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	<title>visfot.blog &#187; 15 अगस्त</title>
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		<title>राष्ट्रगान का भाग्यविधाता&#8230;.</title>
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		<pubDate>Thu, 16 Aug 2007 16:02:00 +0000</pubDate>
		<dc:creator>संजय तिवारी</dc:creator>
				<category><![CDATA[बात करामात]]></category>
		<category><![CDATA[15 अगस्त]]></category>

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		<description><![CDATA[15 अगस्त को अपने ब्लाग पर मैंने राष्ट्रगान के साथ एक सवाल किया था राष्ट्रगान में भाग्यविधाता कौन है? इस पर हिन्दी चिट्ठाकारों ने बहुत उम्दा बहस की है. हालांकि मेरे सवाल उठाने के पहले दो अन्य ब्लागर इस पर सवाल उठा चुके हैं.
हिन्दी ब्लागरों में सबसे पहले यह सवाल उठाया था प्रतीक पाण्डेय ने. [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p>15 अगस्त को अपने ब्लाग पर मैंने राष्ट्रगान के साथ एक सवाल किया था <a href="http://visfot.blogspot.com/2007/08/blog-post_2376.html">राष्ट्रगान में भाग्यविधाता कौन है?</a> इस पर हिन्दी चिट्ठाकारों ने बहुत उम्दा बहस की है. हालांकि मेरे सवाल उठाने के पहले दो अन्य ब्लागर इस पर सवाल उठा चुके हैं.</p>
<p>हिन्दी ब्लागरों में सबसे पहले यह सवाल उठाया था <a href="http://www.hindiblogs.com/hindiblog/default.htm">प्रतीक पाण्डेय </a>ने. 12 अप्रैल 2005 को अपने चिट्ठे पर उन्होंने पूछा था ये भाग्यविधाता कौन है भाई. अनिल रघुराज ने भी अपने <a href="http://diaryofanindian.blogspot.com/2007/04/blog-post_12.html">इस पोस्ट </a>में राष्ट्रगान के भाग्यविधाता का सवाल खड़ा किया था.</p>
<p>अब तक तीन बढ़िया लेख आये हैं और उस पर एक स्वस्थ्य चर्चा हुई है. पहला लेख दिया है अभय तिवारी ने. <a href="http://nirmal-anand.blogspot.com/2007/08/blog-post_920.html">&#8220;जन-गण-मन का अधिनायक क्या जार्ज पंचम हैं?&#8221; </a>आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी के लेख से यह साबित करने का प्रयास है कि &#8220;रवीन्द्र मनस्वी कवि थे, वे कभी किसी विदेशी नरपति की स्तुति में इतना मनोहर गान लिख ही नहीं सकते थे।&#8221; इस लेख पर 15 लोगों ने अपनी राय दी है. <a href="http://iyatta.blogspot.com/">इष्टदेव</a> की टिप्पणी देखिये &#8221; यह क्यों भूलते हैं कि द्विवेदी जी ने विश्वभारती में नौकरी भी की है?&#8221; तो <a href="http://www.blogger.com/profile/05634421007709892634">अनुनाद सिंह </a>का कथन है &#8220;द्विवेदी जी की बात किसी भी प्रकार से शंका का समाधान करने में सक्षम नहीं दिख रही है। दलीलों में दम नहीं है।&#8221;</p>
<p>आज 16 अगस्त को दूसरी पोस्ट फिर से अभय तिवारी ने लिखी है. <a href="http://nirmal-anand.blogspot.com/2007/08/blog-post_16.html">चित्त जहां भयमुक्त हो.</a> इसके अलावा ढाई आखर पर एक महत्वपूर्ण दस्तावेज प्रस्तुत किया गया है <a href="http://dhaiakhar.blogspot.com/2007/08/blog-post_4429.html">&#8220;गुरूदेव ने क्या कहा जन-गण-मन के बारे में.&#8221;</a> जिसमें कहा गया है कि गुरुदेव रवीन्द्र नाथ ठाकुर ने पुलिन बिहारी सेन को लिखे एक पत्र में इस गीत के बारे में लिखा है, &#8220;महामहिम की सेवा में लगे एक आला अफ़सर जो मेरे भी दोस्त थे, उन्होंने मुझसे गुज़ारिश की कि मैं सम्राट के अभिनन्दन में एक गीत की रचना करूं। इस गुज़ारिश ने मुझे चौंका दिया।&#8221; पत्र ढाई आखर पर दिया गया है.</p>
<p>इस विषय पर <a href="http://hindini.com/fursatiya/?p=323">फुरसतिया के विचार </a>भी जरूर पढ़िये.</p>
<p>पूरी बहस को जानने के लिए आप दिये गये लिंक पर जा सकते हैं.</p>

