | Posted in
कारपोरेट मीडिया |
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ब्लागरी करते एक साल बीत गया. पिछले साल ऐसी ही गर्मियों के बीच अप्रैल के दूसरे हफ्ते में पहली बार यूनिकोड हिन्दी में लिख सका था. लिखते-मिटाते जो पहली पोस्ट प्रकाशित हुई वह हुई 26 अप्रैल को लेकिन मुझे खूब याद है 16 या फिर 17 अप्रैल को मैंने सबसे पहले यूनिकोड हिन्दी में टाईप [...]
April 16, 2008 | Posted in
बियाबान में शोर |
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