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		<title>राष्ट्रगान में यह भाग्यविधाता कौन है?</title>
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		<pubDate>Wed, 15 Aug 2007 06:28:00 +0000</pubDate>
		<dc:creator>संजय तिवारी</dc:creator>
				<category><![CDATA[बात करामात]]></category>
		<category><![CDATA[15 अगस्त]]></category>

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		<description><![CDATA[राष्ट्रगानजन गण मन अधिनायक जय हेभारत भाग्य विधातापंजाब सिन्ध गुजरात मराठा द्राविड़ उत्कल बंगविन्ध्य हिमाचल यमुना गंगा उच्छल जलधि तरंगतव शुभ नामे जागेतव शुभ आशिष मागेगाहे तव जय गाथाजन गण मंगल दायक जय हेभारत भाग्य विधाताजय हे जय हे जय हेजय जय जय जय हे
एक सवाल?1. जन गण मन का भाग्यविधाता कौन है?

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			<content:encoded><![CDATA[<p><span style="font-size:130%;">राष्ट्रगान</span><br />जन गण मन अधिनायक जय हे<br />भारत भाग्य विधाता<br />पंजाब सिन्ध गुजरात मराठा द्राविड़ उत्कल बंग<br />विन्ध्य हिमाचल यमुना गंगा उच्छल जलधि तरंग<br />तव शुभ नामे जागे<br />तव शुभ आशिष मागे<br />गाहे तव जय गाथा<br />जन गण मंगल दायक जय हे<br />भारत भाग्य विधाता<br />जय हे जय हे जय हे<br />जय जय जय जय हे</p>
<p><span style="font-size:130%;">एक सवाल?</span><br />1. जन गण मन का भाग्यविधाता कौन है?</p>

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		<title>60 साल का भारत&#8230;.क्या सचमुच?</title>
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		<pubDate>Tue, 14 Aug 2007 16:16:00 +0000</pubDate>
		<dc:creator>संजय तिवारी</dc:creator>
				<category><![CDATA[बात करामात]]></category>
		<category><![CDATA[15 अगस्त]]></category>
		<category><![CDATA[निठल्ला चिंतन]]></category>

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		<description><![CDATA[
हर साल 15 अगस्त और 26 जनवरी को एक बेचैनी से दो चार होता हूं. वह बेचैनी है हम 15 अगस्त और 26 जनवरी को सरकारी तौर पर इतना महत्व क्यों देते हैं? क्या हम सचमुच एक शासनतंत्र की व्यवस्था को राष्ट्रीय पर्व मान लें और सत्ता हस्तांतरण को अपनी आजादी मान ढ़िढोरा पीटें कि [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p><a href="http://bp0.blogger.com/_ae352Y7bWYQ/RsHWEMW9h4I/AAAAAAAAAO8/X4JzbWgFNus/s1600-h/1800_320.jpg"><img style="float:left;cursor:hand;margin:0 10px 10px 0;" alt="" src="http://bp0.blogger.com/_ae352Y7bWYQ/RsHWEMW9h4I/AAAAAAAAAO8/X4JzbWgFNus/s200/1800_320.jpg" border="0" /></a>
<div>हर साल 15 अगस्त और 26 जनवरी को एक बेचैनी से दो चार होता हूं. वह बेचैनी है हम 15 अगस्त और 26 जनवरी को सरकारी तौर पर इतना महत्व क्यों देते हैं? क्या हम सचमुच एक शासनतंत्र की व्यवस्था को राष्ट्रीय पर्व मान लें और सत्ता हस्तांतरण को अपनी आजादी मान ढ़िढोरा पीटें कि हम आजाद हैं. जिनसे लड़कर हस्ता हस्तांतरण का खेल किया गया वे मुख्य दरवाजे को फट बंद करके बाहर गये और चोर दरवाजे से चुपके से अंदर आ गये. साठ साल के बाद आज आजादी का जश्न सबसे ज्यादा दो ही लोग मना रहे हैं. पहली है सरकार और दूसरी हैं बहुराष्ट्रीय कंपनियां. क्यों सरकार, बहुराष्ट्रीय कंपनियां और इनके पैरोकार ही 15 अगस्त तथा 26 जनवरी को राष्ट्रीय पर्व बनाने पर अमादा है?</div>
<div></div>
<div>बचपन में मास्टर साहब प्रभात फेरी करवाते थे. गीत रटवाते थे और घर-घर घूमकर पैसा मांगते थे. जो इकट्ठा होता था उसमें से ज्यादातर आपस में बांट लेते थे और कुछ पैसों की मिठाई मंगवाते थे. एक लड्डू मिलता था. कुछ जिन्दाबाद वाले नारे लगाते और घर लौट आते थे. थोड़े और बड़े हुए तो इन दो तारीखों का उपयोग मुफ्त की रेलयात्रा और किसी पिक्चर हाल में सिनेमा देखने के लिए करते थे. इसी तरह स्वतंत्रता दिवस की इतिश्री कर देते थे. आप कह सकते हैं कि हमारी परवरिश में जश्ने आजादी का घोल पड़ा नहीं. लेकिन 90 फीसदी देश में आज भी 15 अगस्त और 26 जनवरी को यही होता है. इस बारे में हम क्या निष्कर्ष निकालें? </div>
<div></div>
<p>
<div>पिछले सात सालों से इस दिन आम दिनों की ही तरह आठ बजे सोकर उठता हूं. तब तक पड़ोस के लालकिले पर शोरगुल खत्म हो चुका होता है.(लालकिला मेरे घर से महज एक किलोमीटर दूर है) नौ-दस बजते-बजते बंद दुकाने खुलने लगती हैं. और फिर जिन्दगी सामान्य होने लगती है. पुलिस की घेरेबंदी खत्म हो जाती है. लेकिन अब फिल्मे नहीं देखता, प्रभात फेरी नहीं करता उल्टे यह सोचता हूं कि क्या सचमुच यह आजादी का पर्व है?</div>
<div></div>
<p>
<div>मैं मानता हूं इस तरह के आयोजन नहीं होने चाहिए. ब्यूरोक्रेटिक घुट्टी पिलाने से किसी के मन में राष्ट्रप्रेम नहीं पैदा होता. अगर मेरा देश मुझे जीने के समान अवसर देता है तो राष्ट्रप्रेम अपने आप झर-झर कर बहेगा. मेरा मानना है कि यह सब सरकारी खानापूर्ति है. इसे सरकारी पर्व कहना ज्यादा ठीक होगा. जो लोग आजादी का जश्न मनाते हैं सारी समस्याओं के मूल में वही लोग बैठे हैं. और फिर भारत एक विकसित देश है. इसका एक विकासक्रम है, दुनिया के अन्य कई देशों की तरह इसका गठन नहीं हुआ है. इसकी जड़े गहरी हैं और वे 1947, 1857, 1757 और 1526 से पीछे जाती हैं. जब हम 15 अगस्त को अपना राष्ट्रीय पर्व मान लेते हैं तो हम भारत की आत्मा से कट जाते हैं. ऐसा लगता है कि पाकिस्तान और भारत दोनों ही नया इतिहास लिखने में लगे हैं. जहां अंग्रेजों से लड़ाई है और उससे मिली आजादी है. इसके पहले कोई तारीख नहीं जाती. जाती भी है तो इतिहास गणना करने के लिए. मैं भारत की सनातन व्यवस्था का हिस्सा हूं. </div>
<div></div>
<p>
<div>मेरा अस्तित्व कहता है कि 15 अगस्त कोई जश्ने आजादी नहीं है. यह सत्ता हस्तांतरण की एक तारीख है जब गोरे अंग्रेजों की जगह काले अंग्रेज हमारे सिर पर सवार हो गये. इन काले अंग्रेजों और उनके नये-नवेले गोरे रिश्तेदारों की जश्ने आजादी में भला मेरा क्या काम? </div>
<div></div>
<div>(यह मेरे निजी विचार हैं और आप इसे पूरी तरह से खारिज करने के लिए स्वतंत्र हैं)</div>

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